विशेष विवाह अधिनियम: दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के लिए एक साल का इंतजार अब जरूरी नहीं
दिल्ली हाई कोर्ट ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक के लिए एक साल की इंतजार अवधि को विशेष परिस्थितियों ...और पढ़ें

दिल्ली हाईकोर्ट।
HighLights
दिल्ली हाई कोर्ट ने तलाक पर अहम फैसला सुनाया।
विशेष विवाह अधिनियम में इंतजार अवधि माफ हो सकती है।
नाममात्र की शादी में एक साल की छूट संभव।
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में अहम निर्णय पारित करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत विशेष स्थिति में तलाक की अर्जी दाखिल करने के लिए एक साल के इंतजार की अवधि को माफ किया जा सकता है।
पारिवारिक अदालत के निर्णय को रद करते हुए न्यायमूर्ति विवेक चौधरी व न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने कहा कि ऐसे मामले में जहां शादी सिर्फ नाम की हो और समाज या परिवार से कोई मंजूरी न मिली हो, वहां कानूनी इंतजार की अवधि पर अड़े रहने का कोई मतलब नहीं है।
पति ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत कानूनी अवधि में छूट देने की अर्जी को खारिज करने के निर्णय को चुनौती दी थी। यह मामला अलग-अलग धर्मों से जुड़े युगल जोड़े से जुड़ा है। दोनों ने 25 अगस्त 2025 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी की थी।
याचिका के अनुसार शादी की बात सामने आने जहां याची पति के पिता सदमे से बेहोश हो गए और बाद में पता चला कि उनका लिवर फेल हो गया है। वहीं, ऐसी ही स्थिति का सामना होने के डर से युवती ने अपने परिवार से शादी की बात छिपाकर रखी। शादी होने के बावजूद भी दाेनों अलग-अलग रहे।
एक साल की कानूनी रोक में छूट देने की अर्जी दायर की
दोनाें ने अपने-अपने परिवार की स्थिति को देखते हुए सहमति से अलग होने का निर्णय लिया। उन्होंने तलाक के लिए विशेष विवाह अधिनियम के तहत तय एक साल की कानूनी रोक और सोचने-समझने का समय में छूट देने की अर्जी दायर की। हालांकि, पारिवारिक अदालत ने यह कहते हुए उनकी अर्जी खारिज कर दी कि उनके मामले में असाधारण मुश्किल स्थिति जैसी कोई बात सामने नहीं आई है। यह भी कहा कि दोनों पक्षों ने शादी बचाने की कोई कोशिश नहीं की है।
हालांकि, पारिवारिक अदालत के निर्णय को रद करते हुए पीठ ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम की धारा-28 और 29 के तहत तय कानूनी समय-सीमा का मकसद शादी की रक्षा करना है, लेकिन साथ ही यह कोर्ट को यह अधिकार भी देती है कि वह सही मामलों में इन शर्तों में ढील दे सके।
दोनों पक्षों के बीच शादी सिर्फ नाम की है
पीठ ने कहा कि यह स्वीकार्य तथ्य है कि दोनों पक्षों के बीच शादी सिर्फ नाम की है और वे न तो साथ रहे और न ही शारीरिक संबंध बने। इस स्थिति को विशेष व मुश्किल मानते हुए पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति को देखते हुए दोनों को एक साल तक इंतजार करने के लिए मजबूर करना, उनके कष्टों को और बढ़ाएगा और यह कानून के उद्देश्य के भी विपरीत होगा।
पीठ ने कहा कि जब दोनों पक्ष शादी खत्म करने पर सहमत हैं, तो एक साल की कानूनी अवधि का पालन करने पर जोर देने से उद्देश्य पूरा होने के बजाय कठिनाइयां ही बढ़ेंगी। पीठ ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को रद करते हुए दोनों को सहमति से तलाक की याचिका पर विचार करने को कहा।
