मकोका मामले में दिल्ली पुलिस की जांच पर अदालत की सख्त टिप्पणी, कहा- 'कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आईवॉश'
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने मकोका मामले में पुलिस की जांच को 'लापरवाह' और 'आंखों में धूल झोंकने वाला' ...और पढ़ें

अदालत ने बाहरी-उत्तर जिला के पुलिस उपायुक्त द्वारा पेश की गई रिपोर्ट को पूरी तरह से 'लापरवाह और महज आंखों में धूल झोंकने वाला' करार दिया है। एआई इमेज
HighLights
पुलिस की मकोका जांच को अदालत ने 'लापरवाह' बताया।
आरोपी मकोका लगने के बाद भी करते रहे संगीन अपराध।
अदालत ने पुलिस आयुक्त को विस्तृत जांच का निर्देश दिया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संगठित अपराध के एक गंभीर मामले में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने पुलिस की कार्यशैली और जांच रिपोर्ट पर कड़ा रुख अपनाया है।
अदालत ने बाहरी-उत्तर जिला के पुलिस उपायुक्त द्वारा पेश की गई रिपोर्ट को पूरी तरह से 'लापरवाह और महज आंखों में धूल झोंकने वाला' करार दिया है।
विशेष न्यायाधीश गौरव राव ने कहा कि महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) जैसी सख्त धाराएं लागू होने के बावजूद मुख्य आरोपी सालों तक बेखौफ घूमते रहे और कई संगीन अपराधों को अंजाम देते रहे, लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी।
मकोका लगने के बाद भी दर्ज होते रहे मर्डर और किडनैपिंग के केस
अदालत के अनुसार, यह मामला सितंबर 2020 में दर्ज हुई एक FIR से जुड़ा है। उस दौरान आरोपी मुकेश उर्फ पुनीत और प्रदीप उर्फ गुरी पर मकोका लगाया गया था।
- मुकेश उर्फ पुनीत : मकोका दर्ज होने के वक्त उस पर हत्या और प्रयास समेत करीब 20 मामले दर्ज थे। कानून लागू होने के बाद भी 2021 से 2024 के बीच उस पर हत्या, डकैती और अपहरण के 8 नए मुकदमे दर्ज हुए। इसके बावजूद उसे फरवरी 2026 में जाकर गिरफ्तार किया जा सका, जब केस नए अधिकारी को सौंपा गया।
- प्रदीप उर्फ गुरी : प्रदीप पर भी मकोका के बाद लगातार संगीन अपराध करने के आरोप लगे। वह 2024 के दो नए मामलों में नामजद था, लेकिन उसे अप्रैल 2026 में गिरफ्तार किया गया।
- तीन आरोपी अब भी फरार: विनोद, प्रदीप और विकास नाम के तीन अन्य आरोपी 6 साल बीत जाने के बाद भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।
'पुलिस अधिकारियों ने सर्वोत्तम प्रयास किए'
पिछली सुनवाई पर अदालत ने पुलिस से स्पष्टीकरण मांगा था कि आरोपी मकोका लगने के दौरान जमानत पर थे या हिरासत में और इतने सालों तक उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। हालांकि, डीसीपी द्वारा दायर रिपोर्ट में इन मुख्य सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई। इसके विपरीत, एडिशनल डीसीपी ने अपनी दलील में कहा कि 'पुलिस अधिकारियों ने अपनी तरफ से सर्वोत्तम प्रयास किए हैं।'
'अगर यही 'सर्वश्रेष्ठ प्रयास' है, तो अदालत को कुछ नहीं कहना'
इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अधिकारियों की नजर में यही उनका सर्वश्रेष्ठ प्रयास है, तो कोर्ट के पास कहने को कुछ नहीं बचता। अदालत ने कहा कि अफसर मकोका जैसे कड़े कानून की भावना और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को लेकर पूरी तरह असंवेदनशील नजर आते हैं।
ढिलाई से अपराध का बढ़ा हौसला
विशेष न्यायाधीश ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आरोपियों की समय पर गिरफ्तारी न होना ही नए अपराधों की मुख्य वजह बना। अगर पुलिस मकोका लगाने के तुरंत बाद सख्ती दिखाती, तो बाद में हुई हत्याएं और वारदातें रोकी जा सकती थीं।
इस तरह की लापरवाही से अपराधियों का हौसला बढ़ता है और समाज में गलत संदेश जाता है। इसके अलावा, जांच में 6 साल की देरी से गवाहों की याददाश्त धुंधली पड़ जाती है और अहम सबूत भी नष्ट हो जाते हैं।
सीपी को आदेश और संयुक्त आयुक्त को पेश होने का निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने 5 अक्टूबर के अपने आदेश की प्रति सीधे दिल्ली पुलिस आयुक्त को भेजी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जाए और दोषी जांच अधिकारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।
अदालत ने पुलिस आयुक्त कार्यालय से जवाब मांगते हुए संबंधित जॉइंट कमिश्नर को अगली सुनवाई पर अपनी रिपोर्ट और टिप्पणियों के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को तय की गई है।
