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कैसे सस्ती होगी दाल? त्योहारों से पहले बिना इंपोर्ट ड्यूटी हटाए दाम पर काबू पाने का मास्टर प्लान! ये है सरकार की तैयारी

Published: Wed, 14 Oct 2026 12:18 PM (IST)

सरकार दालों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क में कटौती नहीं करेगी, बल्कि घरेलू उत्पादन और वैश्विक उपलब्धता पर भरोसा कर रही है।

दालों पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने की तैयारी नहीं

दालों पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने की तैयारी नहीं

HighLights

  1. सरकार दालों पर आयात शुल्क नहीं घटाएगी।

  2. बफर स्टॉक से बाजार में दालों की आपूर्ति बढ़ाएगी।

  3. निजी कंपनियों के स्टॉक की घोषणा अनिवार्य कर सकती है।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| दालों की कीमतों में तेजी के बीच कीमतों को कंट्रोल करने के लिए आयात शुल्क को कम किए जाने की चर्चा थी। केंद्र सरकार फिलहाल इनके आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी घटाने की योजना नहीं बना रही है। सरकार का मानना है कि अल नीनो की आशंकाओं के बावजूद खरीफ फसलों की घरेलू पैदावार की संभावनाओं पर बड़ा असर नहीं पड़ा है और ग्लोबल मार्केट में भी दालों की पर्याप्त उपलब्धता है। ऐसे में फिलहाल आयात शुल्क में कटौती की जरूरत नहीं दिख रही है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता मामले विभाग की सचिव निधि खरे ने बताया कि सरकार दालों की आपूर्ति और कीमतों पर लगातार नजर रख रही है। कुछ किस्मों की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद खुदरा बाजार में दालों के दाम में असामान्य तेजी नहीं आई है। सरकार की मौजूदा आयात नीति में भी बदलाव की योजना नहीं है।

पीली मटर और मसूर पर लागू है आयात शुल्क

केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में पीली मटर के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लगाया था। इससे दिसंबर 2023 से जारी ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की व्यवस्था समाप्त हो गई थी। पीली मटर को चने की तुलना में सस्ते विकल्प के तौर पर देखा जाता है। इसी तरह मार्च 2025 में मसूर के आयात पर 10 प्रतिशत शुल्क लगाया गया था। इन दोनों शुल्कों की अवधि वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक बढ़ाई गई है।

हालांकि, घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने अरहर और उड़द के शुल्क मुक्त आयात की व्यवस्था 31 मार्च 2027 तक जारी रखी है। इससे इन दालों की घरेलू आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।

दालों की कीमतें कंट्रोल करने का सरकारी प्लान

दालों की कीमतों में तेजी रोकने के लिए सरकार अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल करने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के मुताबिक फिलहाल सरकारी बफर स्टॉक में करीब 45 लाख टन दालें मौजूद हैं। यह निर्धारित 35 लाख टन के बफर मानक से 10 लाख टन अधिक है। उपभोक्ता मामले विभाग की सचिव निधि खरे के मुताबिक, बाजार में दालों की सप्लाई बढ़ाने और कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए इस स्टॉक को कई फेजेस में जारी किया जाएगा।

सरकार की योजना रबी फसलों की बुवाई पूरी होने के बाद जरूरत के अनुसार दालें बाजार में उतारने की है। इस स्टॉक का इस्तेमाल खरीफ फसलों के उत्पादन में कमी आने या आगामी रबी सीजन की पैदावार उम्मीद से कम रहने की स्थिति में भी किया जा सकता है।

खरीफ सीजन में दालों की बुवाई का रकबा बढ़ा

खरीफ सीजन में अरहर, उड़द और मूंग जैसी प्रमुख दालों की खेती का रकबा पिछले साल के मुकाबले मामूली बढ़कर 1.171 करोड़ हेक्टेयर हो गया है। हालांकि, व्यापार क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, कुछ दालों, खासकर अरहर की उत्पादकता पर निगेटिव असर पड़ने की आशंका है।

यही वजह है कि सरकार घरेलू उत्पादन के साथ-साथ बाजार में उपलब्ध स्टॉक और आयात की स्थिति पर भी नजर रख रही है। यदि घरेलू उत्पादन में कमी आती है, तो सरकारी स्टॉक के जरिए बाजार में आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है।

दालों की महंगाई पर सरकार की नजर

सितंबर 2026 में दालों की खुदरा महंगाई दर सालाना आधार पर 4.68 फीसदी रही। कुछ किस्मों की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद सरकार का कहना है कि फिलहाल आयात शुल्क घटाने की जरूरत नहीं है। मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक दालों की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी रोकने के लिए सरकार निजी कंपनियों और कारोबारियों के स्टॉक की घोषणा अनिवार्य करने जैसे उपायों पर भी विचार कर सकती है। चीनी और गेहूं जैसी अन्य उत्पादों के मामले में भी इस तरह के उपायों का इस्तेमाल किया गया है।

20% दालें आयात करता है भारत

भारत अपनी सालाना दाल खपत का करीब 18 से 20 फीसदी हिस्सा आयात करता है। इसमें अरहर, उड़द, मसूर, पीली मटर और चना शामिल हैं। भारत कनाडा, रूस, ब्राजील, म्यांमार और अफ्रीकी देशों से दालों का आयात करता है।

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ऐसे में घरेलू उत्पादन, वैश्विक उपलब्धता और सरकारी बफर स्टॉक की स्थिति दालों की कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक होंगे। फिलहाल सरकार का जोर आयात शुल्क घटाने के बजाय उपलब्ध स्टॉक का सही इस्तेमाल करके घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने पर है।