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200 साल पुरानी परंपरा: सहरसा के इस मंदिर में पुजारी खुद बनाते हैं मां दुर्गा की मूर्ति

Published: Fri, 16 Oct 2026 03:19 PM (GMT+05:30)

सहरसा के गोलमा दुर्गा मंदिर में दो सौ वर्षों से पुजारी के वंशज ही मां दुर्गा की प्रतिमा बनाते आ ...और पढ़ें

HighLights

  1. गोलमा मंदिर में 200 साल से पुजारी वंशज बनाते हैं प्रतिमा।

  2. यह परंपरा मूर्तिकारों के कठिन जीवन के मिथक को तोड़ती है।

  3. परिवार के सदस्य श्रद्धा से मूर्ति बनाने गांव लौटते हैं।

कुंदन कुमार, सहरसा। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी मान्यता है कि मूर्तिकारों का जीवन बेहद कठिन होता है। उनकी आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं होती और मूर्तिकारों के परिवार बेहतर जीवन व्यतीत नहीं कर पाते। इस कारण जो लोग पूजा-पाठ में काफी विश्वास रखते हैं, वे भी अपने बच्चों को मूर्ति बनाने से मना करते हैं।

परंतु, जिले के पतरघट प्रखंड अंतर्गत गोलमा दुर्गा मंदिर के पुजारियों के वंशजों ने इस मिथक को तोड़कर यह साबित किया है कि यह मान्यता पूरी तरह अंधविश्वास से जुड़ी और लोगों को भ्रमित करने वाली है।

गोलमा मंदिर में लगभग दो सौ वर्ष पूर्व मां दुर्गा की पूजा शुरू हुई थी और तब से मंदिर के पुजारी व उनके परिवार के लोग ही मूर्ति बनाते आ रहे हैं।

एक कमरे से शुरू हुए मां के पूजा स्थल पर वर्तमान समय में ग्रामीणों के सहयोग से 111 फीट ऊंचा भव्य मंदिर बन चुका है। मंदिर में सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, परंतु मूर्ति बनाने के लिए आज भी बाहर से कोई कलाकार नहीं बुलवाया जाता।

इस मंदिर में आज भी पुजारियों के वे वंशज, जो गांव में रहते हैं या जो बाहर भी रहते हैं, पूजा से एक पखवाड़ा पूर्व गांव पहुंचकर पूरी तन्मयता और श्रद्धा से इस कार्य को पूरा करते हैं।

इस परिवार के कई लोग अच्छे-अच्छे पदों को सुशोभित कर रहे हैं। उनकी जीवन शैली में काफी बदलाव भी आया है, परंतु मां की मूर्ति बनाने के प्रति उनकी श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है।

क्या है इस मंदिर का इतिहास?

गोलमा के बुजुर्ग सुरेश प्रसाद सिंह कहते हैं कि ऐसा बताया जाता है कि लगभग दो सौ वर्ष पूर्व स्व. लाल झा, जो उस समय के चर्चित पहलवान थे, भद्दी गांव में कुश्ती के लिए गए थे।

कुश्ती के बाद रात में विश्राम के दौरान मां दुर्गा ने उन्हें स्वप्न दिया कि तुम मुझे अपने गांव ले चलो। वहां से लौटकर उन्होंने बंधु झा व ग्रामीणों के सहयोग से अपने दरवाजे पर ही मां की प्रतिमा बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी।

तब से निरंतर उनके खानदान के लोग मां की पूजा के साथ-साथ प्रतिमा बनाने की परंपरा को कायम रखे हुए हैं। उसी स्थल पर अब भव्य मंदिर बन गया है।

क्या कहते हैं पुजारी?

भगवान की आकृति को बनाना एक बेहद पवित्र, धार्मिक व रचनात्मक कार्य है। यह महज कलाकारी नहीं है, बल्कि हमारे परिवार के लोग इसे मां की भक्ति और साधना मानकर करते आ रहे हैं। इससे जहां मूर्ति बनाने वालों को मानसिक शांति मिलती है, वहीं इस खानदान पर मां की कृपा भी अनवरत बरसती है। हमारा परिवार और गांव लगातार सुख-समृद्धि की सीढ़ी चढ़ रहा है। इस दुर्गा मंदिर में सच्चे मन से मांगने वाला कभी खाली नहीं लौटता है। इसलिए दूर-दूर से लोग आकर बड़ी आस्था से यहां पूजा-अर्चना करते हैं। - पंडित चंद्रकांत झा

गोलमा मंदिर न सिर्फ गोलमा गांव, बल्कि संपूर्ण कोसी क्षेत्र के लोगों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस गांव में पूजा के समय जाति या ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं रहता। हर जाति के लोग पूरे उत्साह से महीनों पहले से दुर्गा पूजा की तैयारी में लग जाते हैं। समयाभाव के बावजूद बाहर रहने वाले लोग पूजा के समय मां के दर्शन करने जरूर पहुंचते हैं। - मुकेश कुमार सिंह (मेला प्रभारी)

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