विदेश से लौटने पर 90% पायलटों का नहीं होता डोप टेस्ट, फुकेट-दिल्ली फ्लाइट कांड से खुली DGCA नियमों की पोल; क्या है नियम?
फुकेट-दिल्ली उड़ान में पायलट के डोप टेस्ट पॉजिटिव आने से डीजीसीए के नियमों की खामियां सामने आईं। मौजूदा 10% रैंडम ...और पढ़ें

विदेश से लौटने पर नहीं होता पायलटों का डोप टेस्ट। फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
पायलट के डोप टेस्ट पॉजिटिव आने से नियम उजागर
विदेशी एयरपोर्ट पर डोप टेस्ट का अभाव एक समस्या
केवल 10% पायलटों का रैंडम डोप टेस्ट होता है
गौतम कुमार मिश्रा, नई दिल्ली। फुकेट से नई दिल्ली आ रही एअर इंडिया की उड़ान के दौरान हुए घटनाक्रम ने नागरिक उड्डयन सुरक्षा के एक बड़े सेफ्टी लूपहोल की पोल खोल दी है।
इस मामले में उड़ान के पायलट-इन-कमांड का डोप टेस्ट पाजिटिव आया, तो भारतीय उड्डयन क्षेत्र में तहलका मच गया। इस पूरे मामले ने डीजीसीए के मौजूदा नियमों की उन कमियों को उजागर कर दिया है, जिनका फायदा उठाकर संदिग्ध या नियम तोड़ने वाले क्रू मेंबर्स बच निकलते हैं।
विदेश से लौटते समय नहीं होती डोप टेस्ट की व्यवस्था
नियमों के अनुसार, भारत से बाहर जाने वाले पायलटों का प्रीफ्लाइट ब्रीथ एनालाइजर (बीए) टेस्ट भारत में हो जाता है, लेकिन विदेश से लौटते समय (जैसे फुकेट या अन्य अंतरराष्ट्रीय स्टेशन) स्थानीय स्तर पर भारतीय एयरलाइंस का डोप/ड्रग टेस्ट सेटअप नहीं होता।
ऐसे में अगर कोई पायलट ओवरसीज ले-ओवर के दौरान किसी ड्रग्स या नशीले पदार्थ का सेवन करता है, तो विदेशी एयरपोर्ट पर टेक-आफ से पहले उसकी कोई रैंडम या रूटीन जांच नहीं होती। जब तक विमान भारत लैंड नहीं करता, तब तक उसके नशे में होने का पता लगाना लगभग नामुमकिन रहता है।
बीए टेस्ट 100 प्रतिशत, लेकिन डोप टेस्ट सिर्फ 10 प्रतिशत
विशेषज्ञों का कहना है कि डोप टेस्ट से जुड़ी कुछ कमियां हैं, जिनका क्रू सदस्य फायदा उठा लेते हैं। शराब (बीए टेस्ट) के लिए जीरो टालरेंस नियम है, लेकिन ड्रग्स के लिए रैंडम जांच का दायरा सीमित है।
डीजीसीए के सिविल एविऐशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के तहत एयरलाइंस को हर साल केवल 10 प्रतिशत पायलटों और एटीसी आफिसर्स का ही रैंडम डोप टेस्ट करना होता है, जबकि बीए टेस्ट 100 प्रतिशत अनिवार्य है।
इस नियम का लूपहोल यह है कि 90 प्रतिशत पायलट पूरे साल बिना किसी डोप टेस्ट के उड़ान भरते हैं। इस बड़े अंतर के कारण ड्रग्स या साइकोएक्टिव सब्सटेंस का सेवन करने वाले क्रू मेंबर्स के पकड़े जाने की संभावना बेहद कम रहती है।
यूरीन सैंपल की डिटेक्शन विंडो भी बन सकती है चुनौती
डोप टेस्ट में मुख्य रूप से यूरीन सैंपल का इस्तेमाल किया जाता है। विभिन्न ड्रग्स शरीर में अलग-अलग समय तक रहते हैं। अगर टेस्ट उड़ान के तुरंत बाद नहीं होता या उसमें देरी होती है, तो कई बार सैंपल निगेटिव आ सकता है।
इसके अलावा, तुरंत असर दिखाने वाले सिंथेटिक ड्रग्स या कम मात्रा में सेवन करने पर यूरीन स्क्रीन से बचना आसान हो जाता है।
रैंडम टेस्ट की जानकारी लीक होने का भी खतरा
डोप टेस्ट रैंडम शेड्यूल के आधार पर किया जाता है। कई मामलों में रोस्टर और टेस्टिंग शेड्यूल एयरलाइन के मेडिकल डिपार्टमेंट के पास पहले से होता है।
यदि रैंडम डोप टेस्ट की सूचना किसी भी स्तर पर लीक होती है या पायलट को अंदाजा लग जाता है, तो वह बीमार होने का बहाना बनाकर या फ्लाइट रोस्टर बदलवाकर टेस्ट से बच सकता है।
विदेशी एयरपोर्ट पर प्रीफ्लाइट डोप टेस्ट की जरूरत
एयरलाइंस को विदेशी एयरपोर्ट्स पर थर्ड-पार्टी अप्रूव्ड मेडिकल लैब्स के साथ करार करना पड़ेगा, ताकि विदेश में भी प्रीफ्लाइट डोप टेस्ट संभव हो सके। इससे विदेश से लौटने वाली उड़ानों के पायलटों की टेक-आफ से पहले जांच की जा सकेगी।
10% से बढ़ाकर 50% हो रैंडम डोप टेस्ट का कोटा
फुकेट मामले ने यह साबित कर दिया है कि केवल अल्कोहल जांच (बीए टेस्ट) के भरोसे 100 प्रतिशत फ्लाइट सेफ्टी का दावा नहीं किया जा सकता।
ड्डयन विशेषज्ञों का मानना है कि डीजीसीए को रैंडम डोप टेस्ट का कोटा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर कम से कम 50 प्रतिशत करना चाहिए और संवेदनशील विदेशी उड़ानों से लौटने वाले पायलटों के लिए रैंडम स्पाॅट-चेकिंग को सख्त बनाना होगा।
