जो नहीं कर पाए NASA-ISRO, वो कर दिखाएंगे ये दो भारतीय लड़के! 9 साल पुराना स्टार्टअप करेगा SpaceX की बराबरी
अग्निकुल कॉसमॉस 2027 की शुरुआत में अपने 'मिशन 2' के तहत एक कमर्शियल पेलोड को ऑर्बिट में भेजने और रॉकेट ...और पढ़ें

अग्निकुल लॉन्च करेगा दोबारा यूज होने वाला रॉकेट
HighLights
अग्निकुल कॉसमॉस का लक्ष्य 2027 में रियूजेबल रॉकेट लॉन्च करना
निचले हिस्से को दोबारा इस्तेमाल के लिए वापस लाने की योजना
यह भारतीय स्टार्टअप SpaceX के बराबर आने की तैयारी में
नई दिल्ली। स्पेस टेक स्टार्टअप 'अग्निकुल कॉसमॉस' (Agnikul Cosmos) अपने 'मिशन 2' के लिए 2027 की शुरुआत का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इस मिशन में न केवल एक कमर्शियल पेलोड को ऑर्बिट में भेजा जाएगा, बल्कि रॉकेट के निचले हिस्से (लोअर स्टेज) को दोबारा इस्तेमाल के लिए वापस लाने की कोशिश भी की जाएगी।
अग्निकुल कॉसमॉस के को-फाउंडर और CEO श्रीनाथ रविचंद्रन के अनुसार दोबारा इस्तेमाल होने वाले लॉन्च व्हीकल का डिजाइन लगभग तैयार हो चुका है। उनके मुताबिक दोबारा इस्तेमाल के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी के सभी हिस्से तैयार हैं और बस उन्हें सही क्रम में लगाया जाना है।
लोअर स्टेज एक स्वतंत्र व्हीकल की तरह काम करेगा
उड़ान भरने के बाद, अग्निकुल का लोअर-स्टेज रॉकेट बाकी रॉकेट से अलग होने पर एक स्वतंत्र व्हीकल की तरह काम करेगा। श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने के बाद, यह बंगाल की खाड़ी में एक बार्ज (बड़ी नाव) पर वर्टिकल लैंडिंग करने की कोशिश करेगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रविचंद्रन के अनुसार अब उस [लोअर स्टेज] को एक अलग रॉकेट की तरह देखा जा रहा है, जिसमें वापसी के लिए अपना 'दिमाग' (कंट्रोल सिस्टम) और अपना हार्डवेयर होगा।
SpaceX की कर लेगी बराबरी
प्लान यह है कि जैसे-जैसे हार्डवेयर तैयार होगा, उसे लॉन्च वाली जगह पर ले जाना शुरू कर दिया जाएगा और ये इसी साल से हो सकता है। लॉन्च का समय मॉनसून और कुछ बाकी मंजूरियों पर निर्भर करेगा।
इस कोशिश में कामयाबी मिलने पर यह भारतीय स्टार्टअप SpaceX जैसी कंपनियों की बराबरी में आ जाएगा और भारतीय स्पेस टेक सेक्टर में लॉन्च की लागत और तकनीक के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि होगी। खास बात यह है कि दोनों स्टेज को कई बार इस्तेमाल के लायक बनाया जा रहा है। ऊपरी स्टेज (अपर स्टेज) को ऑर्बिट में ही दोबारा इस्तेमाल होने वाले सैटेलाइट बस के तौर पर रखने की योजना है।
क्यों जरूरी है दोबारा लॉन्च करना?
अग्निकुल कॉसमॉस के को-फाउंडर और COO मोइन एसपीएम का कहना है कि 3D प्रिंटिंग से ऑटोमेटेड, बार-बार एक जैसा और बिना गलती वाला प्रोडक्शन मुमकिन होता है। साथ ही इससे उनके लॉन्च की विश्वसनीयता भी बढ़ती है। सबसे जरूरी बात यह है कि रिकवरी से अब इंजन की क्षमता और लॉन्च की रफ्तार एक-दूसरे से अलग हो गई हैं।
मोइन ने कहा कि अगर हम सावधानी से अनुमान लगाएं, तो लगभग पांच रॉकेट बना सकते हैं, लेकिन उन्हें ठीक करके और दोबारा इस्तेमाल करके शायद 25 लॉन्च कर सकते हैं।
चेन्नई में अग्नि-कुल की दो खास सुविधाएँ
इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के केंद्र में चेन्नई में अग्नि-कुल की दो सुविधाएँ हैं। IIT-मद्रास रिसर्च पार्क में मौजूद 'रॉकेट फैक्ट्री' में, कंपनी की आधिकारिक 3D-प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी पार्टनर EOS के साथ साझेदारी के जरिए, 'अग्निलेट' बनाया जाता है। यह कंपनी का पूरी तरह से इंटीग्रेटेड, सिंगल-पीस सेमी-क्रायोजेनिक इंजन है, जो पूरी तरह से इनकोनेल (Inconel) से बना है।
प्रिंट होने के बाद, इलेक्ट्रिकल डिस्चार्ज मशीनें इंजन को उसकी बिल्ड प्लेट से अलग करती हैं, और इन-हाउस बनी डी-पाउडरिंग मशीन, इस प्रक्रिया को पूरा करती है। ये सब मिलकर हर 72 घंटे में एक पूरी तरह से 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन बना सकते हैं।
इसके बाद इंजन 30 km का सफर करके थैयार में अग्नि-कुल की टेस्ट फैसिलिटी तक पहुँचता है, जहाँ फाइनल इंटीग्रेशन से पहले टेस्ट रिग्स हर कंपोनेंट (जैसे इंजन, थर्मल कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, लिक्विड ऑक्सीजन प्रोपेलेंट आदि) की बार-बार टेस्टिंग करते हैं। इस ऑपरेशन को एक युवा टीम चलाती है, जिसे सलाहकार के तौर पर ISRO के रिटायर्ड इंजीनियरों का सहयोग मिलता है।
स्पेस में जाना चाहते हैं बहुत लोग
कंपनी के फाउंडर्स कहते हैं कि आप हमें उन रॉकेट्स को रेगुलर उड़ाते हुए देखेंगे जिन्हें हम पहले ही उड़ा चुके होंगे, तो यह हमारे लिए एक बड़ी जीत होगी। वे आगे कहते हैं कि तब तक थूथुकुडी के पास कंपनी की आने वाली यूनिट भी चालू हो जाएगी और इससे डिमांड पूरी करने के लिए प्रोडक्शन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
मोइन के अनुसार डिमांड हाई है, क्योंकि कई लोग स्पेस में जाना चाहते हैं, और लॉन्च व्हीकल्स की कमी है।
