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दिल्ली में 9 साल में कितना बदला मानसिक स्वास्थ्य? AIIMS के सर्वे से सामने आएगी पूरी तस्वीर

Published: Sun, 04 Oct 2026 06:45 AM (IST)

एम्स दिल्ली नौ साल बाद राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-दो (एनएमएचएस-दो) कर रहा है, जो दिल्ली में मानसिक रोगों के बोझ ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।

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HighLights

  1. एम्स कर रहा दिल्ली में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-दो।

  2. सर्वे बताएगा नौ साल में मानसिक रोगों का बोझ कितना बदला।

  3. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और उपचार की कमी का आकलन।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली में मानसिक रोगों का बोझ पिछले नौ वर्षों में कितना बदला है, इसका जवाब अब एम्स के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-दो (एनएमएचएस-दो) से मिलेगा।

मानसिक रोग कितने लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, कितने लोगों को उपचार की आवश्यकता है और कितने लोगों तक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच रही हैं, इन सभी पहलुओं की पड़ताल सर्वे में की जा रही है।

एम्स के सेंटर फार कम्युनिटी मेडिसिन के प्रो. डा. हर्षल रमेश साल्वे के अनुसार एनएमएचएस-दो का उद्देश्य मानसिक रोगों की व्यापकता के साथ उपचार में कमी, स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल, अक्षमता और मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था का आकलन करना है।

इससे पहले नौ वर्ष पहले हुए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति की बड़ी तस्वीर सामने आई थी। अब एनएमएचएस-2 से यह पता चलेगा कि इस अवधि में दिल्ली में स्थिति किस दिशा में बदली है।

रोगियों की संख्या नहीं, उपचार की कमी भी पता लगेगी

प्रो. डा. हर्षल रमेश साल्वे के अनुसार एनएमएचएस-दो में मानसिक रोगों की व्यापकता के साथ यह भी देखा जा रहा है कि बीमारी से प्रभावित लोगों में कितने उपचार ले रहे हैं और कितने स्वास्थ्य व्यवस्था से बाहर हैं।

राष्ट्रीय सर्वेक्षण की आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसमें 18 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों के साथ 13 से 17 वर्ष के किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति का भी आकलन किया जा रहा है।

दिल्ली की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की भी हुई जांच

एम्स ने मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली का आकलन भी किया है। इसे लेकर 18 सितंबर को आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों, स्वास्थ्यकर्मियों, सरकारी व संस्थागत प्रतिनिधियों तथा सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया।

इसमें मानव संसाधन, बुनियादी ढांचा, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षण, जनजागरूकता और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय सहित कई पहलुओं की समीक्षा की गई।

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