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सुई-धागे के सहारे मां ने बुनी बेटी की तकदीर, बिहार की ज्योति राजगीर में बनीं क्लर्क

Published: Thu, 05 Nov 2026 03:23 PM (IST)

झाझा प्रखंड की ज्योति कुमारी ने अपने माता-पिता के संघर्ष और त्याग की बदौलत निबंधन विभाग में लिपिक का पद हासिल किया है।

अपनी फैमिली के साथ ज्योति कुमारी। (जागरण)

अपनी फैमिली के साथ ज्योति कुमारी। (जागरण)

HighLights

  1. ज्योति कुमारी का निबंधन विभाग में लिपिक पद पर चयन हुआ।

  2. मां निर्मला देवी ने सिलाई कर बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाया।

  3. पिता दयानंद बर्णवाल ने कोचिंग पढ़ाकर ज्योति का मार्गदर्शन किया।

सोनू कुमार सिंह, बोड़वा (जमुई)। अभावों की पथरीली राहों पर जब हौसलों के कदम पड़ते हैं तो मंजिलें खुद झुक जाती हैं। झाझा प्रखंड क्षेत्र के धमना निवासी ज्योति कुमारी ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है।

मां के हाथों में दिन-रात चलने वाली सिलाई मशीन की खट-खट और पिता के पसीने की कमाई ने मिलकर एक ऐसा मुकाम हासिल किया, जिसने पूरे गांव की छाती चौड़ी कर दी है।

ज्योति का चयन निबंधन विभाग में लिपिक के पद पर हुआ है और वर्तमान में वे ऐतिहासिक धरती राजगीर में पदस्थापित हैं। ज्योति के पिता दयानंद बर्णवाल स्थानीय बच्चों को कोचिंग पढ़ाकर घर की गाड़ी खींचते हैं।

वहीं, मां निर्मला देवी कपड़े सिलकर परिवार का मजबूत संबल बनी रहीं। घर में कई बार आर्थिक तंगी के बादल छाए, लेकिन मां ने बेटी की किताबों की कमी कभी महसूस नहीं होने दी।

कपड़े सिलकर पाई-पाई जोड़ती रहीं और बेटी के सुनहरे भविष्य की सिलाई करती रहीं। पिता ने भी अपनी शैक्षणिक समझ से ज्योति का हर मोड़ पर मार्गदर्शन किया।

मां की सिलाई मशीन ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा

अपनी सफलता पर भावुक होते हुए ज्योति कहती हैं कि उनकी असली ताकत उनके माता-पिता का त्याग है। जब भी पढ़ाई के दौरान हिम्मत टूटती थी तो मां के हाथों में सुई और पिता के माथे का पसीना याद आ जाता था।

ज्योति का मानना है कि बेटियां अगर ठान लें तो कोई भी रुकावट उनके हौसलों की उड़ान को रोक नहीं सकती। गांव के हर कोने में आज इस होनहार बिटिया की चर्चा और गर्व का माहौल है।

मां निर्मला देवी ने कहा कि जब भी कपड़ों पर सुई चलती थी, बस यही प्रार्थना रहती थी कि मेरी बेटी की जिंदगी का हर पन्ना रोशन हो। आज जब उसे सरकारी दफ्तर में कुर्सी पर बैठे देखती हूं तो मेरी उंगलियों का हर छाला और दर्द सुकून में बदल जाता है।

पिता दयानंद बर्णवाल ने कहा कि हमने कभी बेटे और बेटी में फर्क नहीं समझा। संसाधन सीमित थे, मगर बेटी के सपनों को हमने कभी छोटा नहीं होने दिया। आज उसने हमारे संघर्ष को मान-सम्मान में बदल दिया है।

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ज्योति की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं। जरूरत है कि परिवार और समाज बेटियों को समान अवसर, प्रोत्साहन और आगे बढ़ने की आजादी दें। उनकी प्रतिभा को पहचान मिलेगी, तभी समाज की वास्तविक प्रगति संभव है।

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सुनील कुमार, निदेशक, कौशल विकास केंद्र, झाझा

ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली ज्योति का क्लर्क बनना इस बात का प्रमाण है कि सोच बदल रही है। समाज में बेटियों के प्रति मानसिकता बदलनी होगी।

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गोपाल प्रसाद बर्णवाल, अध्यक्ष, बर्णवाल सेवा समिति, झाझा

अभावों के बीच से निकलकर सरकारी सेवा तक पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि लगन सच्ची हो तो हालात मायने नहीं रखते। ज्योति ने न सिर्फ माता-पिता का, बल्कि पूरे पंचायत का नाम ऊंचा किया है। पंचायत प्रशासन बेटी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

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दीपिका कुमारी, जिला परिषद सदस्य

ज्योति बिटिया की यह कामयाबी पूरे गांव के साथ प्रखंड क्षेत्र का गौरव है। उसने सीमित साधनों में वह कर दिखाया जो कई लोग बड़े नगरों में रहकर भी नहीं कर पाते। गांव की अन्य बेटियों को भी इससे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

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चंद्रदेव यादव, प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि, झाझा

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