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सर्दी में ही क्यों जागता है सिस्टम? दिल्ली के 80-85% प्रदूषण का स्रोत शहर के भीतर, वाहन सबसे बड़ा कारण

Published: Wed, 23 Sep 2026 05:25 AM (IST)

दिल्ली की खराब हवा के लिए स्थानीय स्रोत 80-85% जिम्मेदार हैं, जिसमें वाहन 46% के साथ सबसे बड़ा कारण हैं। ...और पढ़ें

रोहतक रोड पर जखीरा के पास टूटी सड़क पर उड़ती धूल बढ़ा रही वायु प्रदूषण। जागरण

रोहतक रोड पर जखीरा के पास टूटी सड़क पर उड़ती धूल बढ़ा रही वायु प्रदूषण। जागरण

HighLights

  1. दिल्ली के 80-85% प्रदूषण के लिए स्थानीय स्रोत जिम्मेदार।

  2. स्थानीय स्रोतों में वाहन 46% हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़े कारक।

  3. प्रदूषण नियंत्रण के लिए साल भर प्रभावी कार्ययोजना की आवश्यकता।

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली की खराब हवा के लिए केवल बाहरी स्रोतों को जिम्मेदार मानना सही तस्वीर नहीं है। सच यह है कि इसमें स्थानीय स्रोतों की भूमिका सर्वाधिक है। विशेषज्ञ दिल्ली के प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी 80 से 85 प्रतिशत तक मानते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी स्वीकार किया है कि यह दिल्ली का अपना ही प्रदूषण है, जो साल भर यहां की हवा खराब रखता है। साथ ही साल भर प्रदूषण नियंत्रण के उपाय न होने से सर्दियों में विकराल रूप में नजर आता है।

आइआइटीएम पुणे की निर्णय सहयोग प्रणाली (डीएसएस) के आंकड़ों पर किए गए सीएसई विश्लेषण पर गौर करें तो भी यह प्रमाणित हो जाता है। इसके अनुसार स्थानीय स्रोतों में वाहनों की हिस्सेदारी सबसे अधिक 46 प्रतिशत रही, जबकि उद्योग 22 प्रतिशत के साथ दूसरे बड़े स्रोत रहे।

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घरेलू स्रोत 11, निर्माण छह, कचरा जलाना चार और सड़क की धूल तीन प्रतिशत रही। इससे स्पष्ट है कि शहर के भीतर होने वाला उत्सर्जन हवा की गुणवत्ता सुधारने की बड़ी चुनौती है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अध्ययन भी वाहन, उद्योग, निर्माण, सड़क की धूल, घरेलू ईंधन और कचरा जलाने को प्रमुख स्थानीय स्रोतों में गिनाते हैं।

सभी नियम तात्कालिक, वर्ष भर के लिए कुछ नहीं

स्थानीय स्रोतों पर नियंत्रण के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोेग (सीएक्यूएम) और डीपीसीसी की ओर से कहने के लिए अनेक उपाय लागू हैं। सीएक्यूएम ने 2026 में उद्योगों के कण उत्सर्जन के लिए अलग निर्देश जारी किए हैं।

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निर्माण और विध्वंस गतिविधियों में धूल नियंत्रण तथा मलबे के प्रबंधन के लिए भी निर्देश जारी किया गया है। सड़क की धूल नियंत्रित करने के लिए यांत्रिक सड़क सफाई मशीनों के संचालन के मानक भी तय किए गए हैं।

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वाहनों के मामले में सीएक्यूएम ने मई 2026 से वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसीसी) के बिना वाहनों में ईंधन भरने पर रोक लगाई है। साथ ही दिल्ली एवं एनसीआर में नए पंजीकृत तिपहिया वाहनों के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अनिवार्य करने का निर्देश भी जारी किया गया है।

डीपीसीसी की व्यवस्था में भी निर्माण स्थलों की धूल, उद्योग, वाहन, जनरेटर सेट और खुले में कचरा जलाने जैसे स्रोतों की निगरानी शामिल है। समिति के पास वास्तविक समय में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और पूर्वानुमान की व्यवस्था भी है।

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लेकिन ये सभी नियम मुख्यतया सर्दियों के लिए हैं। यहां तक ट्रकों के दिल्ली में प्रवेश पर भी सर्दियों में हवा के जहरीला होने पर ही रोक लगती है। सर्दियों से इतर इस पहलू पर कभी सोचा ही नहीं जाता।

नया अध्ययन, नई उम्मीद

स्थानीय स्रोतों की सही हिस्सेदारी तय करने के लिए सीएक्यूएम ने 500×500 मीटर के ग्रिड स्तर पर उच्च-रिजोल्यूशन उत्सर्जन सूची और सोर्स अपार्शन्मेंट का नया ढांचा तैयार किया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग अध्ययनों के आंकड़ों में मौजूद अंतर को कम कर एक समान वैज्ञानिक आधार तैयार करना है।

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यानी चुनौती अब नियम बनाने की ही नहीं, उनके सालभर प्रभावी क्रियान्वयन की भी है। ऐसे में वाहनों, उद्योग, निर्माण और धूल जैसे स्थानीय स्रोतों पर लगातार नियंत्रण के बिना हवा की गुणवत्ता में स्थायी सुधार मुश्किल रहेगा।


दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) अगस्त में 100 से नीचे था, लेकिन सितंबर आते- आते यह 170 के पार पहुंच चुका है, जबकि अभी तापमान में उल्लेखनीय गिरावट नहीं आई है। यह स्थिति संकेत देती है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या केवल सर्दियों तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसून के कुछ महीनों को छोड़कर पूरे वर्ष बनी रहती है।

ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण की कार्रवाई केवल सर्दियों में तेज करने के बजाय पूरे साल चलने वाली कार्ययोजना के तहत होनी चाहिए। इस योजना को सही समय पर लागू करने के साथ उसकी नियमित निगरानी भी जरूरी है। सितंबर से ही यातायात जाम और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। सभी निर्माण स्थलों की नियमित निगरानी होनी चाहिए।

पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय कर पराली के समय पर निस्तारण की योजना प्रभावी ढंग से लागू करनी होगी, ताकि खुले में जलाने की घटनाओं को रोका जा सके। इसके लिए एक मजबूत और पूर्ण निगरानी तंत्र तैयार करना भी आवश्यक है, ताकि तय उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके।

- डॉ. राधा गोयल, उप निदेशक, इंडियन पल्यूशन कंट्रोल एसोसिएशन