फिर दिखा होर्मुज स्ट्रेट तनाव का असर, धीमा हुआ चावल का कारोबार! बासमती के मोर्चे पर बढ़ी पाकिस्तान-थाईलैंड से हमारी लड़ाई
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारतीय चावल निर्यात की रफ्तार धीमी हुई है, जिससे माल ढुलाई लागत बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कड़ी हो गई है।

चावल निर्यात सुस्त
HighLights
पश्चिम एशिया संघर्ष ने भारतीय चावल निर्यात की रफ्तार धीमी की।
बढ़ती ढुलाई लागत और घरेलू धान की ऊंची कीमतें चुनौती।
पाकिस्तान-थाईलैंड से प्रतिस्पर्धा, लाल सागर में सुरक्षा चिंताएं।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारतीय चावल के कारोबार में देखने को मिल रहा है। भारत के चावल निर्यात की रफ्तार फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली छमाही में सुस्त रही है। अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान बासमती और गैर-बासमती चावल का निर्यात सालाना आधार पर सिर्फ 2.5 प्रतिशत बढ़कर 5.77 अरब डॉलर रहा। पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल के कारण माल की ढुलाई में रुकावट और फ्रेट लागत बढ़ने से निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ी हैं। वहीं, इंपोर्टर देश भी अनिश्चितता के कारण चावल का स्टॉक बढ़ाने में सावधानी बरत रहे हैं।
सितंबर 2026 में भारत ने 96 करोड़ डॉलर का चावल एक्सपोर्ट किया, जो पिछले साल इसी महीने के मुकाबले 4.2 फीसदी अधिक है। हालांकि, निर्यातकों के मुताबिक, केवल निर्यात मूल्य में बढ़ोतरी से कारोबार की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चलता। घरेलू धान की ऊंची कीमतों, अंतरराष्ट्रीय मांग में अनिश्चितता और ट्रांस्पोर्टिंग कॉस्ट बढ़ने से निर्यात प्रभावित हुआ है।
इन कारणों से हो रही सप्लाई की समस्या
होर्मुज से जुड़े क्षेत्रों में संघर्ष का असर भारतीय चावल निर्यात की सप्लाई चेन पर पड़ रहा है। निर्यातकों के मुताबिक, इराक, कुवैत, बहरीन, कतर, सऊदी अरब के दम्माम और संयुक्त अरब अमीरात के जेबेल अली जैसे मुख्य बंदरगाहों पर ऑपरेशन प्रभावित हुआ है। इसके चलते निर्यातकों को ऑप्शनल और लंबे समुद्री रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिससे माल पहुंचाने में अधिक समय और खर्च लग रहा है।
सऊदी अरब का जेद्दा पोर्ट भी महत्वपूर्ण है, लेकिन लाल सागर क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं और हूती हमलों के कारण जहाजों की आवाजाही को लेकर जोखिम बना हुआ है। बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग को लेकर बढ़ते तनाव ने भी निर्यातकों की चिंता बढ़ाई है।
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रंजीत सिंह जोसन ने फाइनेंशियल एक्सप्रेस को बताया कि घरेलू धान की ऊंची कीमतें, अंतरराष्ट्रीय मांग में अनिश्चितता, महंगी लॉजिस्टिक्स और भू-राजनीतिक व्यवधान मिलकर चावल निर्यात पर दबाव बना रहे हैं।
पाकिस्तान और थाईलैंड से कॉम्पटीशन
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। पिछले एक दशक से बासमती और गैर-बासमती चावल के ग्लोबल कारोबार में भारत की प्रमुख हिस्सेदारी रही है। इसके बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में चावल एक्सपोर्ट का कुल मूल्य सालाना आधार पर 7.5 प्रतिशत घटकर 11.53 अरब डॉलर रह गया था।
भारत एशिया, वेस्ट एशिया, यूरोप और अमेरिका सहित 140 से अधिक देशों को बासमती और गैर-बासमती चावल निर्यात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत को पाकिस्तान और थाईलैंड जैसे प्रमुख निर्यातक देशों से कॉम्पटीशन का सामना करना पड़ता है।
अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुमान के अनुसार, 2027 में भारत का चावल निर्यात 4 फीसदी घटकर 2.4 करोड़ टन रह सकता है। इसकी प्रमुख वजह टूटे चावल और सफेद चावल की कम शिपमेंट मानी गई है। USDA के मुताबिक, निर्यात के लिए उपलब्ध चावल की मात्रा कम होने और कीमतें बढ़ने से भारतीय चावल की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। वैश्विक चावल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक है।
समुद्री उत्पादों के निर्यात में 13 फीसदी की बढ़ोतरी
चावल के मुकाबले समुद्री उत्पादों के निर्यात में बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-सितंबर अवधि में समुद्री उत्पादों का निर्यात सालाना आधार पर 13 फीसदी बढ़कर 4.5 अरब डॉलर पहुंच गया। वाणिज्य मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, सितंबर 2026 में फ्रोजन झींगा और मछली सहित समुद्री उत्पादों का निर्यात पिछले साल के मुकाबले 8 फीसदी बढ़ा।
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अमेरिका भारतीय समुद्री उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है। अमेरिका में मजबूत मांग के साथ यूरोपीय संघ और अन्य बाजारों में निर्यात बढ़ाने की रणनीति से इस क्षेत्र को समर्थन मिला है।
कारोबार के लिए क्या है संकेत?
चावल निर्यातकों के सामने फिलहाल तीन बड़ी चुनौतियां हैं महंगी ढुलाई, घरेलू बाजार में धान की ऊंची कीमतें और पश्चिम एशिया में अनिश्चित मांग। यदि समुद्री मार्गों पर सप्लाई की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो निर्यातकों की लागत और डिलीवरी का समय दोनों बढ़ सकते हैं।
