'दुष्कर्म के केस में जमानत से पहले पीड़िता को सुनना जरूरी', दिल्ली हाई कोर्ट ने रद की ट्रायल कोर्ट से मिली बेल
दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद कर दी है। अदालत ...और पढ़ें

पीठ ने कहा कि दुष्कर्म मामले में पीड़ित महिला को आरोपित को जमानत देने से पहले मौजूद रहने और अपनी बात रखने का मौका देने की बात कही।
HighLights
दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में दी गई जमानत रद्द की।
पीड़िता को जमानत अर्जी पर सुनवाई में शामिल होने का अधिकार।
ट्रायल कोर्ट को पीड़िता का पक्ष सुनकर पुनः निर्णय लेने का निर्देश।
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपित को दी गई जमानत को रद करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि दुष्कर्म पीड़िता को नियमित जमानत की अर्जी पर सुनवाई से लेकर आपराधिक कार्यवाही के हर चरण में शामिल होने का अधिकार है। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म मामले में पीड़ित महिला को आरोपित को जमानत देने से पहले मौजूद रहने और अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।
अब जमानत अर्जी पर होगी नए सिरे से सुनवाई
पीठ ने रिकाॅर्ड पर लिया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपित को जमानत देने से पहले पीड़ित महिला को नोटिस नहीं भेजा था। पीठ ने इसके साथ ही पीड़ित महिला का पक्ष सुनने के बाद जमानत अर्जी पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया।
महिला ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत आरोपित को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-69 (दुष्कर्म) के तहत हुई प्राथमिकी में नियमित जमानत दी गई थी।
अदालत ने बीएनएसएस की धारा-483(दो) का जिक्र किया, जिसके तहत कुछ खास यौन अपराधों के मामलों में जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता या उनके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी जरूरी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किए ऐसे मामले में अधिकार
पीठ ने जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने आपराधिक कार्यवाही में पीड़ित के शामिल होने के अधिकार को मान्यता दी थी। साथ ही इस बात पर जोर दिया था कि ऐसे अधिकार महत्वपूर्ण और लागू करने योग्य हैं।
उक्त तथ्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले में पीड़ित महिला भी पीड़िता को आपराधिक कार्यवाही के सभी चरणों में शामिल होने का मौका दिया जाना चाहिए। इसमें आरोपित की नियमित जमानत की मांग भी शामिल है।
तब तक आरोपित की नहीं होगी गिरफ्तारी
ट्रायल कोर्ट से दी गई जमानत को रद करते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता महिला को सुनवाई का मौका देने के बाद, अधिकतम दो सप्ताह के अंदर मामले पर निर्णय किया जाए।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जब तक ट्रायल कोर्ट इस मामले पर नए सिरे से निर्णय नहीं ले लेता, तब तक आरोपित को दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। पीड़िता ने जून 2026 में दयालपुर थाना क्षेत्र में हुई प्राथमिकी के मामले में जुलाई 2026 में आरोपित को जमानत देने के निर्णय को चुनौती दी थी।
