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दिल्ली में प्रदूषण की 72 साल पुरानी कहानी, धूल भरी आंधियों से AI कैमरों तक; फिर भी हवा साफ क्यों नहीं?

Published: Sat, 24 Oct 2026 07:40 PM (GMT+05:30)

दिल्ली में वायु प्रदूषण से लड़ाई का इतिहास 72 साल पुराना है, जो धूल भरी आंधियों से शुरू होकर अब ...और पढ़ें

दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पानी का छिड़काव किया गया। जागरण

दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पानी का छिड़काव किया गया। जागरण

HighLights

  1. दिल्ली में प्रदूषण से लड़ाई का इतिहास 72 साल पुराना।

  2. न्यायिक हस्तक्षेप से लेकर AI कैमरों तक निगरानी तकनीक का विकास।

  3. PM2.5 पर ध्यान और उत्सर्जन में कमी अब भी चुनौती।

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में वायु प्रदूषण से लड़ाई का इतिहास सात दशक से अधिक पुराना है। वर्ष 1954 में धूल भरी आंधियों को लेकर अध्ययन हुआ तो 1965 में हवा में मौजूद कणों की रासायनिक संरचना का विश्लेषण किया गया।

समय के साथ प्रदूषण का मुद्दा वैज्ञानिक शोध से निकलकर जनस्वास्थ्य, न्यायिक हस्तक्षेप और सरकारी नीतियों तक पहुंचा। आज निगरानी के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), कैमरों और जीपीएस का इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन प्रदूषण में स्थायी कमी अब भी बड़ी चुनौती है।

दिल्ली की ओर बढ़ने का संकेत

वर्ष 1954 के एक अध्ययन में सवाल उठाया गया था कि क्या 1952 और 1953 की गर्मियों में दिल्ली में असामान्य धूल भरी आंधियां राजस्थान के रेगिस्तान के दिल्ली की ओर बढ़ने का संकेत थीं? हालांकि, अध्ययन ने इसकी पुष्टि नहीं की। इसके बाद 1960 से 1962 के बीच जुटाए गए वायुमंडलीय कणों के नमूनों पर आधारित शोध 1965 में प्रकाशित हुआ।

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अदालतों से बदली प्रदूषण नियंत्रण की दिशा

  • वर्ष 1985 में पर्यावरण अधिवक्ता एमसी मेहता ने दिल्ली के प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए हस्तक्षेप हुए।
  • वर्ष 1996 में सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट स्लो मर्डर ने वाहनों से निकलने वाले धुएं के स्वास्थ्य पर असर को प्रमुखता से उठाया। 1997 में केंद्र सरकार ने दिल्ली के प्रदूषण पर श्वेतपत्र और कार्ययोजना जारी की।
  • वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक परिवहन की बसों को 31 मार्च 2001 तक सीएनजी पर चलाने का निर्देश दिया। इसी साल प्रदूषण नियंत्रण उपायों की निगरानी के लिए पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण बनाया गया।
  • वर्ष 2016 में दिल्ली में सम-विषम योजना लागू हुई, जबकि 2017 में प्रदूषण स्तर के अनुसार कार्रवाई के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) आया। बाद में बदरपुर थर्मल पावर प्लांट बंद किया गया। स्माॅग टावर लगाए गए। हालांकि, उनके व्यापक असर पर सवाल उठे।
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अब एआई कैमरे, लेकिन पीएम 2.5 पर जोर जरूरी

दिल्ली और एनसीआर में समन्वित कार्रवाई के लिए 2021 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) बना। अक्टूबर 2026 में दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के स्रोतों और नियंत्रण उपायों पर नजर रखने के लिए एआई आधारित इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की घोषणा की। निर्माण स्थलों पर एआई कैमरों और सड़क सफाई की निगरानी में GPS का इस्तेमाल हो रहा है। 13 नए सतत वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र शुरू होने के बाद दिल्ली में इनकी संख्या 60 हो गई है।

पीएम 2.5 पर अधिक ध्यान देना होगा

हालांकि, सेंटर फाॅर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के वायु गुणवत्ता विश्लेषक मनोज कुमार के मुताबिक, निगरानी के साथ प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है। सर्दियों में स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाले पीएम 2.5 पर अधिक ध्यान देना होगा।

सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अमोनिया जैसी गैसों की रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनने वाले सूक्ष्म कणों को रोकने के लिए उद्योगों, घरेलू ईंधन और थर्मल पावर प्लांटों से होने वाले उत्सर्जन में कमी लानी होगी।

दिल्ली की चुनौती अब नई तकनीक अपनाने से आगे बढ़कर प्रदूषण के उत्सर्जन में लगातार और ठोस कमी लाने की है।

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