64 KG गांजा लेकर गुवाहाटी से पटना तक बेधड़क पहुंची गाड़ी, हाई कोर्ट ने पूछा- रास्ते में कहां थी पुलिस की जांच?
गुवाहाटी से पटना तक 64 किलो गांजा बेखौफ पहुंचने पर पटना हाई कोर्ट ने बिहार की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

64 KG गांजा लेकर गुवाहाटी से पटना तक बेधड़क पहुंची गाड़ी (AI Generated Image)
HighLights
गुवाहाटी से पटना 64 किलो गांजा पहुंचने पर हाई कोर्ट चिंतित।
पुलिस जांच और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए।
नाबालिगों को जमानत मिली, विस्तृत जांच के आदेश दिए गए।
विधि संवाददाता, पटना। गुवाहाटी से पटना तक करीब 64 किलो गांजा लेकर एक महिंद्रा टीयूवी के बेखौफ पहुंच जाने के मामले ने बिहार की सुरक्षा और पुलिस जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गाड़ी में 63.76 किलो गांजा (कुल वजन 65.940 किलो) बरामद हुआ।
हैरानी की बात यह कि गाड़ी चला रहे दोनों आरोपितों के पास न ड्राइविंग लाइसेंस था, न वाहन के कागजात और न ही पहचान पत्र। इसके बावजूद गाड़ी असम से बिहार होते हुए पटना के दीदारगंज तक पहुंच गई।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अरुण कुमार झा की एकलपीठ ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार के दावों पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि दो नाबालिग बिना किसी रुकावट के इतनी बड़ी मात्रा में गांजा लेकर अंतरराज्यीय सीमाएं पार कर सकते हैं, तो वे विस्फोटक भी ला सकते थे, जिससे आम लोगों की जान खतरे में पड़ सकती थी। अदालत ने सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता होने के सरकारी दावे को 'ढोंग' जैसा प्रतीत होने की बात कही।
25 और 21 साल बताए, जांच में निकले 15 और 16 के
मामले में उम्र को लेकर भी बड़ा विरोधाभास सामने आया। डीआरआई ने गिरफ्तारी के समय दोनों की उम्र क्रमशः 25 और 21 वर्ष दर्ज की थी। बाद में जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड की जांच में उनकी उम्र 15 वर्ष 9 माह और 16 वर्ष पाई गई।
अदालत ने इस अंतर पर भी गंभीरता जताई। दोनों के इस दावे पर भी सवाल उठे कि उन्होंने कभी स्कूल में पढ़ाई नहीं की। हाई कोर्ट ने इस पहलू के साथ उनकी उम्र और पृष्ठभूमि की भी जांच का निर्देश दिया है।
अदालत ने पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पूरे मामले की जांच कर तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। जांच में रास्ते में हुई सुरक्षा जांच की स्थिति, दोनों की वास्तविक उम्र और उनके शैक्षणिक व सामाजिक पृष्ठभूमि की पड़ताल शामिल होगी।
यदि उम्र छिपाने या किसी तरह के फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है तो डीआरआई और राज्य सरकार को जमानत रद्द कराने के लिए कार्रवाई की स्वतंत्रता होगी।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों को जमानत देने का प्रविधान है और केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने निचली अदालत और जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेशों को निरस्त करते हुए दोनों को 10-10 हजार रुपये के मुचलके और परिजनों की गवाही पर जमानत देने का निर्देश दिया।
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