मोदीनगर को बसाने वाले गूजरमल ने अंग्रेजों और पटियाला के महाराजा से लिया था पंगा, शराब न पीने चलते किए गए अपमानित
मोदी परिवार का इतिहास 1800 के दशक से शुरू होता है, जब वे राशन के कारोबारी थे। गूजरमल मोदी ने ...और पढ़ें

मोदीनगर का दिलचस्प इतिहास (AI फोटो)
HighLights
मोदी परिवार ने राशन से लेकर चीनी उद्योग तक का सफर तय किया
गूजरमल मोदी को पटियाला से निष्कासित किया गया था
उन्होंने बेगमाबाद में चीनी मिल लगाकर मोदीनगर की नींव रखी
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। अगर आप 19वीं सदी के अरबपतियों को देखें तो पाएंगे कि वे ज्यादातर खाने की चीजों का कारोबार करते थे, क्योंकि उस दौर में यही सबसे जरूरी सामान हुआ करते थे। ऐसा ही मोदीनगर (Modinagar History) को बसाने वाले गूजरमल मोदी (Gujarmal Modi History) के परिवार के साथ भी हुआ। दो सदियों के दौरान, मोदी परिवार ने कारोबार का एक लंबा सफर तय किया।
इस परिवार ने राशन के सामान के कारोबारी के तौर पर शुरुआत की, फिर रिटेलर बने, उसके बाद मिल मालिक बने, और आगे चलकर चीनी, कपड़ा, साबुन, रबर जैसी कई अन्य चीजें बनाने लगे। गूजरमल मोदी ने मोदीनगर के साथ-साथ मोदीपुरम (Modipuram History) को भी बसाया था।
कहां से शुरू हुआ इतिहास?
मोदी परिवार का लिखित इतिहास 1800 में रामबख्श मोदी से शुरू होता है, जो झज्जर के नवाब की सेना को राशन की आपूर्ति करते थे। 1857 के विद्रोह के बाद, झज्जर का इलाका पटियाला के महाराजा महेंद्र सिंह को सौंप दिया गया।
इससे इस क्षेत्र के प्रमुख राशन सप्लायर रामबख्श मोदी को पटियाला में भी अपना दफ्तर खोलने की अनुमति मिल गई। कारोबार का दायरा बढ़ने के साथ ही उनका कारोबार तेजी से फैला। महाराजा और ब्रिटिश सेना दोनों को सेवाएँ देते हुए, रामबख्श के बेटे चिरंजीलाल ने अपने कारोबार को पश्चिम में मुल्तान से लेकर पूर्व में कानपुर तक फैला दिया।
दिलचस्प बात यह है कि चिरंजीलाल के पहले बेटे का जन्म मुल्तान में हुआ था, इसलिए उनका नाम 'मुल्तानमल' रखा गया।
मुल्तानमल का कमाल
मुल्तानमल में कारोबार करने का काफी जज्बा था। उन्होंने जल्द ही एक नया रिटेल बिजनेस शुरू किया, जिसमें वे सिखों द्वारा चलाई जा रही स्थानीय आटा मिलों को अनाज बेचते थे। जब वह मिल घाटे में चली गई, तो मुल्तानमल ने इसमें एक मौका देखा। उन्होंने उस घाटे में चल रही मिल को खरीद लिया और उसे मुनाफा कमाने वाली इकाई में बदल दिया।
ब्रिटिश कर्नल के साथ विवाद
फिर मुल्तानमल की पत्नी का निधन हो गया। उन्होंने दूसरी शादी की, लेकिन उनकी दूसरी पत्नी का भी उनके बेटे को जन्म देने के एक हफ्ते के भीतर ही देहांत हो गया। नवजात बच्चे की देखभाल 'गूजरी' नाम की एक धाय (आया) ने की थी, इसलिए उस बच्चे को उसी के नाम पर 'गूजरमल' कहा जाने लगा।
ऐतिहासिक लेखों के अनुसार 17 साल की कम उम्र में ही पारिवारिक कारोबार से जुड़ने वाले गूजरमल को शुरुआत में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अनाज के व्यापार में उतरने पर, उन्होंने एक अलग तरह का प्राइसिंग सिस्टम अपनाा। इसके तहत, ब्रिटिश सेना को थोक में अनाज ऊंचे दाम पर बेचा जाता था, जबकि आम नागरिकों से उनकी क्रय-शक्ति (खरीदने की क्षमता) के हिसाब से कम दाम लिए जाते थे।
नई जगह की तलाश
इसी प्राइसिंग सिस्टम को लेकर पटियाला में एक ब्रिटिश कर्नल के साथ उनका विवाद हो गया, जिन्होंने गूजरमल पर अंग्रेजों से ज्यादा पैसे वसूलने का आरोप लगाया। हालांकि यह विवाद बाद में सुलझा, लेकिन इससे गूजरमल को ये आइडिया आया कि पटियाला छोड़कर कहीं और अपनी नई 'कर्मभूमि' तलाशनी चाहिए।"
इसके बाद और गूजरमल के सामने और भी मुश्किलें आईं। पटियाला के महाराजा और उनके अधिकारियों ने गुजरमल को वनस्पति घी की फैक्ट्री लगाने के लिए जरूरी प्रमाण-पत्र देने से मना कर दिया और कुछ समय बाद उन्हें कपड़ा मिल लगाने की अनुमति भी नहीं दी।
हद तो तब हो गई जब पटियाला के महाराजा के आवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में, शराब पीने से मना करने पर गूजरमल को अपमानित किया गया। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि गूजरमल को पटियाला रियासत से निकाल दिया गया।
महाराजा से लड़ने की स्थिति में न होने के बावजूद, इस घटना ने गूजरमल को एक मजबूत प्लान सोचने पर मजबूर कर दिया और ये था अपनी खुद की एक स्वतंत्र रियासत या ऐसा कस्बा बसाने की योजना, जहां वे महाराजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों की मनमानी से पूरी तरह मुक्त हों। उस समय गूजरमल की उम्र महज 30 साल थी, लेकिन उनके इरादे और सपने बहुत बड़े थे।
यहां से पड़ी मोदीनगर की नींव
गूजरमल ने कलकत्ता और फिर हापुड़ की यात्रा की, जहाँ उनके चचेरे भाई पहले से ही अपना कारोबार चला रहे थे। गूजरमल को यह समझ आ गया कि अगर कोई अच्छी योजना हो, तो निवेशकों से फंड जुटाना मुमकिन है। 1932 में, ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चीनी पर आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) बढ़ा दिया। ऐसे में, गुजरमल के लिए सबसे पहले एक चीनी मिल (शुगर प्लांट) लगाना ही समझदारी भरा कदम था।
अपने प्रस्ताव की बुनियाद पर गूजरमल इतना पैसा जुटाने में सफल रहे कि वे अपनी योजनाओं को शुरू कर सकें और जमीन की तलाश कर सकें। उन्होंने पूरे इलाके में घूम-घूमकर एक ऐसी बड़ी और उपजाऊ जमीन खोजी, जहाँ पानी की भरपूर उपलब्धता हो और रेल व सड़क परिवहन की सुविधा भी मौजूद हो।
दिल्ली से लगभग 50 किलोमीटर दूर, बेगमाबाद इन सभी शर्तों पर खरा उतरा। कई अलग-अलग मालिकों को अपनी कृषि भूमि बेचने के लिए राजी करने में उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन आखिरकार, उन्होंने 40 एकड़ जमीन एक साथ इकट्ठा कर ली और वहाँ एक चीनी मिल बनाने का काम शुरू कर दिया। यही बेगमाबाद आगे चलकर मोदीनगर कहलाया और यहीं से गूजरमल मोदी ने कारोबार बढ़ाया।
