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30 फीट की दुकान से शुरुआत, आज एयरपोर्ट से दिग्गज कंपनियों तक में पिला रहा कॉफी; कभी सीढ़ियों के नीचे था ठिकाना

Published: Wed, 21 Oct 2026 12:15 PM (IST)

यूएस महेंद्र ने 2009 में बेंगलुरु में 5 रुपये की कॉफी से 'हट्टी कापी' की शुरुआत की, जो अब 180 ...और पढ़ें

हट्टी कापी की सक्सेस स्टोरी

हट्टी कापी की सक्सेस स्टोरी

HighLights

  1. यूएस महेंद्र ने 2009 में 'हट्टी कापी' की शुरुआत की

  2. 5 रुपये की कॉफी से 180 करोड़ का कारोबार बनाया

  3. पारंपरिक फिल्टर कॉफी को कॉर्पोरेट और एयरपोर्ट तक पहुंचाया

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए अगर आपको 5 रुपये वाले किसी आइटम से अपना कारोबार शुरू करना हो और वो भी एक 30 वर्ग फीट की दुकान से, तो क्या आप अरबपति बनने का ख्वाब देख पाएंगे? शायद आपका जवाब 'न' हो। मगर एक शख्स ने इस चीज हकीकत में बदल दिया। ये कहानी है यूएस महेंद्र की, जिन्होंने नवंबर 2009 में बेंगलुरु के गांधी बाजार में एक छोटा कॉफी आउटलेट खोला।
अपनी इस दुकान पर वे दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी मात्र 5 रुपये में बेचते थे। फिर कैसे मिली उन्हें सफलता, आइए जानते हैं।

सीढ़ियों के नीचे दुकान

महेंद्र की कॉफी की दुकान एक सीढ़ी के नीचे थी, जिसका साइज लगभग 30 वर्ग फुट था। हालांकि उनका अपना विजन भी क्लियर था - ग्राहकों को पारंपरिक भारतीय फिल्टर कॉफी सस्ते और बिना किसी तामझाम के मुहैया कराना।
उनका यही आइडिया आगे चलकर उनका अपना वेंचर 'हट्टी कापी' (Hatti Kaapi Success Story) बना। आज ये बेंगलुरु की एक कॉफी चेन है, जो अब कई अलग-अलग फॉर्मेंट में फैल चुकी है। इसमें हाई-स्ट्रीट आउटलेट, एयरपोर्ट और कॉर्पोरेट कैंपस शामिल हैं।

कॉफी बिजनेस क्यों चुना?

महेंद्र कर्नाटक के हासन से आते हैं, जहां कॉफी बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। इसीलिए वे कॉफी बिजनेस में आए। महेंद्र ने अपने करियर की शुरुआत भी कॉफी की ट्रेडिंग और ब्रोकरेज से ही की खी, जिससे उन्हें इस प्रोडक्ट और इसे उगाने वाले किसानों के बारे में गहरी समझ मिली।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक इंटरव्यू में महेंद्र ने बताया था कि "कॉफी हमारे DNA में है।" इसके लिए उन्हें कैफे कॉफी डे (Café Coffee Day) के फाउंडर वी.जी. सिद्धार्थ से भी प्रेरणा मिली। हालाँकि, महेंद्र ने ग्राहकों की एक अलग पसंद को ध्यान में रखते हुए बिजनेस को आगे बढ़ाया।

सजावट नहीं टेस्ट पर फोकस

'हट्टी काफी' का नाम कन्नड़ शब्द 'हट्टी' से आया है, जिसका मतलब होता है 'घर'। कंपनी ने कैफे को सजाने या महंगी ड्रिंक्स पर निर्भर होने के बजाय, फ्रेश फिल्टर कॉफी को जल्दी परोसने पर फोकस दिया। इस काम में उन्होंने स्थानीय किसानों को भी अपने साथ जोड़ा।
उन्होंने सकलेशपुर के जंबराडी गाँव के लगभग 15 से 20 कॉफी किसानों (जिनके पास 5 से 25 एकड़ तक के बागान थे) को अपने साथ मिलाया और उनसे कॉफी खरीदी।

कंपनियां भी जुड़ीं

हट्टी कापी को सिर्फ रिटेल आउटलेट तक ही सफलता नहीं मिली, बल्कि इसने कॉर्पोरेट कैंपस में पैंठ बनाई। जैसे कि 2014 में इंफोसिस ने 'हट्टी कापी' को अपने परिसर में जगह दी। इसके बाद कंपनी डेलॉइट (Deloitte) और SAP जैसी कंपनियों के दफ्तरों और परिसरों में इसी की कॉफी मिलने लगी।
फिर हवाई अड्डे भी इसके लिए एक डिस्ट्रीब्यूशन चैनल बनकर उभरे। फिर कंपनी हॉस्पिटैलिटी सप्लाई सेगमेंट में भी उतरी, जहाँ यह मैरियट इंटरनेशनल से जुड़ी प्रॉपर्टीज को कॉफी सप्लाई कर रही है।

आज कितना है बिजनेस?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यूएस महेंद्र की हट्टी कापी की वैल्यू 180 करोड़ रुपये हो गयी है। बेंगलुरु में 5 रुपये की अपनी पहली कप कॉफी से शुरुआत करने वाली 'हट्टी कापी' ने एक ऐसा बिजनेस खड़ा किया है, जो पारंपरिक फिल्टर कॉफी को संगठित रिटेल और इंस्टीट्यूशनल डिस्ट्रीब्यूशन के साथ जोड़ता है।

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