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हाफ पैंट पर तानों को पछाड़कर फुटबॉल के मैदान से सीधे सरकारी दफ्तर पहुंचीं चंपारण की बेटी निशा

Published: Mon, 02 Nov 2026 04:43 PM (IST)

Bihar Government Job: पश्चिमी चंपारण की निशा कुमारी ने सामाजिक तानों और गरीबी को हराकर फुटबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर ...और पढ़ें

निशा उन जैसी हजारों बेटियों के लिए वह प्रेरणास्रोत बन गईं।

निशा उन जैसी हजारों बेटियों के लिए वह प्रेरणास्रोत बन गईं।

HighLights

  1. गरीबी और तानों के बावजूद फुटबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचीं।

  2. 'मेडल लाओ, नौकरी पाओ' योजना से सरकारी नौकरी मिली।

  3. परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारी, अन्य बेटियों की प्रेरणा बनीं।

प्रभात मिश्र, नरकटियागंज (पश्चिमी चंपारण)। Football Player Nisha Kumari success story: सुदूर ग्रामीण क्षेत्र की एक बेटी के लिए जीवन में मुकाम हासिल करना कोई सामान्य बात नहीं होती।

उसमें भी यदि वह सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर हो तो उसके लिए अपने सपने पूरे करने में कई स्तर के संघर्ष से गुजरना होता है।

समाज के तानों और संसाधनों की कमी के बाद भी लक्ष्य हासिल करने के जुनून और परिवार के सपोर्ट ने निशा को मुकाम दिलाया और उन जैसी हजारों बेटियों के लिए वह प्रेरणास्रोत बन गईं।

पिता के हाथों में दूसरों के कपड़े धोने और इस्त्री करने की जिम्मेदारी थी। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि बेटी के सपनों को आसानी से पंख मिल सकें।

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ऊपर से फुटबॉल खेलने के लिए हाफ पैंट पहनकर मैदान में निकलने पर समाज के ताने भी सुनने पड़ते थे। लेकिन हरदिया चौक की 21 वर्षीय निशा कुमारी ने न गरीबी को अपनी मंजिल के आड़े आने दिया और न लोगों की टिप्पणियों को अपने हौसले पर हावी होने दिया।

सपनों की उड़ान

जिस खेल के मैदान में कभी उनके पहनावे पर सवाल उठाए जाते थे, उसी मैदान में उन्होंने अपनी प्रतिभा से पहचान बनाई। जिला और राज्य स्तर से होते हुए वह राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं।

आखिरकार उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर बिहार सरकार की 'मेडल लाओ, नौकरी पाओ' योजना के तहत सरकारी नौकरी हासिल कर ली। आज निशा सिर्फ अपने परिवार की बेटी नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं।

सहेलियों का साथ

निशा के पिता बृजेश बैठा कपड़े धोने और इस्त्री करने का काम करते हैं, जबकि मां सुनीता देवी गृहिणी हैं। चार बहनों और दो भाइयों के बीच पली-बढ़ी निशा ने करीब 12 वर्ष की उम्र में वर्ष 2015 में फुटबॉल खेलना शुरू किया था।

उनकी कुछ सहेलियां स्कूल के बाद मैदान में फुटबॉल का अभ्यास करने जाती थीं। उन्हें खेलते देखकर निशा के मन में भी फुटबॉल खेलने की तीव्र इच्छा जागी।

प्रशिक्षक का मार्गदर्शन

सहेलियों ने उन्हें प्रशिक्षक सुनील वर्मा से संपर्क कराया और इसके बाद निशा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में नियमित अभ्यास और कठिन मेहनत ने उनकी प्रतिभा को तेजी से निखारा।

धीरे-धीरे उनका खेल जिला स्तर से आगे बढ़कर राज्य और फिर राष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया। राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

सरकारी नौकरी मिली

मैदान में दिखाई गई उनकी मेहनत का उन्हें बहुत बड़ा पुरस्कार मिला। बिहार सरकार की विशेष योजना के तहत पिछले वर्ष उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई।

वर्तमान में वह पूर्वी चंपारण के मोतिहारी अनुमंडल में लिपिक के पद पर पूरी निष्ठा से कार्यरत हैं। जिस परिवार में कभी दो वक्त की आर्थिक जरूरतों को पूरा करना भी चुनौती थी, आज उसी परिवार की पूरी जिम्मेदारी निशा संभाल रही हैं।

तानों को नकारा

निशा के लिए फुटबॉल का यह सफर सिर्फ खेल में बेहतर प्रदर्शन करने तक सीमित बिल्कुल नहीं था। उन्हें समाज की संकीर्ण सोच और तानों से भी कड़ा मुकाबला करना पड़ा।

फुटबॉल में वह राइट आउट पोजीशन पर खेलती थीं। मैदान में बेहतर प्रदर्शन के लिए जब वह हाफ पैंट पहनकर अभ्यास करने जाती थीं, तो कुछ लोग लड़की होकर ऐसा पहनावा पहनने पर फब्तियां कसते थे।

परिवार का संबल

लेकिन निशा ने इन नकारात्मक टिप्पणियों को कभी अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया। उन्होंने लोगों को जुबानी जवाब देने के बजाय अपने शानदार खेल से अपनी अलग पहचान बनाई।

इस पूरे संघर्ष में उनके माता-पिता का साथ उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ। परिवार ने कभी उनके सपनों पर बंदिशें नहीं लगाईं और हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।

बदली तकदीर

निशा का पक्का विश्वास है कि बेटियों को भी अपनी पसंद का क्षेत्र चुनने और आगे बढ़ने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। माता-पिता अगर बेटियों पर भरोसा करें और उनका पूरा साथ दें, तो वे दुनिया का हर मुकाम हासिल कर सकती हैं।

निशा के लिए यह सरकारी नौकरी कोई मंजिल नहीं, बल्कि उनके जीवन में एक नई जिम्मेदारी की एक शानदार शुरुआत है।

दूसरों के लिए प्रेरणा

अब उनका मुख्य सपना अपने माता-पिता और पूरे परिवार की सभी जरूरतों को पूरा करना है। उनकी यह प्रेरणादायक कहानी साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों तो एक बेटी अपने सपनों के साथ पूरे परिवार की तकदीर भी बदल सकती है।

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समाज का नजरिया अब तेजी से बदल रहा है। अब बेटियों को भी पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के पूरे अवसर मिल रहे हैं। गरीब परिवार से आने वाली निशा ने अपनी मेहनत के दम पर जो मुकाम पाया है, वह दूसरी बेटियों के लिए बड़ी प्रेरणा है।

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रेणु देवी

समाज अब पुरानी संकीर्ण सोच से बाहर निकल रहा है। बेटे और बेटियों के बीच का पुराना अंतर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है जो एक सकारात्मक बदलाव है। खिलाड़ी निशा ने साबित किया है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कोई भी मुकाम संभव है।

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मनीषा कुमारी

आज बेटियां शिक्षा, खेल और रोजगार के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। फुटबॉल खिलाड़ी निशा ने अपनी सफलता से साबित कर दिखाया है कि बेटियां केवल बोझ नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी ताकत और तरक्की का आधार बनती हैं।

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मीनू श्रीवास्तव

बेटियों की शिक्षा और खेल के लिए अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकताओं में है। निशा जैसी होनहार बेटियों की शानदार उपलब्धियां महिला सशक्तीकरण की सबसे सशक्त और जीवंत मिसाल हैं।

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डॉ. प्रीति कुमारी

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