दिल्ली में वायु प्रदूषण के पीछे क्या सिर्फ धूल-धुआं जिम्मेदार? केमिकल रिएक्शन से ज्यादा जहरीली हो रही हवा
दिल्ली में वायु प्रदूषण के पीछे केवल धुआं और धूल का योगदान नहीं है, बल्कि गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया से ...और पढ़ें
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दिल्ली की हवा में मौजूद कई गैसों से हो रहा केमिकल रिएक्शन, जागरण।
HighLights
गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया से महीन एरोसोल कण बनते हैं।
आईआईटीएम अध्ययन ने द्वितीयक प्रदूषकों की भूमिका बताई।
वाहन, एरोसोल पीएम2.5 के प्रमुख योगदानकर्ता हैं।
राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली की जहरीली हवा के लिए सिर्फ वाहनों का धुआं, सड़क की धूल और कचरा जलाना ही जिम्मेदार नहीं है। हवा में मौजूद कई गैसें भी आपस में रासायनिक प्रतिक्रिया करके बेहद महीन प्रदूषक कण बनाती हैं।
इन्हें एरोसोल कहा जाता है। ये कण हवा में लंबे समय तक मौजूद रह सकते हैं और सांस के जरिये शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
क्या है प्रदूषकों के रासायनिक स्त्रोत
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) पुणे द्वारा न्यू राजेंद्र नगर में शुरू की गई नई प्रयोगशाला के शुरुआती विश्लेषण में इन कणों की भूमिका सामने आई है। इससे प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल धूल और धुएं पर कार्रवाई के बजाय प्रदूषकों के रासायनिक स्रोतों को समझना भी जरूरी हो गया है।
क्या होते हैं एरोसोल?
वायुमंडल में मौजूद बेहद छोटे ठोस कणों और तरल बूंदों को एरोसोल कहा जाता है। इनमें धूल, धुआं, कालिख और अन्य सूक्ष्म कण शामिल हो सकते हैं। पीएम 2.5 ऐसे कणों का समूह है, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है।
कुछ कण सीधे वाहनों, उद्योगों और ईंधन जलने से निकलते हैं। वहीं, कुछ वायुमंडल में मौजूद गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनते हैं। इन्हें द्वितीयक एरोसोल कहते हैं।
वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) से द्वितीयक कार्बनिक एरोसोल बन सकते हैं। वहीं, सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड और अमोनिया जैसी गैसों की प्रतिक्रियाओं से सल्फेट और नाइट्रेट जैसे द्वितीयक अकार्बनिक कण बनते हैं।
आईआईटीएम के विश्लेषण में सामने आई हिस्सेदारी
शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के पीएम 2.5 प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत रही। द्वितीयक कार्बनिक एरोसोल का योगदान 18.4 प्रतिशत और द्वितीयक अकार्बनिक एरोसोल का 16.5 प्रतिशत आंका गया। सड़क की धूल की हिस्सेदारी 10.9 प्रतिशत थी। कचरा जलाने का योगदान पांच प्रतिशत दर्ज किया गया।
प्रदूषण में 25 अक्टूबर को अनुमानित योगदान
- वाहन - 25 प्रतिशत
- द्वितीयक कार्बनिक एरोसोल - 18.4 प्रतिशत
- द्वितीयक अकार्बनिक एरोसोल - 16.5 प्रतिशत
- सड़क की धूल - 10.9 प्रतिशत
- कचरा जलाना - 5 प्रतिशत
(ये आंकड़े दिन विशेष के शुरुआती विश्लेषण पर आधारित हैं। अलग-अलग दिनों में प्रदूषण के स्रोतों की हिस्सेदारी बदल सकती है।)
उत्सर्जन घटाने की चुनौती
दिल्ली में आईआईटीएम की नई एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एरोसोल टॉक्सिसिटी एनालिसिस लैब (एएटीएएल) करीब 80 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित की गई है, इसमें 25 उन्नत उपकरण हैं। इसका उद्देश्य प्रदूषकों की संरचना, उनके स्रोत और संभावित स्वास्थ्य प्रभावों का विश्लेषण करना है।
दिल्ली सरकार के प्रयास
दिल्ली सरकार वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण, पीयूसी जांच, सड़क की मशीनों से सफाई, पानी के छिड़काव, निर्माण की धूल रोकने, कचरा और जैव ईंधन जलाने पर कार्रवाई तथा सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने जैसे उपाय कर रही है। ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) के तहत भी प्रदूषण बढ़ने पर अतिरिक्त पाबंदियां लागू की जाती हैं।
लेकिन अब चुनौती यह है कि सीधे निकलने वाले कणों के साथ उन गैसों के उत्सर्जन को भी घटाया जाए, जो हवा में पहुंचकर नए प्रदूषक कण बनाती हैं।
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