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चंपारण की सीठी एक्सप्रेस प्रीति अभावों को पीछे छोड़ ओलंपिक में लहराना चाहतीं तिरंगा

Published: Thu, 05 Nov 2026 05:56 AM (IST)

Bihar Athlete Preeti Kumari: पश्चिम चंपारण की 'सीठी एक्सप्रेस' प्रीति कुमारी ने अभावों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर ...और पढ़ें

'सीठी एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर इस धाविका ने अभावों को अपनी मंजिल की राह में कभी रोड़ा नहीं बनने दिया।

'सीठी एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर इस धाविका ने अभावों को अपनी मंजिल की राह में कभी रोड़ा नहीं बनने दिया।

विवेक कुमार, गौनाहा (पश्चिम चंपारण)। Champaran Lady Usain Bolt: संसाधनों की कमी और विपरीत परिस्थितियों के बीच कैसे अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहा जाता है, यह कोई पश्चिम चंपारण की इस प्रतिभावान बेटी से सीख सकता है।

'सीठी एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर इस धाविका ने अभावों को अपनी मंजिल की राह में कभी रोड़ा नहीं बनने दिया। उसने अपनी कड़ी मेहनत और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर जो शानदार सफलता हासिल की है, वह आज इलाके की हर बेटी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा बन चुकी है।

संघर्ष भरी राह

पेट में भूख, पैरों में छाले और आंखों में एक बहुत बड़ा सपना संजोए रखने वाली सीठी गांव की प्रीति कुमारी आज अपनी बेजोड़ रफ्तार से पूरे बिहार का नाम रोशन कर रही है। कभी रूखी-सूखी रोटी खाकर अभ्यास के लिए निकल पड़ने वाली इस होनहार लड़की के पास कभी कोई ढंग का खेल मैदान तक नहीं था।

इसके बावजूद वह आज राष्ट्रीय स्तर पर एक के बाद एक पदक जीतकर अपनी सफलता का परचम लहरा रही है।

Preeti Kumari

सीठी एक्सप्रेस पहचान

लोग उन्हें बेहद प्यार से 'सीठी एक्सप्रेस' के नाम से बुलाते हैं। कभी समाज के ताने सुनने पड़े, तो कभी भीषण गरीबी ने उनका रास्ता रोका और कई बार टूटे हुए पैर ने उनके कदम थामने की कोशिश की। लेकिन प्रीति ने किसी भी परिस्थिति में हार मानना कभी नहीं सीखा।

अब उनकी आंखों में केवल और केवल ओलंपिक का बड़ा सपना तैर रहा है, और वह देश के लिए दौड़कर तिरंगा लहराना चाहती हैं।

पारिवारिक जिम्मेदारियां

गौनाहा प्रखंड के जंगल के किनारे बसे थारू बहुल सीठी गांव की रहने वाली प्रीति का यह संघर्ष उनके बचपन से ही शुरू हो गया था। उनके पिता पंकज दिश्वा और मां रिंकी देवी मजदूरी कर किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

घर में बूढ़े दादा-दादी और दो छोटे भाइयों की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। ऐसे में प्रीति के हर दिन की शुरुआत केवल अपने सपनों से नहीं, बल्कि घर की तमाम कठिन जिम्मेदारियों को पूरा करने से होती है।

कठिन दिनचर्या

खाना बनाना, अपनी पढ़ाई करना, पालतू जानवरों के लिए चारा जुटाना, जंगल से लकड़ी लाना और छोटे भाइयों की देखभाल करना उनकी दैनिक दिनचर्या का अहम हिस्सा रहा है। इन तमाम मुश्किलों के बीच वह अपने खेल अभ्यास के लिए हमेशा समय निकाल ही लेती थीं।

कई बार उन्हें भरपेट भोजन और जरूरी पोषण तक नसीब नहीं हुआ, लेकिन दौड़ने की उनकी जिद कभी भी कमजोर नहीं पड़ी।

टापू पर अभ्यास

वर्ष 2021-22 में छठी कक्षा में पढ़ाई के दौरान ही प्रीति ने खेल की दुनिया में अपना कदम रखा था। उस छोटे से गांव में एक लड़की का हाफ पैंट पहनकर दौड़ना भी बिल्कुल आसान नहीं था और उन्हें समाज के ताने सुनने पड़ते थे।

न तो कोई खेल मैदान था और न ही उनके पास प्रशिक्षण की कोई आधुनिक सुविधा उपलब्ध थी। तब गांव की कुछ जागरूक महिलाओं और युवाओं ने उनकी छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना और उनका हौसला बढ़ाया।

रेत का मैदान

उन्हीं के सहयोग से नदी के छोड़े गए एक टापू पर अभ्यास के लिए मैदान तैयार किया गया और प्रथम खेल नर्सरी की अनूठी शुरुआत हुई। रेत और मिट्टी से तैयार किए गए इसी अस्थायी मैदान पर प्रीति ने अपने सुनहरे सपनों को आकार देना शुरू कर दिया था।

न तो उनके पास दौड़ने के लिए अच्छे जूते थे और न ही कोई आधुनिक उपकरण, लेकिन उनके भीतर अपनी मंजिल तक पहुंचने की एक जिद्द थी।

पहला बड़ा मुकाम

वर्ष 2023 में भुवनेश्वर में आयोजित जनजातीय खेल प्रतियोगिता की 100 मीटर दौड़ में प्रीति ने देशभर में चौथा स्थान हासिल किया। यह उनकी खेल प्रतिभा का सबसे पहला बड़ा राष्ट्रीय परिचय था। लेकिन इसी वर्ष एक फुटबॉल मैच के दौरान दुर्भाग्यवश उनका पैर बुरी तरह टूट गया।

परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी बिल्कुल नहीं थी कि वे किसी बड़े अस्पताल में बेहतर इलाज का खर्च उठा पाते।

डॉक्टर की सलाह

उस समय डॉक्टर ने भी उनके दोबारा कभी खेल पाने की संभावना को लेकर गहरी निराशा जताई थी। एक पल के लिए प्रीति को ऐसा महसूस हुआ कि उनकी वर्षों की मेहनत और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का सपना अब हमेशा के लिए टूट गया है। जिस पैर के सहारे वह अपनी मंजिल की तरफ तेजी से दौड़ रही थीं, वही पैर अचानक उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया था।

अटूट हौसला

लेकिन प्रीति ने इस भीषण हादसे को अपनी हार बिल्कुल नहीं बनने दिया। चोट उनके पैर में जरूर लगी थी, लेकिन उनके बुलंद इरादों में खरोंच तक नहीं आई थी।

उन्होंने अपने हिस्से का असहनीय दर्द सहा, खुद को मानसिक रूप से संभाला और मैदान पर एक बार फिर से दमदार वापसी करने का पक्का संकल्प लिया। उनके इसी जज्बे ने उन्हें एक बार फिर से ट्रैक पर ला खड़ा किया।

शानदार वापसी

वर्ष 2024 में प्रीति ने खेल के मैदान पर एक शानदार और प्रेरणादायक वापसी की। इसके बाद उन्होंने लखनऊ में आयोजित एसजीएफआई प्रतियोगिता में बिहार राज्य का प्रतिनिधित्व किया।

वर्ष 2025 में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं और खेलो इंडिया गेम्स में भी राज्य की ओर से पूरी तन्मयता के साथ हिस्सा लिया। खेल के कठिन सफर के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई को कभी पीछे नहीं छूटने दिया और बिहार बोर्ड की परीक्षा प्रथम श्रेणी से शानदार अंकों में उत्तीर्ण की।

पदकों की झोली

अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने वर्ष 2026 की ईस्ट जोन नेशनल एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 100 मीटर दौड़ और रिले रेस में बिहार के लिए दो कांस्य पदक जीतकर एक बार फिर अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाया।

आज विपरीत परिस्थितियों को पीछे छोड़ चुकीं प्रीति कुमारी बिहार के युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं और लगातार अपनी सफलता से प्रदेश का मान बढ़ा रही हैं।

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