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जंगल, जल और सितारों की दुनिया; आंखों के रास्ते मन तक पहुंचती है देब्रिगढ़ की यह यात्रा

Published: Fri, 30 Oct 2026 06:01 PM (IST)

ओडिशा का देब्रिगढ़ वन्यजीव अभयारण्य प्रकृति, वन्यजीव और इतिहास का एक अनूठा संगम है, जो यात्रा को यादगार अनुभव बनाता है।

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HighLights

  1. देब्रिगढ़ में रोमांचक जंगल सफारी और वन्यजीव दर्शन।

  2. हीराकुंड जलाशय में नौका विहार का अद्भुत अनुभव।

  3. इतिहास और प्रकृति का संगम, वीर सुरेंद्र साई का ठिकाना।

हिमांशु शेखर, रायपुर। यात्रा का आनंद सिर्फ नई जगहों को देखने भर में नहीं, उन्हें महसूस करने में होता है। कुछ यात्राएं आंखों के रास्ते मन तक पहुंचती हैं और लंबे समय तक स्मृतियों में बसी रहती हैं। जब किसी सफर में जंगल की खामोशी, पहाड़ों की हरियाली, जलाशय की विशालता और इतिहास का अध्याय एक सामने होता है तो वह महज यात्रा नहीं रहती, बल्कि जीवन का एक सुंदर अनुभव बन जाती है।

ओडिशा का देब्रिगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ऐसी ही अनुभूति कराता है। संबलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित यह अभयारण्य बारापहाड़ की 12 पहाड़ियों और हीराकुंड जलाशय के विशाल जलविस्तार के बीच फैला है।

पहाड़ियों और जंगल में पसरी हरियाली और दूर तक फैला पानी ऐसा परिदृश्य बनाते हैं, जिसे देखकर लगता है कि प्रकृति ने यहां अपने रंग पूरी उदारता से बिखेरे हैं। देब्रिगढ़ का यही प्राकृतिक भाव पर्यटकों को लुभाता है।

देब्रिगढ़ के जंगल की अपनी एक लय है। पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप, पत्तियों की सरसराहट और दूर से सुनाई देती पक्षियों की आवाज सफर को अलग अनुभव देती है।

जंगल सफारी इस अनुभव का सबसे रोमांचक हिस्सा है। यहां भारतीय बाइसन यानी गौर, हाथी, तेंदुआ, सांभर और चार सींग वाले हिरण जैसे वन्यजीवों को देखने का अवसर मिलता है।

पक्षियों और तितलियों की कई प्रजातियां यहां दिखती हैं। सफारी की खासियत यह है कि अगले मोड़ पर क्या सामने आएगा, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। कभी घने पेड़ों के बीच से कोई वन्यजीव दिखाई देता है तो कभी सामने पहाड़ी आ जाती है।

देब्रिगढ़ की खूबसूरती बेस कैंप से शुरू होकर सिर्फ जंगल तक ही सीमित नहीं है। हीराकुंड जलाशय इस पूरे प्राकृतिक परिदृश्य को एक अलग आयाम देता है। पहाड़ियों से घिरी विशाल जलराशि के बीच नौका विहार का अनुभव सफारी से बिल्कुल अलग है।

पानी पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती नाव, दोनों ओर फैली पहाड़ियां और दूर तक दिखाई देता जलविस्तार कुछ देर के लिए समय को थाम सा देता है। खासकर शाम के समय यह दृश्य और आकर्षक हो जाता है। डूबते सूरज की रोशनी जब पानी पर पड़ती है तो पूरा जलाशय सुनहरी आभा से भर उठता है।

पहाड़ियों की ओट में सूरज के छिपने का दृश्य आंखों में ठहर सा जाता है। जलाशय के टापुओं तक पहुंचना भी इस यात्रा का अलग अनुभव है। पानी, जंगल और पहाड़ का यह संगम देब्रिगढ़ को केवल वन्यजीव पर्यटन का केंद्र नहीं रहने देता, बल्कि इसे प्रकृति के बीच समय बिताने की जगह बनाता है।

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सफारी के बाद सितारों की दुनिया

देब्रिगढ़ में पर्यटन का अनुभव दिन ढलने के साथ खत्म नहीं होता। यहां ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के साथ पर्यटकों के लिए ठहरने और प्रकृति को करीब से देखने की सुविधाएं भी हैं। ईको-काटेज में ठहरना अपने आप में अलग अनुभव है।

दिनभर जंगल और जलाशय के बीच घूमने के बाद रात का सन्नाटा इस जगह का एक और रूप सामने लाता है। ग्लास-रूफ स्टारगेजिंग रूम से खुले आसमान को देखना इस अनुभव को और खास बना देता है। शहर की रोशनी से दूर यहां रात का आकाश कहीं ज्यादा साफ दिखाई देता है।

ऊपर तारों की दुनिया और नीचे जंगल का शांत विस्तार देब्रिगढ़ की यात्रा को एक अलग स्मृति में बदल देता है। सामुदायिक आधारित ईको-टूरिज्म और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों ने भी यहां पर्यटन की संभावनाओं को बढ़ाया है।

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बारापहाड़ में इतिहास की पदचाप

देब्रिगढ़ की कहानी जंगल और वन्यजीवों से आगे जाती है। बारापहाड़ की पहाड़ियों में स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृतियां भी मौजूद हैं। 1857 के विद्रोह के दौर में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले वीर सुरेंद्र साईं ने इन दुर्गम इलाकों को अपना ठिकाना बनाया था।

घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और दुर्गम रास्ते उनके लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच बने। इन्हीं इलाकों से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला संघर्ष को आगे बढ़ाया। आज जब कोई पर्यटक इन पहाड़ियों और जंगलों के बीच से गुजरता है तो प्रकृति के साथ इतिहास भी उसके सफर का हिस्सा बन जाता है।

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कैसे पहुंचें और कहां रुकें

रायपुर से संबलपुर पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग, दोनों विकल्प उपलब्ध हैं। रायपुर स्टेशन से दुर्ग-पूरी एक्सप्रेस और मुंबई एलटीटी-पूरी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें संचालित हैं। सड़क मार्ग से रायपुर–सरायपाली/बसना–बरगढ़ होते हुए संबलपुर पहुंचा जा सकता है।

अपनी कार या कैब से यह दूरी करीब पांच घंटे में पूरी होती है। अन्य प्रदेशों से आने वाले पर्यटक झारसुगुड़ा स्थित वीर सुरेंद्र साई एयरपोर्ट तक हवाई यात्रा कर सकते हैं।

भुवनेश्वर स्थित एयरपोर्ट से संबलपुर करीब 280 किमी दूर है। संबलपुर में होटल और डोरमेटरी उपलब्ध हैं। देब्रिगढ़ में नेचर कैंप के काटेज स्टे के लिए अग्रिम बुकिंग जरूरी है। बेस कैंप के पास भी काटेज की सुविधा उपलब्ध है।

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