नीम करोली बाबा पर बनी 'हनुमान अंश' से पहले गूंजा हनुमान चालीसा, जय श्रीराम के जयकारों से भक्तिमय हुआ पटना के सिनेमा हॉल
जागरण फिल्म फेस्टिवल के अंतिम दिन 'हनुमान अंश' फिल्म की प्रस्तुति से पहले पटना के सभागार में 'जय श्रीराम' और ...और पढ़ें

‘हनुमान अंश
HighLights
'हनुमान अंश' से पहले गूंजे जय श्रीराम, जय हनुमान के नारे।
फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित।
फेस्टिवल में पर्यावरण, कोरोना और मानवीय रिश्तों पर भी फिल्में।
जागरण संवाददाता, पटना। जागरण फिल्म फेस्टिवल के अंतिम दिन की शाम फिल्मों के साथ भक्ति और भावनाओं के नाम रही। फिल्म ‘हनुमान अंश’ की प्रस्तुति से पहले सभागार में जय श्रीराम और जय हनुमान की गूंज सुनाई देने लगी। फिल्म के एक संवाद के दौरान कलाकार ने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया तो दर्शक भी इसमें शामिल हो गए। देखते ही देखते पूरा माहौल भक्तिमय हो गया।
नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी है ‘हनुमान अंश’
लेखक एवं निर्देशक डा. विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ संत नीम करोली बाबा के जीवन, उनके शुरुआती संघर्ष और आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
फिल्म की कहानी स्वतंत्रता-पूर्व भारत की पृष्ठभूमि में बुनी गई है और लक्ष्मी नारायण शर्मा के बाल जीवन से शुरू होती है, जिन्हें आगे चलकर नीम करोली बाबा के नाम से जाना गया।
मां के निधन के बाद शुरू होती है आध्यात्मिक यात्रा
फिल्म में माता के आकस्मिक निधन के बाद बालक लक्ष्मी नारायण शर्मा के भीतर उठे सवालों और ईश्वर की खोज को केंद्र में रखा गया है।
वह घर छोड़कर उत्तरी भारत की ओर कठिन आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ता है। घने जंगलों, अनजान गांवों और विभिन्न आध्यात्मिक पड़ावों से गुजरते हुए उसकी यात्रा वैराग्य और आत्मअनुशासन की ओर बढ़ती है।
वैराग्य से मानव सेवा तक की कहानी
फिल्म संवेदनशीलता से दिखाती है कि कैसे बालक का वैराग्य आगे चलकर मानवता के प्रति प्रेम, करुणा और निःस्वार्थ सेवा में बदलता है।
यही यात्रा उसे आगे चलकर आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा के रूप में स्थापित करती है। वयस्क नीम करोली बाबा की भूमिका शोभिना सत्य ने निभाई है।
चित्रकूट और ब्रज में हुआ वास्तविक लोकेशन पर फिल्मांकन
फिल्म में चंदन आनंद, अनिल रस्तोगी और पूर्णिमा तिवारी ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। इसका फिल्मांकन चित्रकूट के पंजाबी बाबा आश्रम और ब्रज क्षेत्र जैसे वास्तविक स्थानों पर किया गया है।
बिना भारी-भरकम वीएफएक्स और तड़क-भड़क के फिल्म सहज कहानी, बुंदेली व ब्रज भाषा के पुट और भक्तिपूर्ण संगीत के जरिए दर्शकों से जुड़ती है।
‘लाइक फ्रेंड लाइक डीर’ ने उठाए इंसान और वन्यजीव के सवाल
ईरानी निर्देशक मालेक एघबाली की 14 मिनट की लघु फिल्म ‘लाइक फ्रेंड लाइक डीर’ ने मनुष्य और वन्यजीवों के रिश्ते पर सवाल खड़े किए।
3डी तकनीक और ब्लैक एंड व्हाइट शैली में बनी फिल्म एक वन्यजीव रेंजर की कहानी के माध्यम से नैतिक दुविधा, अपराधबोध, दोस्ती और कर्तव्य के बीच के द्वंद्व को सामने लाती है।
हिरण के सिर वाले पात्र ने खींचा ध्यान
फिल्म में हिरण के सिर वाले संदिग्ध पात्र के माध्यम से इंसान और जानवर के बीच मौजूद धुंधली सीमाओं को दिखाया गया है।
फिल्म यह सवाल उठाती है कि संकटग्रस्त पर्यावरण में रक्षक और शिकारी की भूमिकाएं किस तरह बदल सकती हैं। पर्यावरण और सामाजिक व्यवस्था पर इसका मूक विरोध दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।
‘बोध’ में दिखा कोरोना काल का अकेलापन
जागरण फिल्म फेस्टिवल का पर्दा भोजपुरी फिल्म ‘बोध’ के साथ गिरा। लेखक, निर्माता और निर्देशक प्रशांत रंजन की यह फिल्म कोरोना लाकडाउन के दौरान आम लोगों के जीवन में आए मानसिक और भावनात्मक बदलावों को सामने लाती है।
बिहार के मध्यमवर्गीय परिवारों के शहरी और ग्रामीण जीवन को कहानी में बारीकी से पिरोया गया है।
एक कमरे में बंद दो छात्रों की कहानी
‘बोध’ में साथ रहने वाले दो छात्रों की कहानी है, जो लाकडाउन के दौरान एक कमरे में बंद हो जाते हैं। परिवार से दूर रहकर रोजमर्रा की जिंदगी को सामान्य बनाए रखने की उनकी कोशिश और विपरीत परिस्थितियों में हास्य तलाशने की जद्दोजहद फिल्म को सहज और मानवीय बनाती है।
‘लिप्पीटिक’ में दो अलग दुनिया की दोस्ती
45 मिनट की फिल्म ‘लिप्पीटिक’ दो अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की लड़कियों की कहानी है। गरीब ग्रामीण परिवार की 10 वर्षीय छुटकी और लखनऊ के संपन्न परिवार की 23 वर्षीय अंशिका की मुलाकात गांव में होती है। दोनों की दोस्ती एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और कृतज्ञता समझने की यात्रा बन जाती है।
फिल्मों ने छोड़ी अलग-अलग विषयों पर छाप
फेस्टिवल की फिल्मों ने भक्ति और आध्यात्मिकता से लेकर पर्यावरण, कोरोना काल के अनुभव और मानवीय रिश्तों तक अलग-अलग विषयों को दर्शकों के सामने रखा।
समापन की शाम ‘हनुमान अंश’ की भक्ति से शुरू होकर विविध सामाजिक और मानवीय सरोकारों वाली फिल्मों के साथ यादगार बनी।
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