यूपी का ऐतिहासिक कारखाना, जिसे 5 अंग्रेजों ने बसाया और कानपुर को दिला दी दुनिया में पहचान; ये है 'लाल इमली मिल' की कहानी
कानपुर की 150 साल पुरानी 'लाल इमली' मिल का इतिहास काफी दिलचस्प है, जिसकी वजह से इस शहर को 'पूरब का मैनचेस्टर' कहा जाता था।

एआई जनरेटेड सांकेतिक तस्वीर
HighLights
1876 में स्थापित, कानपुर की सबसे पुरानी फैक्ट्री।
ब्रिटिश सेना और विश्व युद्धों में महत्वपूर्ण योगदान।
वित्तीय संकट और कुप्रबंधन के कारण हुई बंद।
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश, आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है और भारत की जीडीपी में योगदान के मामले में तीसरे नंबर पर आता है। यूपी, औद्योगिक गतिविधियों के मामले में देश में अहम स्थान रखता है। राज्य में नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर, तीन ऐसे शहर हैं जहां बड़े पैमाने औद्योगिक कारखाने संचालित होते हैं। क्या आप जानते हैं इस राज्य की सबसे पुरानी फैक्ट्री कौन-सी है, जिसका इतिहास 150 साल पुराना है? यह फैक्ट्री राज्य के कानपुर में खुली थी, और इसी मिल की वजह से कभी कानपुर को "पूरब का मैनचेस्टर" कहा जाता था।
यह कहानी है कानपुर की 'लाल इमली' (Lal Imli Mill) कपड़ा मिल की, जो उत्तर भारत के औद्योगिक इतिहास का एक बहुत बड़ा नाम है।
कब शुरू हुई लाल इमली मिल?
लाल इमली की शुरुआत 1876 में यानी आज से 150 साल पहले पांच अंग्रेज व्यापारियों ने मिलकर की थी, जिनमें जॉर्ज एलन से लेकर गेविन एस. जोन्स शामिल थे। खास बात है कि यह कपड़ा मिल अपने उच्च गुणवत्ता वाले ऊनी कपड़ों और धागों के लिए पूरे एशिया में मशहूर थी। उस जमाने में कपड़ों में 'लाल इमली' का टैग होना शान ओ शौकत का प्रतीक माना जाता था। इस मिल का आधिकारिक नाम 'कानपुर वूलन मिल्स' रखा गया था, और इसकी स्थापना मुख्य रूप से ब्रिटिश सेना के जवानों के लिए कंबल और ऊनी कपड़े बनाने के लिए की गई थी।
कानपुर वूलन मिल्स से लाल इमली क्यों पड़ा नाम?
यह मिल कानपुर के सिविल लाइंस इलाके में स्थित है, शुरुआत में इसे कानपुर वूलन मिल्स के नाम से स्थापित किया गया था। दरअसल, इस फैक्ट्री के परिसर में इमली का एक बहुत बड़ा पेड़ था, जिसमें लाल रंग की इमली लगती थी। इस फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर इसे 'लाल इमली वाली मिल' कहने लगे, और यह नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में ब्रिटिश प्रबंधन ने भी अपने वूलन प्रोडक्ट्स को 'लाल इमली' ब्रांड नाम से बेचना शुरू कर दिया।
लाल इमली का सूट बोले तो स्टेट्स सिंबल
कानपुर में संचालित इस मिल की लोकप्रियता अंग्रेजों के जमाने में इस कदर बढ़ी कि इंग्लैंड, अमेरिका और रूस तक इसकी डिमांड थी। दरअसल, लाल इमली के ऊनी कपड़ों की क्वालिटी बहुत बेहतरीन थी। बताया जाता है कि सर्दी के दिनों में भारत के समृद्ध परिवारों में 'लाल इमली' का सूट पहनना एक स्टेटस सिंबल माना जाता था।
लाल इमली मिल, अपने ऊनी कपड़ों और कंबलों के लिए जानी जाती थी और पहले और दूसरे विश्व युद्ध के समय इस मिल ने ब्रिटिश सेना और मित्र राष्ट्रों के सैनिकों के लिए लाखों कंबल और गर्म कपड़े बनाएं और कानपुर से यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में भेजे गए।
पहले हुआ पतन और फिर हुई बंद
1876 से लेकर 1947 तक लाल इमली मिल देश के साथ-साथ दुनियाभर में लोकप्रिय हुई है, लेकिन भारत की आज़ादी के बाद मानो इस मिल का पतन शुरू हो गया। 1947 के बाद लाल इमली मिल का मालिकाना हक़ ब्रिटिश इंडिया कॉर्पोरेशन के तहत भारतीय प्रबंधन के हाथ में आ गया।
1957 में मशहूर उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा ने इस मिल के शेयर खरीदे और पूरा कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया। लेकिन 3 साल बाद 1960 में मूंदड़ा स्कैम के सामने आने से इस कंपनी की वित्तीय हालत खराब हो गई। इसके बाद से लाल इमली में लगातार हड़तालें होने लगी और घाटे को देखते हुए 1981 को भारत सरकार ने इस मिल को अपने नियंत्रण में ले लिया।
सरकारी नियंत्रण में भी नहीं सुधरे हालात
हालांकि, सरकारी नियंत्रण में आने के बाद भी लाल इमली मिल क हालात नहीं सुधरे। जरूरत से ज्यादा कर्मचारी, और यूनियनों की राजनीति के कारण यह मिल लगातार घाटे में डूबती चली गई, और 2000 के दशक की शुरुआत तक इसका उत्पादन लगभग ठप हो गया। इसके बाद सरकार ने इस मिल के बचे हुए कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) देकर मिल को पूरी तरह बंद कर दिया।
ये भी पढ़ें - 74 साल पुराने दोस्त ने भारत पर जताया भरोसा, खेला ₹55259 करोड़ का दांव; इस मामले में बना नंबर 1
एक वक्त था जब इस मिल में 10,000 से ज्यादा कर्मचारी तीन शिफ्टों में काम करते थे, और यह मिल कानपुर की पहचना हुआ करती थी। लेकिन, अब लाल इमली की लाल ईंटों वाली भव्य ब्रिटिशकालीन इमारत और उसका ऐतिहासिक घंटाघर खामोश खड़े हैं।
