चावल की कीमतों में 25% तक की बढ़ोतरी, ग्लोबल डिमांड भी हाई! आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का कितना असर?
देश में चावल की कीमतें कम बारिश और वैश्विक मांग बढ़ने के कारण एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच ...और पढ़ें

चावल की कीमतों में तेज उछाल
HighLights
भारत में चावल की कीमतें एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचीं।
कम बारिश और वैश्विक मांग में वृद्धि मुख्य कारण हैं।
आम उपभोक्ताओं के बजट पर महंगाई का दबाव बढ़ गया है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| देश में खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। चीनी और प्याज के साथ शुरू हुआ सिलसिला अब खाद्य तेल, सब्जियां और चावल पर भी देखने को मिल रहा है। कम बारिश और ग्लोबल मार्केट में बढ़ती मांग के बीच भारतीय चावल की कीमतें एक साल के हाई लेवल पर पहुंच गई हैं। व्यापारियों का कहना है कि खरीफ सीजन की फसल को लेकर बढ़ती चिंताओं और डोमेस्टिक सप्लाई में कमी के कारण निर्यात कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का 5 प्रतिशत टूटा हुआ उसना (Parboiled) चावल 371-377 डॉलर प्रति टन के भाव पर पहुंच गया है, जो पिछले हफ्ते 369-375 डॉलर प्रति टन था। वहीं 5 प्रतिशत टूटा हुआ सफेद चावल 368-373 डॉलर प्रति टन के बीच बिक रहा है। यह आंकड़ा पिछले एक साल में सबसे ऊंचा माना जा रहा है।
ग्लोबल डिमांड हाई होने से बढ़ीं कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चावल की सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख चावल एक्सपोर्टर देशों में भी कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। फिलीपींस सहित कई देश इंपोर्ट बढ़ा रहे हैं, जिससे ग्लोबल डिमांड हाई हो रही है। हालांकि एक दिलचस्प फैक्ट यह भी है कि भारत के सरकारी गोदामों में चावल का भंडार अभी रिकॉर्ड स्तर पर है।
आम उपभोक्ताओं पर कैसा रहेगा असर?
खाने-पीने की कीमतें पहले से ही बढ़ी हुई हैं और हाल के महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ऐसे में चावल की कीमतों में जारी तेजी आम उपभोक्ताओं के बजट पर असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह में मानसून की स्थिति और खरीफ फसल का अंतिम उत्पादन अनुमान चावल बाजार की दिशा तय करेगा। यदि बारिश की कमी बनी रहती है तो घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
कम बारिश बनी मुसीबत
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगस्त में सामान्य से 16 प्रतिशत कम बारिश हुई और मौसम विभाग ने सितंबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। इससे धान उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। कई बिजनेस हाउसेस का मानना है कि बारिश की कमी के कारण फसल प्रोडक्शन के अनुमान लगातार घटाए जा रहे हैं, जिसका असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
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धान की खेती वाले कई राज्यों में कमजोर मानसून के कारण बुवाई भी प्रभावित हुई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में कम रहा है, जिसमें धान का क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है।
