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क्यों गिरता है रुपया और कैसे तय होती है कीमत? पेट्रोल-डीजल से विदेश में पढ़ाई तक, आपके ऊपर क्या पड़ता है असर

Published: Fri, 16 Oct 2026 06:39 PM (IST)

Rupee vs Dollar Explained: भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले क्यों गिरता है, इसकी कीमत कैसे तय होती है और आम ...और पढ़ें

भारतीय रुपये का गिरना और मजबूत होना: RBI की भूमिका और आपके जीवन पर असर

भारतीय रुपये का गिरना और मजबूत होना: RBI की भूमिका और आपके जीवन पर असर

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बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| rupee vs dollar explained: भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 97 रुपये के बॉर्डर पर पहुंचने के बाद दबाव में था। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी और डॉलर की खरीद पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाए। इन फैसलों से रुपये को सहारा मिला और उसमें तेजी देखने को मिली। आलम यह रहा कि डॉलर के मुकाबले रुपया शुक्रवार को लगातार छठे कारोबारी सत्र में मजबूत हुआ। यह 7 पैसे की बढ़त के साथ 94.92 (अस्थायी) प्रति डॉलर पर रहा।

अब सवाल है कि आखिर रुपया गिरता क्यों है? इसके गिरने और मजबूत होने से सीधा आपके ऊपर क्या असर पड़ता है? और सबसे जरूरी सवाल है कि आखिर गिरते रुपया को मजबूत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI on Rupee) कब-कब एक्शन लेता है? जागरण बिजनेस से खास बातचीत के दौरान एलकेपी सिक्योरिटीज के कमोडिटी और करेंसी वाइस प्रेसिडेंट एवं रिसर्च एनालिस्ट जतीन त्रिवेदी ने पूरी तस्वीर साफ की।

उन्होंने बताया कि रुपये की मजबूती केवल आरबीआई के फैसलों पर निर्भर नहीं करती। आयात-निर्यात, विदेशी निवेश, राजकोषीय घाटा और डॉलर की वैश्विक मजबूती भी इसकी कीमत तय करते हैं। चलिए सिर्फ 5 पॉइंट्स में समझते हैं वो सबकुछ, जो आपके लिए जानना बहुत जरूरी है।

सवाल 1: रुपये को संभालने के लिए RBI ने क्या-क्या कदम उठाए?

जतीन त्रिवेदी: रुपये में गिरावट रोकने के लिए आरबीआई ने डॉलर की खरीद और विदेशी मुद्रा बाजार में होने वाली गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए कई बदलाव किए हैं। इनका मकसद डॉलर की अनावश्यक मांग को कम करना और रुपये को सहारा देना है।

  • सबसे अहम कदम तेल कंपनियों यानी ओएमसी यानी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए डॉलर खरीदने की व्यवस्था से जुड़ा है। पहले इन कंपनियों को जरूरत के मुताबिक अलग-अलग बैंकों से डॉलर खरीदने पड़ सकते थे। अब उनके लिए तय बैंक और व्यवस्था उपलब्ध कराने का कदम उठाया गया है। इससे डॉलर खरीदने की प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित होगी और बाजार में अचानक मांग बढ़ने का दबाव कम हो सकता है।
  • दूसरा अहम कदम डॉलर की खरीद पर सीमाएं लगाना है। इसका उद्देश्य बाजार में जरूरत से ज्यादा डॉलर खरीदने की गतिविधियों को रोकना है। जब कंपनियां और दूसरे कारोबारी बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदते हैं, तो उसकी मांग बढ़ती है। इससे डॉलर महंगा और रुपया कमजोर हो सकता है।

आरबीआई ने रुपये के बाजार में उन लोगों की भागीदारी पर भी पाबंदियां लगाई हैं, जिनका वास्तविक आयात-निर्यात से सीधा संबंध नहीं है। इससे रुपये में सट्टेबाजी और अनावश्यक उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए जाने की उम्मीद है। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कर व्यवस्था और निवेश से जुड़े नियमों में बदलाव रुपये को आगे सहारा दे सकते हैं। अगर विदेशी निवेश का प्रवाह बढ़ता है, तो रुपये को मजबूती मिल सकती है।

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सवाल 2: रुपये की कीमत तय कैसे होती है?

जतीन त्रिवेदी: रुपये की कीमत मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग और आपूर्ति से तय होती है। डॉलर की मांग बढ़ने और उसकी तुलना में उपलब्धता कम होने पर रुपया कमजोर होता है। इसके उलट, डॉलर की मांग घटने या उसकी उपलब्धता बढ़ने पर रुपये को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, इसके पीछे कई आर्थिक कारण काम करते हैं।

  • पहला- आयात और निर्यात: भारत कच्चे तेल, गोल्ड, मशीनों और कई जरूरी सामानों का आयात करता है। आयात का भुगतान करने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती है। अगर आयात ज्यादा और निर्यात कम हो, तो डॉलर की मांग बढ़ती है। इससे रुपये पर दबाव आ सकता है।
  • दूसरा- विदेशी निवेश: विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार और दूसरे क्षेत्रों में पैसा लगाते हैं, तो डॉलर भारत में आता है। लेकिन जब वे अपना निवेश निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे रुपये में कमजोरी आ सकती है।
  • तीसरा- राजकोषीय घाटा: सरकार की कमाई और खर्च के बीच का अंतर भी अर्थव्यवस्था की स्थिति को प्रभावित करता है। राजकोषीय घाटे और उसके वित्तपोषण से जुड़े हालात निवेशकों के भरोसे पर असर डाल सकते हैं।
  • चौथा- डॉलर की वैश्विक स्थिति: अमेरिका में ब्याज दरों, आर्थिक आंकड़ों और वैश्विक तनाव के कारण डॉलर मजबूत हो सकता है। ऐसे में रुपये समेत कई दूसरी मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है।

आरबीआई भी जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। हालांकि, उसके लिए डॉलर का पर्याप्त भंडार बनाए रखना जरूरी है। डॉलर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का अहम हिस्सा है और आर्थिक संकट के समय भी काम आता है।

सवाल 3: रुपये के गिरने से क्या नुकसान होते हैं?

जतीन त्रिवेदी: रुपये के कमजोर होने का सबसे बड़ा असर आयात की लागत पर पड़ता है। जब एक डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तो विदेश से आने वाला सामान महंगा हो जाता है।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। रुपया कमजोर होने पर तेल कंपनियों को डॉलर में भुगतान करने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इसका असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन और माल ढुलाई की लागत पर पड़ सकता है। सोने का आयात भी महंगा हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह, विदेश से मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औद्योगिक सामान और कच्चा माल खरीदने वाली कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो सामान और सेवाएं महंगी हो सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है।"

हालांकि, रुपये की कमजोरी से सभी क्षेत्रों को नुकसान नहीं होता। आईटी सेवाओं और निर्यात से जुड़ी कुछ कंपनियों को फायदा मिल सकता है। उन्हें विदेश से होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा रकम मिलती है। लेकिन यह फायदा इस बात पर भी निर्भर करता है कि उनकी लागत कितनी है और वे विदेशी मुद्रा में कितना कमाती हैं।

सवाल 4: RBI रुपये को संभालने के लिए एक्शन कब लेता है?

जतीन त्रिवेदी: आरबीआई आमतौर पर तब हस्तक्षेप करता है, जब रुपये में बहुत तेजी से गिरावट आती है या विदेशी मुद्रा बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।

अगर एक महीने के भीतर रुपये में करीब 1.5 से 2.5 फीसदी तक की तेज गिरावट आती है, तो इसे तेजी से आई कमजोरी के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे हालात में आरबीआई रुपये को सहारा देने के लिए डॉलर बेच सकता है। जब आरबीआई बाजार में डॉलर बेचता है, तो बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है। इससे डॉलर की कीमत पर दबाव पड़ सकता है और रुपये को सहारा मिल सकता है। जरूरत के मुताबिक केंद्रीय बैंक दूसरे बैंकों के माध्यम से भी बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। वैश्विक घटनाओं के कारण भी आरबीआई कदम उठाता है। उदाहरण के लिए, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, अंतरराष्ट्रीय तनाव, डॉलर की मजबूती या विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है।"

हालांकि, आरबीआई हर छोटी गिरावट को रोकने की कोशिश नहीं करता। रुपये की कीमत में कुछ उतार-चढ़ाव सामान्य है। केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य बाजार में अनावश्यक अस्थिरता को रोकना और अचानक आने वाले दबाव को कम करना होता है।

इसके अलावा, आरबीआई के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। वह लगातार डॉलर बेचकर रुपये को मजबूत रखने की कोशिश नहीं कर सकता, क्योंकि संकट के समय यही भंडार देश के काम आता है।

सवाल 5: रुपये की कीमत बढ़ने से क्या फायदे होते हैं?

जतीन त्रिवेदी: रुपये की मजबूती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि विदेश से सामान खरीदने के लिए कम रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे आयात की लागत कम हो सकती है और महंगाई पर दबाव घट सकता है। उदाहरण के लिए, अगर एक डॉलर की कीमत 90 रुपये से घटकर 85 रुपये हो जाती है, तो एक डॉलर के भुगतान के लिए पांच रुपये कम खर्च करने होंगे। हालांकि, वास्तविक फायदा आयात की कीमत, भुगतान की शर्तों और कंपनियों की लागत पर भी निर्भर करेगा।

  • पहला फायदा- कच्चा तेल सस्ता पड़ सकता है: रुपये के मजबूत होने से तेल आयात की लागत कम हो सकती है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव घट सकता है। लेकिन घरेलू ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय तेल भाव, कर और दूसरी लागतों पर भी निर्भर करती हैं।
  • दूसरा फायदा- महंगाई को राहत: इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, रसायन और विदेश से आने वाले कच्चे माल की लागत कम हो सकती है। इससे कंपनियों को राहत मिलेगी और कुछ वस्तुओं की कीमतें स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
  • तीसरा फायदा- विदेश में पढ़ाई और यात्रा सस्ती: मजबूत रुपये से विदेशी मुद्रा खरीदने के लिए कम रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे विदेश में पढ़ाई, यात्रा और डॉलर में भुगतान की लागत घट सकती है।
  • चौथा फायदा- विदेशी कर्ज का बोझ घट सकता है: जिन कंपनियों या संस्थानों को डॉलर में कर्ज चुकाना है, उन्हें रुपये की मजबूती से राहत मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ उनके कर्ज की शर्तों और मुद्रा जोखिम से बचाव की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

लेकिन रुपये की मजबूती के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। निर्यात करने वाली कंपनियों को विदेश से होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर पहले की तुलना में कम रकम मिल सकती है। इससे कुछ निर्यातकों की कमाई और प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, रुपये में लंबे समय तक मजबूती के लिए केवल आरबीआई का हस्तक्षेप काफी नहीं है। विदेशी निवेश बढ़ना, आयात-निर्यात का संतुलन सुधरना और डॉलर पर वैश्विक दबाव कम होना भी जरूरी है।

अगर विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए अनुकूल नीतियां लागू होती हैं, तो आने वाले महीनों में रुपये को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। इसके उलट, निवेश का प्रवाह कमजोर रहने और डॉलर मजबूत होने पर रुपये पर दोबारा दबाव आ सकता है।

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