'बुलडोजर राज' पर पटना हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, अवैध तरीके से घर ढहाने पर सरकार देगी मुआवजा
पटना हाई कोर्ट ने पूर्वी चंपारण में बिना वैध आदेश के मकान ढहाए जाने पर राज्य प्रशासन के रवैये पर ...और पढ़ें
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पटना हाई कोर्ट ने अवैध ध्वस्तीकरण पर सरकार को फटकारा, पीड़ितों को मिलेगा मुआवजा
HighLights
पटना हाई कोर्ट ने अवैध ध्वस्तीकरण पर राज्य प्रशासन को फटकारा।
पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा देने और अंतिम क्षतिपूर्ति तय करने का आदेश।
अवैध घर गिराना व्यक्ति के जीवन, सम्मान पर गंभीर आघात।
विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने पूर्वी चंपारण में बिना किसी वैध ध्वस्तीकरण आदेश के जेसीबी से मकान और चहारदीवारी तोड़े जाने के मामले में राज्य प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है।
न्यायाधीश राज कुमार की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के घर को गैरकानूनी तरीके से ढहा देना केवल संपत्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उसके जीवन, सम्मान और पहचान पर गंभीर आघात है।
कोर्ट ने पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा देने के साथ पूरे नुकसान का आकलन कर अंतिम क्षतिपूर्ति तय करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि "जैसे आत्मा शरीर में रहती है, वैसे ही व्यक्ति का जीवन उसके घर से जुड़ा होता है। घर का गलत तरीके से ध्वस्त किया जाना परिवार की पहचान और मानसिक शांति पर गहरा आघात पहुंचाता है।"
क्या है मामला?
मामला पूर्वी चंपारण के विष्णु शंकर सिंह, विनोद कुमार सिंह और अरविंद कुमार सिंह से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनकी जमीन के संबंध में अभिलेख उनके पक्ष में होने और अतिक्रमण की कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद कुछ लोगों ने जेसीबी लगाकर उनके मकान और चहारदीवारी को ध्वस्त कर दिया।
आरोप है कि मौके पर मौजूद अधिकारी इस कार्रवाई को रोकने के बजाय मूकदर्शक बने रहे। घटना के बाद भी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद प्रशासन ने उनके खिलाफ ही जमीन रद करने की कार्रवाई शुरू कर दी।
कोर्ट ने राज्य की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि ध्वस्तीकरण असामाजिक तत्वों ने किया था। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रशासन की मौजूदगी में किसी नागरिक का घर अवैध रूप से ढहा दिया जाता है तो राज्य अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में सम्मान के साथ रहने और आश्रय का अधिकार भी निहित है। वहीं, अनुच्छेद 300-ए के तहत किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से कानून के अधिकार के बिना वंचित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने पूर्वी चंपारण के आयुक्त को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता संख्या एक को 1.50 लाख रुपये तथा याचिकाकर्ता संख्या दो और तीन को दो-दो लाख रुपये दो महीने के भीतर अंतरिम राहत के रूप में दिए जाएं।
साथ ही, तीन महीने के भीतर मकान और अन्य संपत्ति को हुए वास्तविक नुकसान तथा पीड़ितों को हुई क्षति का विस्तृत आकलन कर अंतिम मुआवजे का निर्धारण करने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने मामले में पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी की भूमिका को देखते हुए उन्हें मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया से अलग कर दिया। पीठ ने कानूनी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।
