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112 साल पुराने 555 साबुन की दिलचस्प कहानी: ये शख्स लाहौर से लेकर आया दिल्ली, पहुंचाया घर-घर; आज भी विरासत बरकरार

Published: Sun, 11 Oct 2026 11:25 AM (IST)

यह लेख 555 वॉशिंग साबुन ब्रांड के एक सदी से भी पुराने सफर को दर्शाता है, जिसकी नींव 1914 में ...और पढ़ें

555 साबुन का इतिहास (AI फोटो)

555 साबुन का इतिहास (AI फोटो)

HighLights

  1. 555 साबुन की शुरुआत 1914 में लाहौर में हुई

  2. गुणवत्ता और पहचान ने इसे भारतीय घरों में लोकप्रिय बनाया

  3. विभाजन के बाद कारोबार दिल्ली में स्थापित होकर बढ़ा

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।आज बाजार में साबुन और डिटर्जेंट के बड़े-बड़े ब्रांड दिखाई देते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब कपड़े धोने के साबुन की दुनिया में सिर्फ नाम नहीं, बल्कि उसकी पहचान ही काफी होती थी। ऐसा ही एक नाम था 555 (555 Soap History)।
तीन अंकों का यह ब्रांड दशकों तक भारतीय घरों में कपड़े धोने वाले साबुन के तौर पर पहचाना गया। इसकी कहानी आज से करीब एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है। कंपनी रिकॉर्ड के मुताबिक गोरा मल हरी राम लिमिटेड नामक कंपनी की नींव 1914 में लाहौर में हरिराम ने रखी थी। शुरुआत में कारोबार का फोकस वॉशिंग साबुन बनाने पर था। बाद में इसी कारोबारी विरासत से 555 ब्रांड ने अपनी अलग पहचान बनाई।

1914 में लाहौर से रखी गई कारोबार की नींव

555 की कहानी को समझने के लिए पहले Gora Mal Hari Ram की शुरुआत को समझना जरूरी है। कंपनी के अनुसार 1914 में लाहौर में हरिराम ने एक सोल प्रोपराइटरशिप कारोबार के तौर पर इसकी नींव रखी थी। शुरुआती कारोबार मुख्य रूप से वॉशिंग साबुन के निर्माण पर केंद्रित था। यानी शुरुआत से ही कंपनी का निशाना रोजमर्रा के घरेलू इस्तेमाल वाले उत्पादों का बाजार था।
उस समय भारत में औद्योगिक स्तर पर साबुन का बाजार आज जितना बड़ा नहीं था, इसलिए लोकल लेवल पर क्वालिटी वाला वॉशिंग साबुन बनाना अपने आप में बड़ा कारोबार था। यही शुरुआती अनुभव आगे चलकर 555 की नींव बना।

555 नाम कब सामने आया?

यहां एक अहम फैक्ट सामने आता है। रिकॉर्ड में Gora Mal Hari Ram से जुड़े 555 ट्रेडमार्क के बारे में कहा गया है कि इसका लगातार इस्तेमाल 1924 से किया जा रहा था। यानी कंपनी की स्थापना 1914 में होने के बाद अगले दशक में 555 नाम ने अपनी पहचान बनानी शुरू की।
बाद में 555 ट्रेडमार्क को 1943 में क्लास 3 में रजिस्टर कराया गया, जिसमें साबुन और वॉशिंग साबुन शामिल थे। इस तरह 555 सिर्फ बाजार में चलने वाला नाम नहीं रहा, बल्कि कानूनी रूप से भी एक संरक्षित ब्रांड बन गया।

असली ताकत बनी क्वालिटी और पहचान

555 की तरक्की का सबसे बड़ा आधार केवल उसका नाम नहीं था। कंपनी के मुताबिक उसने लंबे समय तक प्रोड्क्ट की क्वालिटी और ग्राहकों की संतुष्टि पर जोर दिया। समय के साथ 555 की पैकेजिंग भी उसकी पहचान का हिस्सा बन गई। 555 को लेकर एक कॉपीराइट विवाद भी रहा, जिसमें ये मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक गया।
दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में कंपनी ने बताया कि उसके उत्पादों की पैकेजिंग का एक अलग और पहचानने योग्य डिजाइन था, जिसे बाद में कॉपीराइट संरक्षण भी मिला। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि लगातार इस्तेमाल और प्रचार के कारण 555 की बाजार में अलग पहचान बन चुकी थी और यह वॉशिंग साबुन के लिए घरेलू नाम जैसा बन गया था।

लाहौर से दिल्ली तक बदला कारोबार का भूगोल

भारत के विभाजन के बाद इस कारोबारी विरासत को नए माहौल में आगे बढ़ाना पड़ा। कंपनी का कारोबार धीरे-धीरे दिल्ली में स्थापित हुआ और बाद में Gora Mal Hari Ram के नाम से आगे बढ़ा। 2025 के दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले में दर्ज जानकारी के मुताबिक दिल्ली के रामारोड औद्योगिक क्षेत्र में साबुन निर्माण का कारोबार 1953 में Gora Mal Hari Ram के नाम से शुरू हुआ था और सत्यपाल मणकतला अपने पिता और परिवार के साथ कारोबार संभाल रहे थे।
आगे चलकर परिवार की अगली पीढ़ियों ने इसे विस्तार दिया।

प्रचार, वितरण और बढ़ती बिक्री ने बनाया बड़ा ब्रांड

555 की लोकप्रियता सिर्फ पुराने नाम की वजह से नहीं बनी। कंपनी ने समय के साथ अपने उत्पादों का प्रमोशन किया और व्यापक डीलर नेटवर्क तैयार किया। दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में कंपनी की ओर से दिए गए आंकड़ों में 1991-92 से 2006-07 के बीच करोड़ों रुपये की बिक्री दर्ज है।
उदाहरण के लिए 1991-92 में बिक्री करीब 22.29 करोड़ रुपये थी, जो 2002-03 में बढ़कर करीब 70.97 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

आज भी कायम है 555 की विरासत

समय के साथ Gora Mal Hari Ram ने केवल वॉशिंग साबुन तक खुद को सीमित नहीं रखा। कंपनी के मुताबिक बाद में टॉयलेट सोप, डिशवॉश बार, स्कॉरिंग पाउडर और अन्य घरेलू सफाई उत्पाद भी इसके पोर्टफोलियो में शामिल हुए।
आज कंपनी की वेबसाइट के अनुसार उसके निर्माण केंद्र दिल्ली, नीमराना और हरिद्वार में हैं और देशभर में डीलर नेटवर्क के जरिए उत्पादों का डिस्ट्रिब्यूशन किया जाता है।

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