बिहार में अभिशाप बनी ये नदी, 'काला पानी' पीकर पशु-पक्षी भी हो रहे बीमार; सिंचाई से झुलस जाती हैं फसलें
पातेपुर में नून नदी गंभीर प्रदूषण का शिकार हो गई है, जिसका पानी काला पड़ गया है और जहरीले तत्वों से भरा है।

नून नदी। फोटो जागरण
HighLights
नून नदी का पानी काला और जहरीला, फसलों को नुकसान।
औद्योगिक कचरा और नालों का पानी प्रदूषण का मुख्य कारण।
भूजल प्रदूषण का खतरा बढ़ा, स्थायी समाधान की मांग।
मो. एहतेशाम पप्पू, पातेपुर। पातेपुर प्रखंड के उत्तरी क्षेत्र से होकर बहने वाली नून नदी अब वरदान की जगह अभिशाप बन गई है। कभी धरती की प्यास बुझाने वाली यह नदी प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है।
नदी का पानी पूरी तरह काला हो गया है और इसमें घुले जहरीले तत्व फसलों तथा पर्यावरण के लिए खतरा बन रहे हैं। पूरी नदी जलकुंभी से भरी हुई है।
हिमालय की शृंखला से निकलने वाली नून नदी मुजफ्फरपुर जिले की दक्षिणी सीमा से बहती हुई पातेपुर में प्रवेश करती है। यह हिमालय से निकलने वाली सहायक नदियों में शामिल है।
सहायक नदी वाया की तरह यह भी सर्पाकार रास्ते से बहती है। मुजफ्फरपुर की सीमा से सटे पातेपुर के चांदपुर फतह और भेरोखरा पंचायतों से शुरू होकर यह नदी सुक्की, लदहो, प्यारेपुर, हबीबपुर, पातेपुर, चांदपुरा, बलिगांव, कृष्णवाड़ा और बहुआरा होते हुए समस्तीपुर जिले में प्रवेश कर जाती है।
नून नदी मौसमी है। बारिश के दिनों में इसमें भरपूर पानी रहता है और कभी-कभार बाढ़ जैसी स्थिति से तबाही भी होती रही है। इसके बावजूद यह नदी क्षेत्र के लोगों के लिए वरदान साबित होती थी।
साल के करीब छह महीने इसमें पर्याप्त पानी रहता था। नदी सूखने के बाद भी आसपास के खेतों में नमी और भूगर्भ जलस्तर बनाए रखने में मदद करती थी। नदी के पानी से किसानों को सिंचाई करने में भी आसानी होती थी।
औद्योगिक कचरे और नालों के पानी से बढ़ा प्रदूषण
जानकारों के अनुसार पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण और मुजफ्फरपुर जिलों की सीमाएं नदी के प्रवाह क्षेत्र में आती हैं। औद्योगिक कचरा, विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट और नालों का गंदा पानी नदी में गिराया जाता है।
इससे इसका पानी खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुका है और रंग पूरी तरह काला पड़ गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार नदी का पानी इतना विषैला हो गया है कि पशु-पक्षी भी इसे पीने से बचते हैं।
प्रदूषित पानी पीने से कई दुधारू पशुओं के बीमार होने की बात सामने आई है। इस पानी के हाथ-पैर या शरीर के अन्य अंगों पर पड़ने से त्वचा संबंधी बीमारियां होने की शिकायत भी है।
इसी भय से लोग नदी का पानी छूने से भी कतराते हैं। नदी के पानी से सिंचाई करने पर फसलें असामान्य रूप से झुलस जाती हैं।
पहले किसान इसका कारण खाद और बीज की गुणवत्ता में कमी को मान रहे थे, लेकिन अब उन्हें नदी के प्रदूषित पानी पर संदेह होने लगा है।
भूगर्भ जल के प्रदूषित होने का भी खतरा
नदी का पानी भूगर्भ जलस्तर को प्रभावित करता है। जिले के गंडक नदी के तटीय क्षेत्रों में बसे हाजीपुर और महनार में आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्व मानक से अधिक मात्रा में पाए जाने की बात सामने आ चुकी है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि नून नदी का पानी इससे भी अधिक खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुका है। नदी के दोनों किनारों पर बसे करीब एक दर्जन पंचायतों के 30 से 40 गांवों के लोग प्रदूषित पानी पी रहे हैं।
अधिकांश लोगों ने 40 से 50 फीट की गहराई पर चापाकल लगाए हैं। ऐसे में भूगर्भ जल की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
शुद्ध पानी की जांच और स्थायी समाधान की मांग
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारक चौधरी, रालोसपा नेता राजकुमार सिंह, ब्रह्मदेव राय, गणेश कुमार सिंह, महेश साह, कामेंदर सिंह, मृत्युंजय ठाकुर, डॉ. अरुण कुमार, पूर्व मुखिया विनोद सिंह और प्रवीण कुमार सिंह समेत दर्जनों लोगों ने बताया कि इस समस्या को लेकर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग और जल एवं प्रदूषण पर्षद को संदेश भेजकर पानी की शुद्धता की जांच कराने तथा स्थायी समाधान की मांग की गई थी।
क्षेत्रीय सांसद और स्थानीय विधायक से भी सदन में यह मुद्दा उठाकर समस्या का निराकरण कराने की मांग की गई। हालांकि, लोगों के अनुसार, अब तक किसी स्तर पर इस दिशा में पहल नहीं हुई है।
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