दिल्ली में कभी CM की कुर्सी गई, कभी विधानसभा ही खत्म हुई; क्यों और कैसे बदली सत्ता? पढ़ें 70 साल की पूरी कहानी
Delhi 70 Years as Union Territory: देश की राजधानी दिल्ली में संसद भी है, मुख्यमंत्री भी और उपराज्यपाल भी, लेकिन ...और पढ़ें

Delhi Politics 70 Years: कभी कुर्सी छिनी, कभी बंद हुई विधानसभा, पढ़ें दिल्ली की सत्ता का पूरा इतिहास। फोटो एआई जनरेटेड
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली की सुबह में एक अजीब-सा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ संसद भवन है, जहां देश के कानून बनते हैं। राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय मंत्रालय हैं, तो दूसरी तरफ दिल्ली सचिवालय भी है, जहां शहर की चुनी हुई सरकार फैसले लेती है। इनके बीच उपराज्यपाल का कार्यालय भी है। यानी एक ही शहर में सत्ता के कई केंद्र हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री और विधानसभा होने के बावजूद दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। पुलिस, जमीन और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे अहम विषय आज भी केंद्र के अधीन हैं।
आखिर देश की राजधानी में सत्ता का यह अनोखा बंटवारा क्यों है? आखिर दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश क्यों बनाया गया? 1956 में विधानसभा क्यों खत्म हुई और फिर चार दशक बाद लोकतंत्र की वापसी कैसे हुई?
आज, यानी 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 साल पूरे हो गए। इस मौके पर जानिए राजधानी की सत्ता और सियासत के बदलते 70 साल की पूरी कहानी...
इंद्रप्रस्थ से नई दिल्ली तक: कैसे बदली पहचान?
यूं तो दिल्ली का इतिहास महाभारत में वर्णित इंद्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य और सटीक कालखंड को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। अलग-अलग दौर में इस क्षेत्र में अनेक नगर बसे, उजड़े और सत्ता के केंद्र बने। सल्तनत काल, मुगल शासन और शाहजहानाबाद ने दिल्ली की पहचान को नए रूप दिए, लेकिन आधुनिक दिल्ली की कहानी 1911 से एक नया मोड़ लेती है।
उस साल 12 दिसंबर को दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का एलान किया। नई राजधानी के निर्माण के लिए रायसीना हिल और आसपास का इलाका चुना गया। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकारों ने चौड़ी सड़कों, विशाल सरकारी इमारतों और व्यवस्थित शहरी ढांचे वाली नई राजधानी की परिकल्पना को आकार दिया।
31 दिसंबर 1926 को नई राजधानी का नाम 'नई दिल्ली' रखने की आधिकारिक घोषणा हुई। इसके बाद 15 फरवरी 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई राजधानी का औपचारिक उद्घाटन किया।
इस तरह दिल्ली को आधुनिक राजधानी की पहचान तो मिल गई, लेकिन एक सवाल अब भी बाकी था- जब यह शहर पूरे देश की सत्ता का केंद्र है, तो इसके अपने प्रशासन की कमान किसके हाथ में होनी चाहिए; स्थानीय प्रतिनिधियों के या केंद्र सरकार के?
आजादी के बाद यही सवाल दिल्ली की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बहस बन गया।
दिल्ली में कब बनी पहली निर्वाचित सरकार?
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। इसके करीब ढाई साल बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। इसी के साथ दिल्ली को पार्ट-C राज्य का दर्जा मिला। इस व्यवस्था के तहत यहां विधानसभा और मुख्यमंत्री का प्रावधान किया गया। हालांकि, इसे पूर्ण राज्यों जैसी स्वायत्तता हासिल नहीं थी।
आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए चुनावों ने दिल्ली की राजनीति को नया अध्याय दिया। 7 मार्च 1952 को दिल्ली की पहली विधानसभा गठित हुई। इसमें कुल 48 सदस्य थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पसंदीदा नेताओं में शामिल चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने।
17 मार्च 1952 को पुराने सचिवालय के लॉन में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित हुआ। दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त शंकर प्रसाद ने ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इस तरह आजादी के बाद पहली बार दिल्ली को अपनी निर्वाचित सरकार मिली, लेकिन यह व्यवस्था बहुत लंबे समय तक सुचारु रूप से नहीं चल सकी।

मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश और मुख्य आयुक्त के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आने लगे। मुख्यमंत्री के पास विधानसभा और मंत्रिपरिषद थी, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य आयुक्त की भी अहम भूमिका थी। अधिकारों की यह खींचतान धीरे-धीरे बढ़ती गई।
आखिरकार 12 फरवरी 1955 को ब्रह्म प्रकाश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद दरियागंज के विधायक गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री बने।
बता दें कि उस समय दिल्ली में आज की तरह उपराज्यपाल (LG) का पद नहीं था। मुख्य आयुक्त केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली का प्रशासन संभालते थे।
1956 में दिल्ली विधानसभा क्यों खत्म की थी?
मुख्यमंत्री और मुख्य आयुक्त के बीच बढ़ते मतभेदों ने केंद्र सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था- क्या देश की राजधानी को भी दूसरे राज्यों की तरह चलाया जाना चाहिए या यहां केंद्र का नियंत्रण ज्यादा होना चाहिए?
इसी बीच देश में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी। भाषाई और प्रशासनिक आधार पर राज्यों की सीमाएं नए सिरे से तय की जा रही थीं। इस काम के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया था। आयोग ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था की भी समीक्षा की।
आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे देश की राजधानी भी है। यहां संसद, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालय मौजूद हैं। ऐसे में राजधानी के प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार की विशेष भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आयोग का मानना था कि देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली का प्रशासन सामान्य राज्यों से अलग होना चाहिए। यहां अलग राज्य सरकार होने से केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच अधिकारों का टकराव बढ़ सकता है।

आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली का पार्ट-C राज्य का दर्जा खत्म कर इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। इसके साथ ही विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था भी समाप्त हो गई।
इस तरह दिल्ली में निर्वाचित सरकार का पहला अध्याय समाप्त हो गया। शासन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति के अधीन आ गई। यानी कि जिस दिल्ली में कुछ साल पहले जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजे थे, वहां अब विधानसभा ही नहीं थी।
दिल्ली में फिर कब लौटी लोकतांत्रिक व्यवस्था?
विधानसभा खत्म होने के बाद भी दिल्ली में चुनी हुई सरकार की मांग बनी रही। इसी को देखते हुए 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम के तहत महानगर परिषद बनाई गई। इसमें निर्वाचित सदस्य तो थे, लेकिन उसके पास कानून बनाने के अधिकार नहीं थे। यानी प्रतिनिधित्व लौटा, लेकिन सत्ता और अधिकार अब भी दूर थे।
बढ़ती आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के बीच दिल्ली को ज्यादा अधिकार देने की मांग तेज हुई। आखिर में 1987 में केंद्र सरकार ने बालकृष्णन समिति गठित की।
समिति ने दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश बनाए रखते हुए यहां विधानसभा और मंत्रिपरिषद बनाने की सिफारिश की। इसी से दिल्ली की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की नींव पड़ी।

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37 साल बाद किसकी सरकार बनी?
बालकृष्णन समिति की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने मई 1990 में संसद में एक विधेयक पेश किया। इसके बाद 1991 में 69वां संविधान संशोधन पारित हुआ।
इसके जरिए दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (National Capital Territory यानी NCT) का दर्जा मिला। साथ ही विधानसभा और मंत्रिपरिषद की वापसी का रास्ता खुला और उपराज्यपाल का पद बनाया गया। हालांकि, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला। यानी जनता अपनी सरकार तो चुन सकती थी, लेकिन उसके अधिकारों की सीमाएं तय थीं।
इसके बाद नवंबर 1993 में हुए विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा ने जीत दर्ज की और दिसंबर में मदन लाल खुराना ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह करीब 37 साल बाद दिल्ली में एक बार फिर निर्वाचित सरकार की वापसी हुई।
दिल्ली में CM और LG के अधिकार कैसे बंटे हैं?
दिल्ली की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए संविधान का अनुच्छेद 239AA सबसे महत्वपूर्ण है। इसी के तहत दिल्ली को विशेष संवैधानिक दर्जा मिला है।
इसके तहत दिल्ली सरकार दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और परिवहन जैसे नागरिक सेवाओं से जुड़े अनेक मामलों में नीतियां बना सकती है और योजनाएं लागू करती है, लेकिन पुलिस प्रशासन, कानून-व्यवस्था और जमीन से जुड़े अहम फैसले उसके सीधे नियंत्रण में नहीं हैं। इन विषयों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण बना रहता है।
यही दिल्ली की सत्ता का सबसे अनोखा पहलू है। एक ही शहर में केंद्र और निर्वाचित सरकार के बीच शक्तियों का यह बंटवारा दिल्ली को देश के दूसरे राज्यों से अलग बनाता है।

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क्या दिल्ली में कभी राष्ट्रपति शासन लगा?
फरवरी 2014 में दिल्ली की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। दिसंबर 2013 में मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में जनलोकपाल विधेयक पेश नहीं कर पाने के बाद 14 फरवरी 2014 को इस्तीफा दे दिया।
इसके दो दिन बाद, 16 फरवरी को दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। विधानसभा को कुछ समय के लिए निलंबित रखा गया और नवंबर 2014 में भंग कर दिया गया।
इसके बाद फरवरी 2015 में विधानसभा चुनाव हुए। आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की। 14 फरवरी 2015 को राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ और अरविंद केजरीवाल ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह करीब एक साल तक दिल्ली में चुनी हुई सरकार नहीं थी और प्रशासन केंद्र के अधीन रहा।
अधिकारों की लड़ाई कब शुरू हुई?
दिल्ली में साल 2014 में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। इसके बाद केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर टकराव बढ़ने लगा। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार और दिल्ली में केजरीवाल सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए।
यह विवाद 2023 में एक बार फिर तेज हो गया। 11 मई 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस, जमीन और सार्वजनिक व्यवस्था को छोड़कर अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार को दिया, लेकिन इसके आठ दिन बाद 19 मई को केंद्र सरकार अध्यादेश ले आई।
इसमें अधिकारियों की नियुक्ति, तबादले और विजिलेंस से जुड़े मामलों के लिए राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण बनाने का प्रावधान किया गया। केजरीवाल सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर करने वाला कदम बताया।

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अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में क्या व्यवस्था है?
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी की प्रशासनिक व्यवस्था देश के बाकी 50 राज्यों से अलग है। यह किसी राज्य का हिस्सा नहीं, बल्कि एक अलग संघीय जिला (District of Columbia) है। यहां व्हाइट हाउस और अमेरिकी संसद कैपिटल स्थित हैं।
खास बात यह है कि वॉशिंगटन डीसी में निर्वाचित मेयर और स्थानीय परिषद है, जो शहर के प्रशासन से जुड़े फैसले लेते हैं। इसके बावजूद अमेरिकी कांग्रेस को यहां के कानूनों की समीक्षा करने और बजट पर नियंत्रण रखने का अधिकार है।
यहां के लोग राष्ट्रपति चुनाव में वोट डाल सकते हैं, लेकिन अमेरिकी संसद में उनका कोई ऐसा प्रतिनिधि नहीं है, जिसे कानून बनाने के लिए पूरा वोट देने का अधिकार हो।
दिल्ली में एनसीआर कब जुड़ा?
दिल्ली पर बढ़ती आबादी और बुनियादी सुविधाओं के दबाव को कम करने के लिए आसपास के शहरों के विकास की योजना बनाई गई। इसी उद्देश्य से 1985 में संसद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड अधिनियम पारित किया और NCR योजना बोर्ड का गठन हुआ।
इसके तहत दिल्ली को केंद्र में रखकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के आसपास के क्षेत्रों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल किया गया। इसका मकसद दिल्ली के साथ आसपास के शहरों का भी संतुलित और योजनाबद्ध विकास करना था।

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दिल्ली-NCR में कितने जिले हैं?
केंद्र सरकार की 16 जून 2026 की जानकारी के मुताबिक, NCR में पूरी दिल्ली (NCT) के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुल 24 जिले शामिल है।
- हरियाणा - 14
- उत्तर प्रदेश - 8
- राजस्थान - 2
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