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दुनिया का सबसे दुर्लभ विशाल पक्षी पहुंचा पूर्णिया! सेमल के पेड़ों पर दिया बच्चों को जन्म

Published: Thu, 05 Nov 2026 04:07 PM (IST)

Rare Greater Adjutant Storks: पूर्णिया जिले के बीकोठी और रूपौली प्रखंड में दुर्लभ बड़े गरुड़ पक्षियों का प्रजनन देखा गया है, जहां उनके बच्चे अब उड़ान भर रहे हैं।

पेड़ पर मौजूद दुर्लभ बड़ा गरुड़। (जागरण)

पेड़ पर मौजूद दुर्लभ बड़ा गरुड़। (जागरण)

HighLights

  1. पूर्णिया के बीकोठी-रूपौली में दुर्लभ बड़े गरुड़ पक्षियों का प्रजनन जारी।

  2. सेमल के पेड़ों पर घोंसले, बच्चे अब खुले आसमान में उड़ रहे।

  3. स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से गरुड़ संरक्षण को मिल रहा बढ़ावा।

जागरण संवाददाता, धमदाहा (पूर्णिया)। पूर्णिया जिले के कोसी-सीमांचल इलाके में दुर्लभ बड़े गरुड़ पक्षियों की मौजूदगी लगातार ध्यान आकर्षित कर रही है।

जिले के बीकोठी प्रखंड से लेकर रूपौली तक इन पक्षियों के बसेरे और घोंसले मिलने की जानकारी सामने आ चुकी है। बीकोठी प्रखंड कार्यालय परिसर के विशाल सेमल के पेड़ इन दिनों बड़े गरुड़ों का आशियाना बने हुए हैं।

यहां कई घोंसलों में इनका प्रजनन हो रहा है और एक दर्जन से अधिक बच्चे अब बड़े होकर खुले आसमान में उड़ान भरने लगे हैं।

खास बात यह है कि इनकी मौजूदगी केवल प्रखंड कार्यालय परिसर तक सीमित नहीं है, बल्कि बालुटोला समेत आसपास के कई अन्य गांवों में भी सेमल और दूसरे विशाल पेड़ों पर इनका बसेरा देखा जा रहा है।

सुबह होते ही प्रखंड परिसर के आसमान में इन विशाल पक्षियों की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। वयस्क पक्षी भोजन की तलाश में आसपास के खेतों और जलस्रोतों की ओर उड़ान भरते हैं।

भोजन जुटाने के बाद वे वापस अपने घोंसलों में लौट आते हैं और बच्चों को भोजन उपलब्ध कराते हैं। अब बच्चे भी धीरे-धीरे उड़ना सीख रहे हैं और अपने माता-पिता के साथ आसमान में विचरण करते दिखाई देने लगे हैं। बच्चों को उड़ान भरते देखना स्थानीय लोगों और प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

बालुटोला समेत कई गांवों में भी मजबूत मौजूदगी

बीकोठी प्रखंड कार्यालय परिसर के अलावा इसी प्रखंड के बालुटोला और आसपास के कई अन्य गांवों में भी बड़े गरुड़ पक्षियों की मजबूत मौजूदगी देखने को मिल रही है।

इन गांवों में सेमल समेत अन्य विशाल पेड़ों पर इन पक्षियों ने अपना बसेरा बना रखा है। स्थानीय स्तर पर इनकी संख्या में लगातार इजाफा होने की बात भी सामने आ रही है।

Rare Greater Adjutant Storks

पेड़ पर मौजूद दुर्लभ गरुड़ का झुंड।

इन इलाकों में मौजूद जलस्रोतों के कारण पक्षियों को भोजन आसानी से उपलब्ध हो रहा है, जिससे यह क्षेत्र इनके लिए अनुकूल साबित हो रहा है।

सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि स्थानीय ग्रामीणों का भी इन पक्षियों के प्रति सहयोगात्मक रवैया देखने को मिल रहा है। लोग न तो पेड़ों पर बने इनके घोंसलों के आसपास इन्हें परेशान करते हैं और न ही भोजन की तलाश में जमीन पर उतरने के दौरान इनके साथ छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार करते हैं।

ग्रामीणों के इसी सहयोग और अनुकूल प्राकृतिक वातावरण के कारण इन पक्षियों को यहां सुरक्षित माहौल मिल रहा है।

रूपौली के नवटोलिया में भी मिल चुके हैं कई घोंसले

पूर्णिया जिले के रूपौली प्रखंड में भी बड़े गरुड़ पक्षियों की मौजूदगी और उनके घोंसले मिलने की जानकारी सामने आ चुकी है।

24 मार्च 2024 को आई एक रिपोर्ट के अनुसार, रूपौली प्रखंड की नाथपुर पंचायत के नवटोलिया गांव में बरगद के पेड़ पर बड़े गरुड़ के कई घोंसले पाए गए थे।

इसके अलावा अप्रैल 2022 की एक रिपोर्ट में पूर्णिया, मधेपुरा और खगड़िया जिले के नए इलाकों में गरुड़ों के घोंसले मिलने और उनके प्रजनन की जानकारी सामने आई थी।

इससे स्पष्ट होता है कि भागलपुर के कदवा दियारा तक सीमित माने जाने वाले इनके प्रजनन स्थलों का विस्तार बिहार के दूसरे जिलों तक भी हुआ है। रूपौली के नवटोलिया और बीकोठी के विभिन्न गांवों में इनकी मौजूदगी पूर्णिया जिले के लिए वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संकेत है।

ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क होने की संभावना

उपलब्ध तस्वीरों में इन पक्षियों की शारीरिक बनावट ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (Greater Adjutant Stork) से मिलती-जुलती दिखाई देती है, जिसे स्थानीय स्तर पर बड़ा गरुड़ भी कहा जाता है।

Rare Greater Adjutant Storks

पेड़ पर मौजूद गरुड़ का झुंड।

लंबी और मोटी चोंच, पीला-नारंगी रंग की गर्दन, सिर पर कम पंख और विशाल शरीर इसकी प्रमुख पहचान हैं। हालांकि, प्रजाति की आधिकारिक पुष्टि पक्षी विशेषज्ञों अथवा वन्यजीव विशेषज्ञों के वैज्ञानिक निरीक्षण के बाद ही हो सकेगी।

ग्रेटर एडजुटेंट दुनिया के बड़े सारस जैसे पक्षियों में शामिल है। आईयूसीएन के वैश्विक आकलन में इसे नियर थ्रेटेंड यानी निकट संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में पूर्णिया जिले के विभिन्न इलाकों में इनकी मौजूदगी और संभावित प्रजनन स्थलों का मिलना काफी महत्वपूर्ण है।

कोसी क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं बड़े प्रजनन केंद्र

बिहार का कोसी क्षेत्र इन पक्षियों के अनुकूल प्राकृतिक आवास के रूप में जाना जाता है। भागलपुर जिले के कदवा दियारा में ग्रेटर एडजुटेंट के बड़े प्रजनन केंद्र मौजूद हैं। यहां स्थानीय समुदाय और पर्यावरण प्रेमियों के सहयोग से इनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं।

भागलपुर के कोसी नदी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में वर्ष 2019 से 2021 तक किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में गरुड़ों की कई प्रजनन कॉलोनियों और सैकड़ों बच्चों के पालन-पोषण का रिकॉर्ड दर्ज किया गया था।

अध्ययन के अनुसार ये पक्षी कदंब, पीपल, पाकड़, गम्हार और सेमल जैसे ऊंचे पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं। बिहार में इनका प्रजनन काल सितंबर से अप्रैल तक दर्ज किया गया है।

घोंसलों वाले पेड़ों की सुरक्षा जरूरी

पक्षियों की लगातार बढ़ती मौजूदगी के बीच इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती है। घोंसले वाले पेड़ों की कटाई, शाखाओं की छंटाई, अत्यधिक शोर और मानवीय हस्तक्षेप से इनके प्रजनन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

इसलिए जरूरी है कि बीकोठी के प्रखंड कार्यालय परिसर, बालुटोला और आसपास के गांवों के साथ-साथ रूपौली के नवटोलिया में भी इनके बसेरे का सर्वेक्षण कराया जाए।

वन विभाग की ओर से इन इलाकों में घोंसलों, वयस्क पक्षियों और बच्चों की वास्तविक संख्या का रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए।

घोंसले वाले पेड़ों को चिह्नित कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही नियमित निगरानी की व्यवस्था हो, ताकि प्रजनन के दौरान पक्षियों को किसी तरह की परेशानी न हो।

पूर्णिया में गरुड़ संरक्षण की बन सकती है नई पहचान

बीकोठी से रूपौली तक बड़े गरुड़ पक्षियों की मौजूदगी केवल आकर्षण का केंद्र नहीं, बल्कि जिले की समृद्ध जैव विविधता का भी परिचायक है। इन पक्षियों को यहां अनुकूल वातावरण, जलस्रोतों से भोजन की उपलब्धता और सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय लोगों का सहयोग मिल रहा है।

जरूरत है कि इस प्राकृतिक धरोहर को समय रहते पहचाना जाए और इसके संरक्षण के लिए ठोस पहल की जाए। वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों की सामूहिक भागीदारी से इन पक्षियों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जा सकता है।

यदि समय रहते पहल हुई तो पूर्णिया जिला आने वाले समय में गरुड़ पक्षियों के संरक्षण और प्रजनन के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में अपनी अलग पहचान बना सकता है।

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