131 साल पुरानी है 'नौलखा साबुन' की कहानी: 14 साल के लड़के ने लाहौर में एक कड़ाही से की थी शुरुआत
नौलखा साबुन की शुरुआत 1895 में 14 वर्षीय लाधा मल जैन ने की थी, जो बंटवारे के बाद लाहौर से ...और पढ़ें

लाहौर में हुई थी नौलखा साबुन की शुरुआत

समय कम है?
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नई दिल्ली। भारत में आज दर्जनों साबुन ब्रांड हैं। इनमें कई नहाने और कपड़े धोने वाले साबुन शामिल हैं। मगर एक साबुन ऐसा है, जिसका इतिहास काफी रोचक है। ये है नौलखा साबुन (Naulakha Sabun History), जो आज भी कपड़े धोने के लिए यूज किया जाता है। नौलखा साबुन की शुरुआत आजादी से कई दशक पहले हुई थी। इस साबुन ने बंटवारा भी झेला। किसने की थी इसकी शुरुआत, आइए जानते हैं।
131 साल पहले हुई थी शुरुआत
भारतीय स्वतंत्रता के समय घरेलू बाजार में बहुत कम FMCG प्रोडक्ट बिकते थे और जो उपलब्ध भी थे, उनमें से बहुत कम की क्वालिटी अच्छी मानी जाती थी। लेकिन 'नौलखा साबुन' शुरुआत से ही अपने ग्राहकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहा। इसकी शुरुआत 1895 में की गयी थी।
14 साल के लड़के का दिमाग
ये कहानी तब शुरू हुई जब लाधा मल जैन (Ladha Mal Jain) महज 14 साल के थे, लेकिन अपना खुद का बिजनेस शुरू करने के आइडिया को लेकर बहुत उत्साहित थे। दोस्तों से बातचीत करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि उन्हें किस काम में हाथ आजमाना चाहिए।
किसी ने उन्हें सुझाव दिया कि कपड़े धोने का साबुन बनाना एक बेहतरीन आइडिया है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज है जो खराब नहीं होती और हर घर में खूब इस्तेमाल होती है। इसी आइडिया ने उस युवा लड़के को प्रेरणी दी।
एक कड़ाही से की शुरुआत
लाधा मल ने एक बड़ी कड़ाही (बर्तन) खरीदी, कुछ जरूरी सामान लिया और प्रयोग करना शुरू कर दिया। कई बार प्रयास और गलतियों के बाद, आखिरकार वह साबुन का एक ठोस टुकड़ा बनाने में कामयाब हो गए। उनका साबुन न सिर्फ कपड़े साफ करने में असरदार था, बल्कि हाथों के लिए भी कोमल था।
मगर शुरुआत में यह कोई 'ब्रांडेड' उत्पाद नहीं था। फिर भी ईंट के आकार का वह हल्के पीले रंग का साबुन लाहौर और उसके आस-पास के इलाकों में तेजी से फेमस हुआ। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगायाजा सकता है कि तब व्यापारियों और स्टॉकिस्टों ने इसे पूरे उत्तर भारत में बेचना शुरू कर दिया।
बंटवारे के बाद आए भारत
लाधा मल को तेजी से सफलता मिली। इसके बाद उन्होंने जल्द ही एक छोटा-सा 'कारखाना' शुरू कर दिया। मगर 1947 में देश के बँटवारे के बाद, उनके परिवार को रातों-रात अपना घर और उत्पादन यूनिट्स छोड़कर भागना पड़ा।
खाली हाथ और बिना किसी जमा-पूँजी के, यह परिवार अंबाला में कुछ समय बिताने के बाद पुरानी दिल्ली आ पहुँचा।
दिल्ली में जमाया कारोबार
भारत आकर लाधा मल का परिवार बर्बादी के कगार पर था, क्योंकि पैसा था नहीं। पर तब एक चमत्कार हुआ। दिल्ली के एक साबुन व्यापारी ने, जिसने लाधा मल से साबुन की एक बड़ी खेप खरीदी थी, उनसे संपर्क किया और उनका बकाया पैसा चुका दिया।
लाधा मल ने तुरंत दिल्ली में सदर थाना रोड पर दो मंजिला मकान किराए पर लिया। परिवार ऊपर रहता और नीचे साबुन बनाना शुरू। पूरे परिवार ने फिर से कारोबार शुरू किया और सफलता हासिल की।
ऐसे मिला साबुन को नाम
लाधा मल ने साबुन की बट्टी को हल्के गुलाबी रंग के बटर पेपर में लपेटने का फैसला किया और उसका नाम 'नौलखा साबुन' रखा। ये कंपनी आज भी चल रही है, जिसमें 200 कर्मचारी काम करते हैं। अब इसका प्रोडक्ट पोर्टफोलियो भी काफी बड़ा है।
कंपनी मैन्युफैक्चरिंग के अलावा एक्सपोर्ट और सप्लायर के तौर पर भी काम करती है।
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