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पिता करते थे मजदूरी, बेटी ने सेल्फ स्टडी के दम पर हासिल की सरकारी नौकरी; रोहतास की ममता के संघर्ष की कहानी  

Published: Sun, 01 Nov 2026 10:02 AM (IST)

ममता कुमारी ने गरीबी और विपरीत परिस्थितियों को पार कर बीपीएससी शिक्षक बनकर मिसाल कायम की है। रोहतास जिले की ...और पढ़ें

ममता कुमारी। फोटो जागरण

ममता कुमारी। फोटो जागरण

HighLights

  1. ममता कुमारी ने गरीबी के बावजूद बीपीएससी परीक्षा पास की।

  2. आर्थिक तंगी के कारण प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला नहीं ले पाईं।

  3. अब रोहतास के विश्रामपुर विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत।

प्रेम पाठक, डेहरी आनसोन (रोहतास)। बेटियां लक्ष्मी स्वरूपा होती हैं, जो एक नहीं बल्कि दो घरों, मायके और ससुराल को संवारती हैं, लेकिन तब क्या हो जब एक बेटी के पंख आसमान छूने से पहले ही गरीबी और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ गए हों।

जिले के रोहतास प्रखंड के रसूलपुर गांव की बेटी ममता कुमारी ने इन तमाम वर्जनाओं और विकट परिस्थितियों को चीरकर साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो तकदीर की लकीरें भी बदल जाती हैं।

आजीविका के लिए संकट झेला

रोहतास और नौहट्टा का वह इलाका, जहां आर्थिक पिछड़ापन और अशिक्षा का पहरा आज भी कड़ा है। बेटियों के लिए सपनों की उड़ान भरना किसी चुनौती से कम नहीं। ऐसे ही एक निहायत गरीब परिवार में जन्मी ममता कुमारी का जीवन संघर्षों की खुली किताब है।

उनके पिता धर्मेंद्र सिंह परिवार का पेट पालने के लिए परदेश में मजदूरी करते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। रीढ़ की हड्डी की गंभीर समस्या और ऑपरेशन के बाद पिता लाचार हो घर लौट गए।

घर में चूल्हा जलाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया था। ऐसे में ममता की पढ़ाई जारी रखना पहाड़ तोड़ने जैसा था। बावजूद इसके, ममता की पढ़ने की ललक (जिजीविषा) एक पल के लिए भी डिगी नहीं।

उन्होंने हर बाधा को अपनी ताकत बनाया। वर्ष 2018 में गांव के ही वित्त रहित उच्च विद्यालय रसूलपुर से 80 प्रतिशत अंकों के साथ मैट्रिक की परीक्षा पास की।

वर्ष 2020 में जवाहरलाल नेहरू कॉलेज डेहरी से 86.20 प्रतिशत अंकों के साथ इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इंटर में मिले 25 हजार रुपये की मेधा छात्रवृत्ति ने उनकी आगे की राह को थोड़ा आसान किया।

आर्थिक तंगी नहीं रोक पाई रास्ता 

असाधारण मेधा के बल पर ममता का चयन बक्सर राजकीय पॉलीटेक्निक और बीएचयू (वाराणसी) के कृषि संकाय जैसी प्रतिष्ठित जगहों पर हुआ, लेकिन घर की भीषण आर्थिक तंगी ऐसी दीवार बनकर खड़ी हुई कि वे वहां नामांकन नहीं करा सकीं। यह क्षण किसी भी युवा को तोड़ने के लिए काफी था, परंतु ममता ने हार नहीं मानी।

उन्होंने निराशा को पीछे छोड़कर स्व-अध्ययन (सेल्फ स्टडी) का कठिन मार्ग चुना और डीएलएड में प्रवेश लिया। पहली ही कोशिश में कड़ी मेहनत और अटूट लगन का प्रतिफल मिलने में देर नहीं लगी। वर्ष 2023 में ममता ने अपनी मेहनत के दम पर बीपीएससी (ट्रे-1) की परीक्षा पहले ही प्रयास में सफलतापूर्वक पास कर ली।

घर और बच्चों का भविष्य संवार रहीं ममता

आज वह रोहतास जिले के ही दिनारा प्रखंड स्थित विश्रामपुर विद्यालय में बतौर शिक्षिका नौनिहालों का भविष्य संवार रही हैं। सरकारी पद पाना ही उनकी जीत नहीं है, बल्कि यह भीषण अभावों और सामाजिक बाधाओं के खिलाफ लड़ी गई एक महासंग्राम की जीत है।

परिवार की ढाल और समाज की प्रेरणा बन शिक्षिका के रूप में न सिर्फ वे स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही हैं, बल्कि घर की दहलीज पर भी अपनी पूरी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

अपने बीमार पिता की सेवा, छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च और पूरे घर-परिवार की कमान उन्होंने बेहद मुस्तैदी से संभाल रखी है। यह बेटी आज साबित कर चुकी है कि विपरीत परिस्थितियां किसी के मुकद्दर का फैसला नहीं कर सकती।

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