TVS से लेकर वाडिया-सिंघानिया तक... जब देश के बड़े कारोबारी परिवारों में संपत्ति के लिए हुआ घमासान; ये बेटे पिता से भिड़े
मल्टी-बिलियन डॉलर वाले टीवीएस ग्रुप के मुखिया वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद ...और पढ़ें

इन भारतीय दिग्गज कारोबारी परिवारों में भी खूब हुआ विवाद
HighLights
TVS ग्रुप में वेणु श्रीनिवासन परिवार में विवाद शुरू
अंबानी, रैनबैक्सी जैसे कई परिवारों में भी हुए झगड़े
गोदरेज ग्रुप का भी हाल ही में हुआ औपचारिक बंटवारा
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। मल्टी-बिलियन डॉलर वाले TVS ग्रुप के मुखिया वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस झगड़े ने परिवार को दो गुटों में बांट दिया है। इनमें एक तरफ वेणु श्रीनिवासन और उनके बेटे सुदर्शन वेणु हैं, तो दूसरी तरफ वेणु की पत्नी मल्लिका श्रीनिवासन (TAFE की चेयरपर्सन) और उनकी बेटी लक्ष्मी वेणु (सुंदरम-क्लेटन की MD) हैं।
ये तो वक्त ही बताएगा कि इस विवाद का नतीजा क्या और कैसे निकलेगा, मगर यदि हम भारत के दिग्गज कारोबारी परिवारों के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसी कई फैमिली रही हैं, जिनमें ऐसे विवाद होते रहे हैं, जिनके नतीजे में कारोबारों के बंटवारे भी होते रहे हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ टॉप परिवारों के बारे में।
रैनबैक्सी
1980 के दशक में, मोहन सिंह ने अपना बिजनेस अपने तीन बेटों - परविंदर, मंजीत और अनलजीत - के बीच बांट दिया। रैनबैक्सी परविंदर के हिस्से में आया। दो छोटे भाइयों के मन में कुछ नाराजगी तो थी, लेकिन वह कभी खुलकर सामने नहीं आई।
परिवार का यह मामला जल्द ही तब बिगड़ गया जब मोहन सिंह और परविंदर के बीच रैनबैक्सी के कंट्रोल को लेकर सबके सामने झगड़ा हुआ। इसके बाद, 1999 में बोर्डरूम में हुए एक तरह के तख्तापलट में मोहन सिंह को झुकना पड़ा और परविंदर ने कंपनी की कमान संभाल ली। शिविंदर और मालविंदर, परविंदर के बेटे हैं।
रिलायंस
रिलायंस बिजनेस एम्पायर के फाउंडर धीरूभाई अंबानी का जुलाई 2002 में निधन हो गया। इसके बाद मुकेश रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर बने, और अनिल ने वाइस-चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर का पद संभाला। नवंबर 2004 में मुकेश और अनिल के बीच का झगड़ा सबके सामने आ गया। जून 2005 में, परिवार ने रिलायंस बिजनेस को बांटने का समझौता किया, जिसकी घोषणा उनकी माँ कोकिलाबेन ने की थी।
औपचारिक बंटवारा 2006 में हुआ। मुकेश को मुख्य कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज मिली, जिसका काम पेट्रोकेमिकल्स, तेल और गैस की खोज, रिफाइनिंग और टेक्सटाइल्स के क्षेत्रों में था। अनिल को टेलीकॉम, पावर, एंटरटेनमेंट और फाइनेंशियल सर्विसेज के बिजनेस मिले।
अमरचंद मंगलदास एंड सुरेश श्रॉफ एंड कंपनी
भारत की सबसे बड़ी लॉ फर्म, 'अमरचंद मंगलदास एंड सुरेश श्रॉफ एंड कंपनी', 2015 में आपस में झगड़ रहे दो भाइयों - सिरिल श्रॉफ और शार्दुल श्रॉफ - के बीच बंट गई। शार्दुल और सिरिल की माँ ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी (इक्विटी) बड़े बेटे शार्दुल के नाम करने की वसीयत की थी, जिससे कानूनी विवाद खड़ा हो गया। आखिरकार मामला सुलझ गया और फर्म का बंटवारा हो गया।
सिंघानिया परिवार
जाने-माने उद्योगपति विजयपत सिंघानिया और उनके बेटे गौतम सिंघानिया (जो रेमंड लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं) के बीच प्रॉपर्टी को लेकर विवाद हुआ, जो कोर्ट तक पहुँच गया। 2007 के पारिवारिक समझौते के अनुसार, विजयपत सिंघानिया, उनके बेटे गौतम, और विजयपत के भाई अजयपत सिंघानिया की पत्नी और दो बेटों में से हर एक को JK हाउस (जो परिवार की प्रॉपर्टी थी) में एक-एक डुप्लेक्स मिलना था।
लेकिन गौतम यह मामला शेयरहोल्डर्स के पास ले गए, जिन्होंने इस प्लान के खिलाफ वोट किया।
किर्लोस्कर ग्रुप
21वीं सदी की शुरुआत में, किर्लोस्कर ग्रुप के मुखिया एस.एल. किर्लोस्कर के निधन के बाद हुए झगड़ों के कारण किर्लोस्कर ग्रुप का बंटवारा परिवार के सदस्यों के बीच हो गया था। विजय आर. किर्लोस्कर ने अपने विजन और बिजनेस लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ग्रुप छोड़ दिया है।
अपोलो टायर्स
ओंकार एस. कंवर के लिए विवाद कोई नई बात नहीं है। 1990 के दशक की शुरुआत में, अपोलो टायर्स का कंट्रोल किसके पास हो, इस बात को लेकर उनका अपने पिता रौनक सिंह के साथ खुला झगड़ा हुआ था। आखिरकार जीत उनकी हुई, लेकिन उससे पहले काफी विवाद सार्वजनिक हो चुका था।
2013 में, उनके भाई नरिंदर जीत कंवर ने चेन्नई में कंपनी लॉ बोर्ड में शिकायत दर्ज कराई और कंवर पर कंपनी के गलत तरीके से कामकाज चलाने का आरोप लगाया।
वाडिया ग्रुप
धीरूभाई अंबानी और रंजन पिल्लई के साथ अपने मशहूर बिजनेस झगड़ों की वजह से 'कॉर्पोरेट समुराई' कहे जाने वाले नुस्ली वाडिया का पहला टकराव अपने पिता से हुआ था। नेविल, बॉम्बे डाइंग लिमिटेड को आर.पी. गोयनका को बेचना चाहते थे, लेकिन युवा वाडिया ने इसका विरोध किया और आखिरकार टाटा और मज़दूर यूनियनों का समर्थन हासिल करके अपनी बात मनवा ली।
बजाज और गोदरेज
कुशाग्र बजाज, राहुल बजाज के ग्रुप चलाने के तरीके से सहमत नहीं थे, इसलिए उन्होंने परिवार से दो कंपनियों - एक चीनी बनाने वाली और दूसरी कंज्यूमर प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनी - को अपने नाम ट्रांसफर करने की मांग की। इसके बाद सबके सामने झगड़ा हुआ, जिसके आखिर में उन्हें वह मिल गया जो वे चाहते थे।
127 साल पुराने गोदरेज ग्रुप के संस्थापक परिवार ने आपसी सहमति से कॉर्पोरेट रीस्ट्रक्चरिंग के तहत औपचारिक बंटवारे की घोषणा की है। इसका मकसद मालिकाना हक को नए सिरे से तय करना और परिवार के सदस्यों की अलग-अलग रणनीतिक सोच को ध्यान में रखना है। अरबों डॉलर के इस बड़े ग्रुप को दो मुख्य हिस्सों में बांटा गया है - गोदरेज इंडस्ट्रीज ग्रुप (GIG) और गोदरेज एंटरप्राइजेज ग्रुप (GEG)।
