दीवाली की रात 3 लग्न, तीन तरह की पूजा; घर, दुकान या मध्य रात्रि... मां लक्ष्मी की कृपा पाने का कौन सा सबसे खास मुहूर्त?
दीपावली 2026 पर गृहस्थ, कारोबारी और साधकों के लिए लक्ष्मी पूजा के अलग-अलग मुहूर्त और विधान हैं। यह लेख स्थिर ...और पढ़ें

दीपावली पर पूजा काउद्देश्य परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना
HighLights
गृहस्थों के लिए शाम का स्थिर लग्न पूजा हेतु शुभ।
विशेष लक्ष्मी साधना हेतु मध्य रात्रि सिंह लग्न महत्वपूर्ण माना गया।
अष्टलक्ष्मी का अर्थ केवल धन नहीं, समृद्धि के आठ रूप।
डिजिटल डेस्क, पटना। दीपावली की रात हर घर में दीप जलेंगे, मां लक्ष्मी की आरती होगी और सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ही रात में गृहस्थ, कारोबारी और विशेष साधना करने वाले लोगों के लिए पूजा की अलग-अलग मान्यताएं हैं? किसी के लिए शाम का स्थिर लग्न महत्वपूर्ण है तो कोई मध्य रात्रि के सिंह लग्न में लक्ष्मी साधना करता है। इतना ही नहीं, घर और व्यापारिक प्रतिष्ठान में स्थापित होने वाले गणेश जी की सूंड की दिशा को लेकर भी अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।
इस बार 8 नवंबर 2026 को दीपावली मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्य पंडित डी के झा के अनुसार, इस दिन पूजा के अलग-अलग समय और विधानों का विशेष महत्व है। आइए समझते हैं कि दीपावली की रात किसके लिए कौन सा समय खास है और धन-संपत्ति से आगे अष्टलक्ष्मी का वास्तविक अर्थ क्या है।
एक दीवाली, पूजा के तीन अलग मकसद; जानिए किसके लिए क्या है खास
दीपावली पर पूजा का पहला उद्देश्य परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना है। इसके लिए गृहस्थ शाम के शुभ मुहूर्त में गणेश-लक्ष्मी पूजन करते हैं। दूसरा उद्देश्य व्यापार में उन्नति और आर्थिक संपन्नता की कामना है। कारोबारी भी अपने प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी-गणेश और कुबेर का पूजन करते हैं।
तीसरा पक्ष विशेष साधना का है। इसमें मध्य रात्रि के समय को महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान सिंह लग्न में लक्ष्मी साधना की जाती है। यही वजह है कि दीपावली की रात केवल एक पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अलग-अलग संकल्प और मान्यताओं के साथ मनाई जाती है।
शाम का मुहूर्त गृहस्थों के लिए क्यों माना जाता है खास?
पंडित डी के झा के अनुसार, 8 नवंबर को कुंभ लग्न दोपहर 1 बजे से 2:03 बजे तक रहेगा। वहीं राहुकाल दोपहर 3:50 बजे से शाम 5:13 बजे तक है। शाम में गणेश-लक्ष्मी पूजन के लिए वृषभ लग्न यानी स्थिर लग्न को विशेष महत्व दिया गया है।
उनके बताए अनुसार, शाम 5:38 बजे से 7:34 बजे तक पूजा का शुभ समय रहेगा। स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजन को गृहस्थों और व्यापारियों के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
राहुकाल के बाद मध्य रात्रि तक किस समय की जाती है साधना?
दीपावली की रात विशेष लक्ष्मी साधना करने वाले साधकों के लिए मध्य रात्रि का समय महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस बार सिंह लग्न रात 12:06 बजे से 2:19 बजे तक रहेगा। इस दौरान मां लक्ष्मी की विशेष आराधना की मान्यता है।
धार्मिक मान्यता है कि दीपावली की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हैं। इसी मान्यता के आधार पर साधक मध्य रात्रि में विशेष अनुष्ठान और मंत्र जाप करते हैं।
16 माला श्रीं मंत्र जाप से जुड़ी है विशेष मान्यता
पंडित के अनुसार, लक्ष्मी साधना के दौरान श्रीं बीज मंत्र की 16 माला जाप करने का विधान बताया गया है। इसके अलावा 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' मंत्र का जाप भी किया जाता है।
हालांकि, यह विशेष साधना की धार्मिक परंपरा है। सामान्य गृहस्थों के लिए श्रद्धापूर्वक गणेश-लक्ष्मी पूजन और आरती करना भी पर्याप्त माना जाता है।
घर और दुकान के गणेश जी की सूंड में क्यों होता है अंतर?
दीपावली पर गणेश जी की प्रतिमा खरीदते समय अधिकतर लोग उनके स्वरूप और सुंदरता पर ध्यान देते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में सूंड की दिशा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
पंडित डी के झा के अनुसार, घरों में बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी यानी वामावर्ती गणेश की स्थापना अधिक प्रचलित है। इन्हें गृहस्थ जीवन में सुख-शांति और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।
वहीं, व्यापारिक प्रतिष्ठानों में दाईं ओर मुड़ी सूंड वाले दक्षिणावर्ती गणेश की स्थापना की परंपरा भी प्रचलित है। इन्हें व्यापार में उन्नति और कार्यों में सिद्धि से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, दक्षिणावर्ती गणेश की पूजा में विशेष नियमों के पालन की मान्यता है।
विश्वामित्र का लक्ष्मी साधना से क्या है संबंध?
पंडित जी ने लक्ष्मी साधना का महत्व समझाने के लिए ऋषि विश्वामित्र से जुड़ा एक प्रसंग बताया। उनके अनुसार, आर्थिक कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों के बीच विश्वामित्र ने माता लक्ष्मी की साधना का संकल्प लिया था।
उन्होंने दृढ़ निश्चय के साथ साधना की और अष्टलक्ष्मी की आराधना की। इस प्रसंग के माध्यम से ज्योतिषाचार्य ने बताया कि लक्ष्मी साधना में समय, संकल्प और श्रद्धा का विशेष महत्व माना जाता है।
अष्टलक्ष्मी का रहस्य: क्या केवल पैसा ही धन है?
माता लक्ष्मी के आठ स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी कहा जाता है। इन आठ स्वरूपों के माध्यम से समृद्धि के अलग-अलग रूपों को समझाया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीवन में केवल धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि अन्न, संतान, साहस, ज्ञान और विजय भी समृद्धि के स्वरूप हैं।
अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप हैं:
- आदिलक्ष्मी: आध्यात्मिक समृद्धि और मूल शक्ति का प्रतीक।
- धनलक्ष्मी: धन और आर्थिक संपन्नता प्रदान करने वाली।
- धान्यलक्ष्मी: अन्न, खाद्यान्न और पोषण की देवी।
- गजलक्ष्मी: वैभव, ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा का प्रतीक।
- संतानलक्ष्मी: संतान सुख और परिवार की वृद्धि से जुड़ी।
- वीरलक्ष्मी: साहस, शक्ति और धैर्य का स्वरूप।
- विजयलक्ष्मी: संघर्षों में सफलता और विजय का प्रतीक।
- विद्यालक्ष्मी: ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाली।
दीपावली पर धन के साथ ज्ञान और साहस मांगने का भी है संदेश
अष्टलक्ष्मी की अवधारणा बताती है कि समृद्धि का अर्थ केवल तिजोरी भरना नहीं है। जिस घर में अन्न है, परिवार में सुख है, व्यक्ति में साहस है और जीवन में ज्ञान है, वहां भी लक्ष्मी के अलग-अलग स्वरूपों की उपस्थिति मानी जाती है।
पंडित राजन उपाध्याय के अनुसार, दीपावली का वास्तविक संदेश केवल धन प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन की नकारात्मकता और अज्ञान को दूर करना भी है।
दीप जलाने से आगे बढ़कर भीतर का अंधकार दूर करना ही दीपोत्सव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाए गए थे। वहीं समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्राकट्य की मान्यता भी दीपावली से जुड़ी है।
इसीलिए यह पर्व केवल बाहरी रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का अवसर भी माना जाता है। दीप जलाने के साथ मन के भीतर की नकारात्मकता, अज्ञान और बुराइयों को दूर करने का संकल्प लेना ही दीपोत्सव का व्यापक संदेश है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।