दिल्ली की हवा में कब घुला जहर? जानिए वह दौर जब शहर में बहती थीं नदियां और हर तरफ थी हरियाली
दिल्ली में गुलाबी सर्दी के साथ ही बढ़ते प्रदूषण और स्मॉग की समस्या पर यह लेख अतीत की प्राकृतिक दिल्ली ...और पढ़ें

दिल्ली में भी एक समय ठंडी हवा के झोंके और स्वच्छ वातावरण वाला माहौल होता था। एआई इमेज
HighLights
सदियों पहले दिल्ली में स्वच्छ हवा, नदियाँ थीं।
अनियंत्रित विकास ने दिल्ली को कंक्रीट का जंगल बनाया।
पेड़-पौधे प्रदूषण से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। दिल्ली में गुलाबी सर्दी की दस्तक के साथ ही स्माॅग का स्याह कैलेंडर शुरू हो गया है। सुबह-शाम हवा में छाई धुंध की चादर मौसम बदलने के साथ सघन होकर हमारी सांसों पर पहरा लगाने को तैयार है।
असंतुलित विकास, वाहनों के बढ़ते दबाव और कारखानों के धुएं ने आज दिल्ली की धमनियों में जहर घोल दिया है। आज कंक्रीट के जंगल में ऐतिहासिक जलाशय सूख चुके हैं। एक समय कैसी थी प्राकृतिक दिल्ली, सबरंग के इस अंक में हम उस अतीत से रूबरू करेंगे...
सदियों पहले की दिल्ली की खूबसूरती
सदियों पहले भी यहां की हवा में मरुस्थलीय रेत और धूल थी, लेकिन आज जैसा जानलेवा जहर नहीं था। तब दिल्ली के शासकों ने यहां की आबोहवा की चिंता की थी। शहर के बीच बहती जलधाराएं, अरावली का रिज क्षेत्र और फैले बाग-बगीचे दिल्ली के फेफड़ों को शुद्ध ऑक्सीजन देते थे।
प्रदूषण से दिल्ली को बचाती थी प्राकृतिक ढाल
पर्यावरण की चुनौतियां पहले भी कम नहीं थीं लेकिन इनसे निपटने के इंतजाम पूरे थे। दिल्ली अगर पथरीली जमीन पर थी, तो यमुना का किनारा भी था, अरावली की चट्टानें थीं, तो उनको ढंकती हरियाली की मुलायम छांव भी थी।
कुल मिलाकर मौसम के कहर और प्रदूषण के जहर का मुकाबला करने के लिए बंदोबस्त थे। यहां के बाग बगीचे और जलाशयों की प्राकृतिक ढाल थी। दिल्ली को अब उन्हीं हरे मैदानों, बाग बगीचों की कमी खलती है जो प्रदूषण को पूरी तरह भले न रोक पाती लेकिन उसे वातावरण से निकालने में मदद करते।

1947 के बाद बदल गया नजारा
'ट्रीज ऑफ दिल्ली' में प्रदीप कृष्ण लिखते हैं कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दिल्ली में बहुत कुछ बदल गया। 1947 में स्वतंत्रता के बाद जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई और उसके बाद हुए तीव्र विकास ने शहर को पर्यावरणीय संकट के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अब स्थिति यह है कि यमुना नदी कच्चे सीवेज की एक पतली धारा मात्र रह गई है। जलस्तर गिर गया है और जलभंडार दूषित हो गए हैं।
एक बार फिर चाहिए दिल्ली को प्राकृतिक ढाल
वे लिखते हैं, दिल्ली की हवा में अन्य सभी चार भारतीय महानगरों की तुलना में कहीं अधिक वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण की मात्रा अधिक है। हालांकि वे लिखते हैं कि अभी भी गनीमत और नगर निगम प्रशासन की कुशलता का प्रमाण है कि हरियाली पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। विशेषकर लुटियंस के जमाने की दिल्ली आज भी हरे-भरे और घने पेड़ों से से ढकी है। असल में तो पूरी दिल्ली और तमाम शहरों को इसी तरह की प्राकृतिक ढाल की आवश्यकता है।
जब थी बागों की दिल्ली, रगों में बहता था शीतल जल
विलियम डेलरिंपल की किताब 'सिटी ऑफ जिन्स' और इतिहासकार राना सफवी व इंटैक के रिसर्च में दिल्ली के ऐतिहासिक बाग-बगीचों और जलाशयों का जिक्र आता है, उनमें से कई आज या तो पूरी तरह खत्म हो चुके हैं या फिर नाम के ही बचे हैं। कौन सोच सकता था कि आज चांदनी चौक की जिन गलियों में दम घुटता है, कभी वहां नदी बहा करती थी, बेगम का बाग था जिसे जहांआरा बेगम ने बनवाया था।
केंद्र में बना बड़ा चांदनी तालाब आज सड़कों, दुकानों और शहरीकरण की भेंट चढ़कर पूरी तरह गायब हो चुका है। इसी तरह लाल किले के पास वाला ऐतिहासिक शालीमार बाग, जो कभी आम और जामुन के घने पेड़ों व नहरों से घिरा हुआ था, वक्त के साथ कंक्रीट के मकानों और कालोनियों में तब्दील होकर सिमट गया। रोशनआरा बाग भी अपनी पुरानी झील और हरियाली का बहुत बड़ा हिस्सा खो चुका है।
जब केवल इक्की दुक्की थीं कारें
वायु प्रदूषण के कारणों में है आड़ा तिरछा, औनापौना विकास। गाड़ियों की बढ़ती संख्या, कटते पेड़, बढ़ते मल्टी स्टोरी भवन, कारखाने सबकुछ हैं। आज दिल्ली कारों के बोझ तले दबी जा रही है, ई-कार को बढ़ावा देने के लिए मजबूत पालिसी खड़ी की गई है। तमाम पाबंदियां भी लगाई जा रही हैं। सड़कों पर गाड़ियों की जो स्थिति है उसमें स्वच्छ हवा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
1960 तक चंद मिनटों में ही दिख जाती थी हरियाली
इतिहासकार विलियम डलरिंपल अपनी पुस्तक 'सिटी ऑफ जिन्स' में लिखते हैं कि 1960 के दशक की शुरुआत तक भी आप कनाॅट प्लेस से तांगा लेकर कुछ ही मिनटों में शहर से बाहर निकलकर एक खूबसूरत खंडहरों से भरे ग्रामीण इलाके में पहुंच सकते थे।
1984 में दिल्ली आज के विशाल, स्माग भरे महानगर से बिलकुल अलग थी। वे दिल्ली में भीड़ भरी गलियों से बाहर निकलते तो चौड़ी सड़कों, किनारे हरियाली और ताजा हवा मिलती थी।
1990 के दशक के शुरुआत में भी यहां लोगों के पास सिंगल माॅडल कारें हुआ करती थीं। सोचिए, एक-एक ब्रांड की दर्जनों कारों के दौर में उस दौर जैसी स्वच्छ हवा केवल खयाली बातें हैं।
बगीचों की दिल्ली बनी कंक्रीट का जंगल
प्रदीप अपनी पुस्तक में बड़ी चिंता के साथ लिखते हैं कि उद्यान नगरी (दिल्ली) की अवधारणा के अंत के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। जैसे-जैसे शहर बाहर की ओर फैलता गया है। सत्ता और समृद्धि के केंद्र में पेड़ों और पार्कों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती जा रही है और यह विस्तार लगातार बढ़ता जा रहा है।
शहर के विस्तार से हरियाली को खतरा
अगर हम दिल्ली से सटे गुरुग्राम, नोएडा, फरीदाबाद को देखें तो इनकी बात सच साबित होती है कि शहर के विस्तार में सिर्फ और सिर्फ ऊंचे-ऊंचे भवन दिखाई पड़ते हैं, पेड़-पौधे कहीं नहीं। प्रदीप यह भी लिखते हैं कि बेशक, पेड़ दिल्ली की गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते, लेकिन वे प्रकृति के बिगड़ते संतुलन को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका जरूर निभाते हैं।
तभी मिलेगी हरियाली, ताजगी तथा सुकून
जब तक हम अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की इच्छाशक्ति और साधन जुटाते हैं, तब तक पेड़ हमारे विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ से मिले जख्मों पर मरहम लगाने का काम करते हैं। वे हमारी लापरवाही के मूक गवाह हैं, हमारे नीरस और कंक्रीट में बदलते शहरों को सुंदरता देते हैं और जीवन में हरियाली, ताजगी तथा सुकून का अहसास बनाए रखते हैं।
विकास और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक
पेड़ हमें याद दिलाते हैं कि विकास और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। ऐसे में, पेड़ों को बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा करना नहीं, बल्कि अपने शहरों को रहने योग्य बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद बचाए रखने का प्रयास भी है। यही पेड़ों को बचाने के लिए पर्याप्त कारण है।

कुदरती धुंध थी फिजा में, प्रदूषण का नहीं था नामोनिशान
दिल्ली में चार दशक पहले प्रदूषण था ही नहीं। लोग हर मौसम की चुनौतियों को कुदरती मानकर जीते थे, आनंद लेते थे फिर चाहे वह गर्मियों की तेज लू हो, सर्दी में गिरता पारा और धुंध हो और बरसात में लगी झड़ी हो।
दिल्ली निवासी साहित्यकार, इतिहासकार आचार्य हरि भारद्वाज का कहना था कि 1957 से उन्हें दिल्ली की स्थिति, इसका हर मौसम याद है। उस समय जनसंख्या इतनी नहीं थी, कारें और कारखाने नहीं थे। समय वायु प्रदूषण के नाम का जिक्र ही नहीं आता था।
1980 के बाद सुनने में आया प्रदूषण का शोर
हवा 'खराब' होने की किसी भी तरह की बात हमने कभी अखबारों में नहीं पढ़ी। उस समय प्राकृतिक धुंध थी, यह लोगों को पसंद आती थी क्योंकि यह कुदरत का एक रंग था। ओस गिरती थी, वो शीतल होती थी, स्वच्छ होती थी। एक दो दशकों से इस तरह की आबोहवा हो गई है जिसमें सांस लेना मुश्किल होने लगा है। मुझे याद आता है कि 1980 के आसपास इस शब्द का शोर सुनाई देना शुरू हुआ था।
