'कब्जा दिलाने के नाम पर किसी का मकान नहीं तोड़ सकता प्रशासन', बुलडोजर एक्शन पर पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी
पटना हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि प्रशासन जमीन का कब्जा दिलाने के नाम पर किसी का मकान नहीं तोड़ सकता।

पटना हाई कोर्ट। (फाइल फोटो)
HighLights
प्रशासन कब्जा दिलाने के लिए मकान नहीं तोड़ सकता।
हाई कोर्ट ने बिहार सरकार को मुआवजा देने का आदेश दिया।
नवादा मामले में ₹2 लाख अंतरिम मुआवजा मिलेगा।
जागरण संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जमीन का कब्जा दिलाने का आदेश प्रशासन को किसी का मकान तोड़ने का अधिकार नहीं देता।
प्रशासनिक अधिकारी कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी नागरिक के घर को ध्वस्त नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने नवादा में मकान तोड़े जाने के मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को पीड़ित को मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
न्यायाधीश राज कुमार की एकलपीठ ने वीरेंद्र कुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद बिहार के मुख्य सचिव को तीन महीने के भीतर याचिकाकर्ता को दो लाख रुपये अंतरिम मुआवजा दिलाना सुनिश्चित करने का आदेश दिया।
इसके साथ ही अदालत ने नुकसान का तकनीकी आकलन कराकर शेष देय मुआवजे का भुगतान अगले चार महीने में सुनिश्चित करने को भी कहा है।
मामला नवादा के राम नगर का है। याचिकाकर्ता के अनुसार, 13 जनवरी 2016 को प्रशासन की मौजूदगी में नगर परिषद की जेसीबी और भारी पुलिस बल की सहायता से उसका मकान गिरा दिया गया था।
कब्जा दिलाने के लिए की गई थी अपील
जमीन के मालिकाना हक को लेकर सिविल कोर्ट में टाइटल सूट संख्या 357/2014 लंबित था। वहीं, कब्जा दिलाने के डीसीएलआर के आदेश के खिलाफ अपील भी दायर की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि कब्जा दिलाने और मकान ध्वस्त करने की कार्रवाई अलग-अलग हैं। डीसीएलआर के आदेश में मकान गिराने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था। अदालत ने प्रशासन के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि वह केवल मूकदर्शक था। नगर परिषद की जेसीबी और 92 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के मद्देनजर राज्य अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
हालांकि, जमीन के मालिकाना हक और कब्जे का विवाद अदालत ने सिविल कोर्ट के फैसले के लिए छोड़ दिया। मुआवजे के आकलन और भुगतान की जिम्मेदारी मुख्य सचिव को सौंपी गई है। निष्पक्षता के लिए नवादा के जिलाधिकारी को इस प्रक्रिया से अलग रखा गया है।