कोसी-मिथिलांचल में आज भी कायम है 'उका-पाती' की परंपरा, दीपावाली पर पूर्वजों को किया जाता है याद
कोसी-मिथिलांचल में दीपावली पर 'उका-पाती' की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है, जिसमें जूट की लकड़ी जलाकर पूर्वजों को याद किया जाता है।

कोसी-मिथिलांचल में उका-पाती की परंपरा
HighLights
कोसी-मिथिलांचल में 'उका-पाती' की सदियों पुरानी परंपरा।
दीपावली पर जूट की लकड़ी जलाकर पूर्वजों का स्मरण।
धार्मिक महत्व के साथ वैज्ञानिक और पर्यावरणीय लाभ।
संवाद सहयोगी, सहरसा। सदियों से कोसी- मिथिलांचल में पूर्वजों के आत्मा की शांति और सुख- समृद्धि की कामना को ले दीपावली के मौके पर उका- पाती खेलने की परंपरा आज भी कायम है। घर के बुजुर्ग ही नहीं नई पीढ़ी के लोग भी उत्साहपूर्वक जूट की लकड़ी (सनठी) को जलाकर इस खेल में शिरकत करते हैं।
मान्यता के अनुसार जहां इसके माध्यम से लक्ष्मी के आगमन और दरिद्रता को भगाने की कामना की जाती हैं, वहीं इसके धुंआ से बैक्टीरिया, मच्छर और अन्य कीट-पतंगों को भगाने का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व भी है। इसके लिए महीनों जूट की लकड़ी जमा किया जाता है।
उका- पाती के मौके पर पूर्वजों को किया जाता है स्मरण
पटसन या जूट के पौधे की सूखी हुई सनटी को रस्सियों से बांधकर बनाई जाती है। इसमें आमतौर पर 7 से 11 तक संठी की तीलियों का इस्तेमाल होता है।
दीपावली की रात मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के बाद परिवार के बुजुर्ग घर के पुरुष सदस्य पूजा वाले घी या तेल के दीए से हुक्का-पाती में आग सुलगाकर सभी घरों में घूमते हैं। इस हुक्का-पाती (या उका पाती) परंपरा का धार्मिक के साथ वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व भी है।
दीपावली का त्योहार बारिश के मौसम के ठीक बाद आता है। इस समय नमी के कारण घरों और आस-पास के कोनों में हानिकारक वैक्टेरिया, मच्छर और अन्य कीट-पतंग पनप जाता हैं। सनठी (को जलाने से निकलने वाला धुआं से यह सभी नष्ट हो जातस हैं। वहीं इस जले उका- पाती के माध्यम से पूर्वजों को स्मरण किया जाता है।
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