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नालंदा का अद्भुत मंदिर: जहां विराजी हैं 18 भुजाओं वाली 'मां महारानी', मूर्ति से टपकता था रहस्यमयी जल!

Published: Fri, 16 Oct 2026 07:00 AM (IST)

नालंदा के बिंद स्थित 18 भुजा वाली मां महारानी मंदिर दुर्गा पूजा के दौरान श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है। यह ...और पढ़ें

नालंदा का अद्भुत मंदिर: जहां विराजी हैं 18 भुजाओं वाली 'मां महारानी', मूर्ति से टपकता था रहस्यमयी जल!

नालंदा का अद्भुत मंदिर: जहां विराजी हैं 18 भुजाओं वाली 'मां महारानी', मूर्ति से टपकता था रहस्यमयी जल!

HighLights

  1. बिंद में 18 भुजा वाली मां महारानी मंदिर की महिमा।

  2. विंध्याचल के बाद 18 भुजाओं वाली देवी प्रतिमा का महत्व।

  3. सरसों तेल, सिंदूर लेप और जल टपकने की अनूठी परंपरा।

आशुतोष कुमार, बिंद। दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर चारों ओर मां दुर्गा की आराधना की धूम है। श्रद्धालु माता के दरबार में पहुंचकर सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना कर रहे हैं।

इसी बीच नालंदा जिले के बिंद प्रखंड स्थित 18 भुजा वाली मां महारानी का मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक कथाओं को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है।

यहां स्थापित काले पत्थर की विशाल प्रतिमा की 18 भुजाएं हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

मान्यता है कि मां महारानी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं। दुर्गा पूजा की अष्टमी और नवमी को मंदिर में महिलाओं की विशेष भीड़ जुटती है। महिलाएं माता की गोद भराई कर परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की खुशहाली और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।

विंध्याचल के बाद 18 भुजाओं वाली प्रतिमा की मान्यता

मंदिर की पुजारिन सुमित्रा देवी के अनुसार, बिंद का यह मंदिर 18 भुजा वाली मां महारानी के नाम से प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यताओं में इसे विंध्याचल के बाद 18 भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा वाले प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है।

बुजुर्गों के मुताबिक, मंदिर पहले झोपड़ीनुमा था। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था और सहयोग से इसका निर्माण एवं विस्तार होता गया। आज मंदिर परिसर को भव्य स्वरूप दिया गया है।

सरसों तेल और सिंदूर लगाने की परंपरा

मंदिर की पुजारिन सुमित्रा देवी बताती हैं कि मां महारानी की प्रतिमा पर सरसों तेल और सिंदूर का लेप लगाने की परंपरा चली आ रही है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार माता की पूजा-अर्चना करते हैं।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, प्रतिमा के पीछे पत्थर पर कुछ लिखा हुआ है, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। मंदिर से जुड़ी यह बात भी लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनी हुई है।

सूर्य की किरणों से जल टपकने की है मान्यता

मंदिर से जुड़ी प्रचलित कथाओं के अनुसार, पहले सूर्य की किरणें पड़ने पर काले पत्थर की प्रतिमा से जल की बूंदें टपकती थीं। स्थानीय बुजुर्ग इस घटना को माता की विशेष महिमा से जोड़कर देखते हैं।

गांव के बुजुर्ग यह भी बताते हैं कि पहले जब क्षेत्र में हैजा फैलता था, तब माता को अर्पित जल श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता था। लोगों की मान्यता थी कि इससे बीमार लोगों को राहत मिलती थी।

महात्मा बुद्ध के आगमन और गजनी के अक्रमण की चर्चा

मंदिर के इतिहास को लेकर स्थानीय स्तर पर कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध भी बिंद गांव आए थे और इस क्षेत्र का उल्लेख पाली साहित्य में मिलता है।

वहीं, स्थानीय मान्यता के अनुसार, आक्रमण के दौरान मोहम्मद गजनी ने यहां स्थापित देवी प्रतिमा के साथ दूसरी प्रतिमा को भी खंडित कर दिया था। इन ऐतिहासिक दावों की पुष्टि के लिए प्रमाणिक ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों की आवश्यकता है।

मंदिर परिसर में स्थापित हैं कई देवी-देवताओं की प्रतिमाए

मंदिर के अध्यक्ष विपिन कुमार ने बताया कि मंदिर परिसर में नाग देवता सहित कई देवी-देवताओं की काले पत्थर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। स्थानीय श्रद्धालु प्रतिदिन यहां पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं।

मंदिर की सुरक्षा और निगरानी के लिए परिसर में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। यहां विवाह, मुंडन, वाहन पूजा और सत्यनारायण भगवान की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी कराए जाते हैं।

दुर्गा पूजा के अवसर पर मां महारानी के दरबार में श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है। धार्मिक परंपराओं, स्थानीय इतिहास से जुड़ी कथाओं और वर्षों से चली आ रही पूजा-पद्धति के कारण बिंद का यह मंदिर क्षेत्र की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

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