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मक्के के राज में 'गोल्डेन फाइबर' की सेंधमारी, सीमांचल के खेतों में फिर लौटा जूट का सुनहरा दौर

Published: Wed, 23 Sep 2026 05:09 PM (IST)

सीमांचल के खेतों में डेढ़ दशक बाद कृषि पैटर्न में बड़ा बदलाव दिख रहा है, जहां मक्के के प्रभुत्व के ...और पढ़ें

सीमांचल में कृषि क्रांति: मक्के से मखाने और जूट की ओर किसानों का बढ़ता रुझान

सीमांचल में कृषि क्रांति: मक्के से मखाने और जूट की ओर किसानों का बढ़ता रुझान

HighLights

  1. सीमांचल में डेढ़ दशक बाद कृषि पैटर्न में बदलाव।

  2. मक्का के बाद मखाना और जूट की खेती में वृद्धि।

  3. सरकारी प्रोत्साहन से जूट फिर बना किसानों की पसंद।

मनोज कुमार, पूर्णिया। कभी सीमांचल के बीचोबीच से 'कोसी' गुजरती थी और यहां की किसानी कोसी के रहमोकरम पर निर्भर थी। कोसी पश्चिम सरकती गई और यहां के खेत आबाद होने लगे। दशकों तक पारंपरिक खेती तक किसानों की दहलीज सिमटी रही।

लगभग तीन दशक पूर्व तक जूट की खेती के चलते इस इलाके की पहचान जूट नगरी के रूप में रही। इसके बाद केले की फसल की एंट्री हुई और डेढ़ दशक पूर्व तक यहां के खेतों में केले की बादशाहत रही।

डेढ़ दशक से यहां मक्के का राज है, लेकिन अब मक्के में मखाने की सेंधमारी शुरू हो गई है। इधर, धान में जूट की फिर से घुसपैठ शुरू है। कृषि विभाग के अनुसार, दो वर्ष में मखाना व जूट के रकबे में वृद्धि हुई है। खेतों में बदलाव शुरू है।

कभी किसानों की समृद्धि का प्रतीक था गोल्डेन फाइबर

गोल्डेन फाइबर के नाम से मशहूर जूट, सीमांचल सहित कभी पूर्वी भारत के लाखों किसानों की समृद्धि का सबसे बड़ा प्रतीक था। खासकर पूर्णिया की उपजाऊ मिट्टी और मानसूनी जलवायु जूट की खेती के लिए बेहद उपयुक्त रही है, जिस कारण यहां दशकों से बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती रही।

एक समय था जब पूर्णिया सहित सीमांचल के किसानों के लिए जूट आय का सबसे बड़ा स्रोत और उनकी समृद्धि का प्रतीक हुआ करता था। यहां का पाट बंगाल की जूट मिलों का सबसे बड़ा स्रोत था।

उस दौर में कटिहार में जूट मिल और पूर्णिया में जूट पार्क की स्थापना भी हुई, लेकिन धीरे-धीरे कई गंभीर चुनौतियों के कारण यह फसल संकट के दौर से गुजरने लगा।

समय के साथ उचित तकनीकी समर्थन की कमी, बाजार की मनमानी, स्थानीय मिलों के बंद होने और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग आदि के कारण जूट के रकबे में गिरावट आने लगी और यह इतिहास के पन्नों में सिमटता नजर आने लगा था।

कृषि विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, सीमांचल के पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज में जूट का रकबा जो पहले कभी डेढ से दो लाख हेक्टेयर से अधिक हुआ करता था, वो अब पूरे बिहार में सिमटकर अब केवल 0.59 लाख हेक्टेयर के आसपास रह गया है।

पूर्णिया में यह रकबा पांच साल पहले घट कर मात्र सात-आठ हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया था, लेकिन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग और सरकारी प्रयासों के कारण यह उद्योग एक बड़े बदलाव और आधुनिकीकरण के दौर से गुजर रहा है तथा इसके रकबे में बढ़ोतरी हो रही है।

कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 25-26 में पूर्णिया में करीब 10 हजार हेक्टेयर में जूट की खेती की गई है।

सरकारी प्रयास ला रहा रंग

हाल के दिनों में सरकार के प्रोत्साहन और विभिन्न योजनाओं के कारण जूट की खेती का दायरा और किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है। किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती, उन्नत किस्म के बीज और रेशे निकालने की आधुनिक तकनीक सिखाने के लिए सरकार जूट केयर योजना चला रही है।

इसके साथ ही कृषि विभाग द्वारा किसानों को उन्नत प्रभेद के बीज पर 50 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जा रहा है। राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम के तहत जूट उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने और प्लास्टिक के विकल्प के रूप में जूट को बढ़ावा देने का काम भी किया जा रहा है।

सरकार बाजार की मनमानी पर रोक लगाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसानों को दे रही है। सरकारी नियमों के तहत खाद्यान्न और चीनी की पैकिंग में जूट के बोरों का उपयोग अनिवार्य किया गया है, जिससे किसानों को एक सुनिश्चित बाजार मिल रहा है।

पूर्णिया सहित सीमांचल के क्षेत्रों में सरकारी मदद और प्रशिक्षण से जूट की खेती बेहद फायदेमंद साबित हो रही है, जिससे इसका रकबा तेजी से बढ़ने लगा है।

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