विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

हाथी पर आगमन, मुर्गे पर विदाई: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र, नोट कर लें कलश स्थापना का समय

Published: Mon, 05 Oct 2026 03:53 PM (IST)

इस वर्ष शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू होगा, जिसमें घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त सुबह 6:13 से 10:12 बजे तक ...और पढ़ें

11 अक्टूबर से शुरू होगी शारदीय नवरात्र, 18 को महाअष्टमी और 20 को विजयादशमी

11 अक्टूबर से शुरू होगी शारदीय नवरात्र, 18 को महाअष्टमी और 20 को विजयादशमी

HighLights

  1. शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से, घटस्थापना का शुभ मुहूर्त।

  2. माता का आगमन गज पर, देश में सुख-शांति।

  3. महाअष्टमी 18 अक्टूबर, विजयादशमी 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

जागरण संवाददाता, हाजीपुर। इस वर्ष शारदीय नवरात्र का शुभारंभ 11 अक्टूबर, रविवार को प्रतिपदा तिथि में कलश स्थापना के साथ होगा। वाराणसी पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 8:32 बजे से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 10:49 बजे तक रहेगी।

उदया तिथि के कारण घटस्थापना 11 अक्टूबर को ही मान्य होगी। सुबह 6:13 से 10:12 बजे तक घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त है। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार दिनभर भी कलश स्थापना कर सकेंगे।

वहीं, अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना करने वाले सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे के बीच यह अनुष्ठान कर सकते हैं।

दिशा के संस्थापक सचिव आचार्य राजेश कुमार तिवारी के अनुसार, इस बार रविवार को नवरात्र शुरू होने के कारण माता का आगमन 'गज' यानी हाथी पर होगा। देवी भागवत में इसे 'शशि सूर्ये गजारूढ़ा' कहा गया है। हाथी को शक्ति, स्थिरता, धैर्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

मान्यताओं के अनुसार, इस वाहन से माता का आगमन देश में अच्छी वर्षा, कृषि समृद्धि और सुख-शांति का संकेत देता है।

वहीं, 20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी के दिन माता का गमन (विदाई) होगा। मंगलवार को विजयादशमी होने के कारण प्रस्थान वाहन 'चरणायुध' (अर्थात मुर्गा) माना गया है, जिसे शास्त्रों में कुक्कुट वाहन भी कहा गया है।

लोक मान्यता में इस वाहन को उथल-पुथल और सतर्कता का संकेत माना जाता है, इसलिए विदाई के बाद संयम और शांति पाठ करने की सलाह दी जाती है। इस वर्ष महाअष्टमी 18 अक्टूबर (रविवार) को होगी। नवमी एवं पूर्णाहुति 19 अक्टूबर (सोमवार) को और विजयादशमी श्रवण नक्षत्र के साथ 20 अक्टूबर (मंगलवार) को मनाई जाएगी।

नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की होगी पूजा:

शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के अवसर पर सोनपुर के काली घाट स्थित, कोलकाता के बाद देश के दूसरे एवं बिहार के पहले दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ रहती है।

  • प्रथम दिन: मां शैलपुत्री की पूजा होगी। पर्वतराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री वृषभ पर सवार हैं और स्थिरता व मन की दृढ़ता प्रदान करती हैं।
  • दूसरे दिन: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी, जो कठोर तपस्या, ज्ञान, वैराग्य और संयम की प्रतीक हैं।
  • तीसरे दिन: मां चंद्रघंटा की आराधना होगी। मस्तक पर अर्धचंद्र से सुशोभित चंद्रघंटा की पूजा से भय का नाश और शत्रु बाधा दूर होने की मान्यता है।
  • चौथे दिन: मां कूष्मांडा की पूजा होगी, जिन्हें अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली तथा आयु, यश और आरोग्य देने वाली माना जाता है।
  • पांचवें दिन: मां स्कंदमाता की पूजा होगी। भगवान कार्तिकेय की माता स्कंदमाता संतान सुख और वात्सल्य की प्रदायिनी मानी जाती हैं।
  • छठे दिन: महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित मां कात्यायनी की पूजा होगी, जिन्हें दांपत्य सुख और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली माना जाता है।
  • सातवें दिन (सप्तमी): नयागांव के डुमरी बुजुर्ग गांव में देवी मां कालरात्रि की विशेष पूजा होती है। उन्हें अंधकार का नाश करने वाली, अभय प्रदान करने वाली और ग्रह बाधा दूर करने वाली देवी माना जाता है।
  • आठवें दिन: मां महागौरी की पूजा होगी। गौर वर्ण और श्वेत वस्त्र धारण करने वाली महागौरी पापों का क्षय कर शुद्धता और समृद्धि प्रदान करती हैं।
  • नौवें दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी, जिन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी माना गया है। उनकी कृपा से साधक को मोक्ष और ज्ञान की प्राप्ति होने की मान्यता है।

नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व:

पंडित उमेश तिवारी के अनुसार, नवरात्र में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। शास्त्रों में 2 से 10 वर्ष तक की कन्या को देवी का साक्षात स्वरूप माना गया है।

मान्यता है कि कन्या पूजन के बिना नवरात्र का अनुष्ठान अधूरा रहता है। इसी बहाने नारी शक्ति के सम्मान का संकल्प भी लिया जाता है। नौ कन्याओं को मां नवदुर्गा का प्रतीक मानकर उनका पूजन किया जाता है, जबकि एक बालक को भैरव के रूप में साथ में भोजन कराया जाता है।

कन्याओं के चरण धोकर तिलक लगाने, चुनरी ओढ़ाने तथा हलवा-पूरी और चने का प्रसाद खिलाकर दक्षिणा देने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे मां भगवती प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-शांति, धन-धान्य की वृद्धि तथा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

यह भी पढ़ें- शारदीय नवरात्रि की सबसे खास संधि पूजा: 19 अक्टूबर को बन रहा महासंयोग, जानें इसका धार्मिक महत्त्व

यह भी पढ़ें- 10 नहीं, इस बार 11 दिनों की होगी दुर्गा पूजा; हाथी पर सवार होकर सुख-समृद्धि लाएंगी मां भवानी