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तानों को झेला, अभावों से लड़ी; अब मेडल से चमक रही पटना की सुमन

Published: Mon, 02 Nov 2026 01:20 PM (IST)

मोकामा घाट की कबड्डी खिलाड़ी सुमन कुमारी ने सामाजिक चुनौतियों और आर्थिक तंगी का सामना करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर ...और पढ़ें

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मुन्ना शर्मा, मोकामा (पटना)।  सपने बड़े हों तो रास्ते की मुश्किलें भी इम्तिहान लेने लगती हैं। कभी समाज के ताने, कभी आर्थिक तंगी और कभी संसाधनों का अभाव।

मोकामा घाट की सुमन कुमारी ने इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए कबड्डी के मैदान में अपनी अलग पहचान बनाई है। जिस खेल को अपनाने के लिए उसे कभी रिश्तेदार, मोहल्ले के लोगों की उपेक्षा और कटाक्ष झेलने पड़े, उसी खेल में आज वह बिहार का गौरव बन चुकी हैं।

तीन राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुकीं सुमन की उपलब्धि के पीछे वर्षों का संघर्ष, माता-पिता का अटूट विश्वास और कोच की अथक साधना है।

मोकामाघाट के वार्ड संख्या-27 निवासी मिठाई दुकानदार अरुण कुमार और पूनम देवी के घर दो बेटों सूरज और सुमित के बाद सुमन का जन्म हुआ।

परिवार के लिए वह बेहद लाडली थीं। हालांकि, कबड्डी खेलने की उसकी इच्छा ने सामाजिक सोच की संकीर्णता से सामना कराया। बेटी के खेल मैदान में उतरने पर कुछ लोग कहते थे घर के काम में लड़कियों को मन लगाना चाहिए। खेल कूद से जीवन नहीं बनता है।

आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि खेल से जुड़ी हर जरूरत आसानी से पूरी हो सके। मिठाई की दुकान से होने वाली सीमित आमदनी में परिवार की जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं था।

इसके बावजूद पिता ने बेटी के हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। मां ने भी हर कदम पर उसका मनोबल बढ़ाया। लोगों की बातों को अनसुना कर माता-पिता ने सुमन को आगे बढ़ने की पूरी स्वतंत्रता दी।

कोच की परख और मेहनत ने संवारा हुनर

मैदान में कोच मोहम्मद इलियास ने उनकी प्रतिभा को शुरुआती दौर में ही पहचान लिया। करीब दो दशक के अनुभव वाले कोच ने अनुशासन और कठिन प्रशिक्षण से उनके खेल को निखारा।

सुमन ने भी हर चुनौती को अभ्यास के जरिए जवाब दिया। कोच के मार्गदर्शन में उनकी तकनीक, फुर्ती और खेल की समझ लगातार बेहतर होती गई।

सहेली की प्रेरणा से शुरू हुआ सफर

सुमन के जीवन में निर्णायक मोड़ बचपन की सहेली सानिया की सलाह से आया। पचमहला निवासी सानिया ने एक निजी स्कूल के प्रांगण में खेल के प्रति सुमन की रुचि देखी और उसे कबड्डी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

माता-पिता की सहमति मिलने के बाद सुमन ने अभ्यास शुरू किया। औंटा गांव स्थित शीला उच्च विद्यालय का मैदान उनका ठिकाना बन गया। प्रतिदिन करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर वह अभ्यास के लिए पहुंचती थीं।

दूरी और दूसरी परेशानियां उनके संकल्प को डिगा नहीं सकीं। नियमित अभ्यास के लिए समय निकालना और खेल के साथ दूसरी जिम्मेदारियों में संतुलन बनाना भी उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।

बेहतर खेल दिखाकर राष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान 

सुमन अब तक पांच राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं। वर्ष 2022 में 48वीं जूनियर राष्ट्रीय कबड्डी चैंपियनशिप में रजत पदक जीता। वर्ष 2023 में छठे आल इंडिया फेडरेशन कप और तमिलनाडु में आयोजित खेलो इंडिया गेम्स में कांस्य पदक हासिल किया।

हैदराबाद में आयोजित 49वीं राष्ट्रीय जूनियर कबड्डी चैंपियनशिप में भी उन्होंने दमदार प्रदर्शन किया। बिहार सरकार ने भी उनकी उपलब्धियों को सम्मान दिया है।

सुमन की सफलता उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जिनके सपनों के सामने सामाजिक रूढ़ियां और आर्थिक सीमाएं खड़ी हैं। उनकी उपलब्धि यह भी बताती है कि प्रतिभा को परिवार का संबल और सही मार्गदर्शन मिले तो अभाव सफलता की राह नहीं रोक सकते।

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