'दिल्ली बंद करना समाधान नहीं', GRAP और विंटर एक्शन प्लान पर बोलीं CSE प्रमुख सुनीता नारायण
दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए GRAP लागू किया गया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण का कहना है कि यह स्थायी समाधान बनाना गलत है।

दिल्ली में प्रदूषण। फोटो-जागरण आर्काइव
HighLights
GRAP आपातकालीन उपाय था, स्थायी समाधान नहीं।
सार्वजनिक परिवहन मजबूत करना, औद्योगिक प्रदूषण रोकना जरूरी।
दिल्ली को बंद करना प्रदूषण नियंत्रण की नीति नहीं।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत के साथ प्रदूषण का संकट गहराने लगता है। हवा की गति कम होने पर विषैले प्रदूषक जमीन के करीब जमा हो जाते हैं।
पड़ोसी राज्यों में पराली जलने से उठने वाला धुआं स्थिति को और गंभीर बना देता है। हर साल यही सवाल उठता है कि इस मौसम को कम नुकसानदेह बनाने के लिए हमने क्या किया है?
रोजमर्रा की गतिविधियों पर पड़ रहा असर
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि दिल्ली सरकार की शीतकालीन कार्ययोजना के उपाय आधे-अधूरे और कमजोर हैं।
ये प्रदूषण नियंत्रण के बजाय शहर को बंद करने और लोगों को रोजमर्रा की गतिविधियां रोकने के लिए मजबूर करने का संकेत देते हैं। उन्होंने कहा कि मैं जानती हूं कि निजी कारों और दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल प्रदूषण बढ़ाता है।
लोगों को वाहन छोड़ने या घर से काम करने के लिए कहने से पहले पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन और साइकिल चलाने-पैदल चलने के लिए सुरक्षित सड़कें उपलब्ध करानी होंगी। इनके बिना नवंबर से जनवरी तक 50 प्रतिशत क्षमता पर काम करने का निर्देश व्यावहारिक विकल्प नहीं बन सकता।
ग्रैप आपातकालीन उपाय था स्थायी विकल्प नहीं
सुनीता नारायण ने कहा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तत्कालीन पर्यावरण प्रदूषण प्राधिकरण की सदस्य के रूप में मैंने 2016 में सुप्रीम कोर्ट के सामने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) का विचार रखने में भूमिका निभाई थी।

इसका उद्देश्य प्रदूषण के गंभीर स्तर पर पहुंचने पर आपातकालीन उपाय लागू करना था, न कि स्थायी कार्रवाई का विकल्प बनना।
आज GRAP बना स्थाई समाधान
मूल ग्रैप में स्कूल बंद करने और निजी वाहनों पर प्रतिबंध जैसे उपाय केवल गंभीर या सार्वजनिक आपातकाल की स्थिति में लागू होने थे। भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक भी इसी रणनीति का हिस्सा थी।
इन उपायों से होने वाली असुविधा का उद्देश्य सरकारों को सालभर कठोर कार्रवाई के लिए प्रेरित करना था। शहर को बंद करना प्रदूषण नियंत्रण की नीति नहीं थी। आज दुर्भाग्य से ग्रैप स्थायी कार्रवाई न करने का बहाना बन गया है।
एनसीआर के वाहनों पर रोक से पहले विकल्प जरूरी
दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्या कम करने का वास्तविक उपाय सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना है। यह व्यवस्था केवल दिल्ली तक सीमित नहीं हो सकती। पूरे एनसीआर के शहरों और उनके बीच बेहतर संपर्क जरूरी है।
दिल्ली में बढ़ानी होगी परिवहनों की संख्या
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कम से कम 10,000 बसों की जरूरत पर बार-बार जोर दिया था। लेकिन आज दिल्ली में लगभग 6,840 बसें ही हैं। एनसीआर के दूसरे शहरों में आपसी संपर्क के लिए सार्वजनिक परिवहन बेहद कमजोर है।
दिल्ली मेट्रो और दिल्ली-मेरठ हाईस्पीड रेल कारिडोर महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। लेकिन इनके साथ इलेक्ट्रिक बसों, टैक्सियों और तीन पहिया वाहनों की संख्या बढ़ानी होगी। परिवहन के विभिन्न साधनों को जोड़कर लोगों के लिए किफायती और सुविधाजनक यात्रा सुनिश्चित करनी होगी।
जब तक ये विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे, दिल्ली में एनसीआर के वाहनों पर प्रतिबंध आम लोगों की परेशानी बढ़ाएगा। निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने के लिए पहले सार्वजनिक परिवहन को सक्षम बनाना होगा।
औद्योगिक प्रदूषण पर कार्रवाई कहां है?
दिल्ली और आसपास के अनधिकृत औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को कोयले का इस्तेमाल बंद करने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन सस्ती और भरोसेमंद बिजली तथा प्राकृतिक गैस जैसे विकल्प उपलब्ध कराने के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए आधे-अधूरे उपायों से काम नहीं चलेगा। हमें बड़े पैमाने पर, समयबद्ध और कठोर कार्रवाई करनी होगी। प्रदूषण की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती।
सरकारों को सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के मोर्चे पर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा, हर सर्दी में प्रतिबंधों और असुविधाओं का यही सिलसिला दोहराया जाता रहेगा।
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