यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 09, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
देवघर के पंडों ने किया था महात्मा गांधी का हिंसक विरोध, पटना में आज भी हैं उस कार के अवशेष और ऐसी ढेरों स्मृतियां
Mahatma Gandhi Museum बापू की स्मृतियों से रचा-बसा है संग्रहालय का कोना-कोना यहां रखी है वह कार जिससे देवघर गए ...और पढ़ें

पटना, प्रभात रंजन। दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गांधी का रिश्ता पटना से खूब रहा है। बापू के जीवन और उनके आदर्शों से जुड़ी स्मृतियां गांधी मैदान स्थित गांधी संग्रहालय के कोने-कोने में स्थित है। गांधी दर्शन को समझने के लिए देश के चुनिंदा स्थलों में यह एक है। गांधी संग्रहालय की स्थापना में देशरत्न डा. राजेंद्र प्रसाद, प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
महात्मा गांधी की स्मृतियों को सहेज कर रखने वाला गांधी संग्रहालय शहर के प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में एक है। गांधी संग्रहालय के निर्माण के बारे में संग्रहालय के संयुक्त सचिव आसीफ वसी बताते हैं कि महात्मा गांधी के निधन के बाद तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं ने उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए देशरत्न डा. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गांधी स्मारक निधि का गठन किया गया।
31 मार्च, 1951 को केंद्रीय गांधी स्मारक निधि ने गांधी से जुड़े देश के विभिन्न स्थानों पर संग्रहालय बनाने की दिशा की ओर अग्रसर हुए। वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी का बिहार से लगाव और इनकी कर्मभूमि को देखते हुए नौ दिसंबर, 1955 को केंद्रीय समिति द्वारा तय किया गया कि बिहार में भी गांधीजी के नाम पर संग्रहालय की स्थापना की जाए।
संग्रहालय निर्माण को लेकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह की अध्यक्षता में 14 सदस्यों वाली बिहार गांधी स्मारक संग्रहालय समिति का गठन हुआ। केंद्रीय समिति के अध्यक्ष बलवंत राय मेहता की सहमति से पटना में संग्रहालय व पुस्तकालय बनाने पर मुहर लगी। नौ अप्रैल, 1962 को बिहार गांधी स्मारक संग्रहालय समिति की ओर से पटना में गांधी संग्रहालय की स्थापना करने के उद्देश्य से जमीन की तलाश होने लगी।
नौ नवंबर, 1967 को एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट से सटे पुराना मकान जो सरकारी बंगला था उसे सरकार ने संग्रहालय समिति को सौंप दी। गांधी जन्म शताब्दी वर्ष 1969 से संग्रहालय में कई आयोजन हुए। संग्रहालय से डा. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, विभूति मिश्र, कमलनाथ तिवारी, राम नवमी प्रसाद, हरिवंश सहाय, वैद्यनाथ प्रसाद, केदार पांडेय, डा. केक दत्त, दीप नारायण सिंह, सरयू प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, महामाया प्रसाद आदि का गहरा लगाव रहा।
गणमान्य लोगों के यहां पर पड़े चरण
संग्रहालय बनने के बाद आचार्य विनोबा भावे यहां महीनों तक ठहरे थे। 1969 में गांधी संग्रहालय से विदा होने के दौरान आचार्य विनोबा भावे ने इस जगह को गांधी के विचारों का पावर हाऊस बनाने पर बल दिया था। संग्रहालय में शेख अब्दुल्ला, खान अब्दुल गफ्फार खन, आचार्य कृपलानी, सुचेता कृपलानी, दादा धर्माधिकारी, डा. सुशील नय्यर, आरआर दिवाकर, मोराजी देसाई, यशवंत राव चौहान, रघुकुल तिलक, गोकुल भाई भट्ट, जगजीवन राम, सुभद्रा जोशी जैसे देश के प्रतिष्ठित हस्तियों के चरण पड़े।
एक कमरे से संग्रहालय का उद्घाटन
संग्रहालय को सरकारी भवन मिलने के बाद एक कमरे में चित्र कक्ष बनाई गई थी। कक्ष में महात्मा गांधी से जुड़े चित्र लगाए गए थे, जिसका उद्घाटन आचार्य बद्रीनाथ वर्मा ने 16 दिसंबर, 1967 को किया था। नौ नवंबर, 1992 को गांधी संग्रहालय ने अपना रजत जयंती वर्ष मनाई गई।
पद्मश्री उपेंद्र महारथी के मार्गदर्शन में बनी थी मूर्ति
देश के नामचीन शिल्पकारों में से एक पद्मश्री उपेंद्र महारथी के मार्ग दर्शन में गांधी संग्रहालय के प्रांगण में महात्मा गांधी की मूर्ति का निर्माण किया गया था। मूर्ति का अनावरण तत्कालीन राज्यपाल रामचंद्र भंडारे ने 10 जून, 1975 को किए थे। संग्रहालय परिसर में गांधी की प्रतिमा आज भी विद्यमान है। परिसर में उपेंद्र महारथी द्वारा बुद्ध, ईसा मसीह और महात्मा गांधी के अंत को पेंटिंग के जरिए दर्शाया गया है।
गांधी-टैगोर एक ही मंडप में मौजूद
गांधी-टैगोर के मधुर संबंध को दिखाते हुए गांधी-टैगोर मंडप का निर्माण कराया गया है। बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डा. आरएस गवई ने नौ दिसंबर, 2006 को गांधी टैगोर मंडप का उद्घाटन किया था। टैगोर और गांधी का बिहार से गहरा रिश्ता रहा है। 17 मार्च, 1936 को पटना विश्वविद्यालय के व्हीलर सीनेट हाउस में गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का नागरिक अभिनंदन किया गया था। 1940 में टैगोर व गांधी की आखिरी मुलाकात शांति निकेतन में हुई थी।
उस ऐतिहासिक मिलन को यादगार के तौर पर गांधी और टैगोर की प्रतिमाएं यहां लगाई गई है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। संग्रहालय परिसर में सत्याग्रह शताब्दी स्मृति भवन, एकादश व्रत पार्क, माइक्रोस्कोप से सूक्ष्म कीटाणुओं की गतिविधियों को देखते बापू, बापू की कुटिया, पंडित राजकुमार शुक्ल की प्रतिमा, शताब्दी स्मृति मंडप समेत कई आकर्षण के केंद्र हैं। जहां पर बापू से जुड़ी स्मृतियों को देख आनंदित हो सकते हैं।
आस्टीन गाड़ी पर बैठ महात्मा गांधी ने किया देवघर का दौरा
गांधी संग्रहालय परिसर में देवघर-बैद्यनाथ धाम मंडप बनाया गया है। मंडप में बभनागामा स्टेट के मालिक राय बहादुर जगदीश प्रसाद सिंह के काले रंग की बीओ- 484 आस्टीन गाड़ी से महात्मा गांधी जसीडीह से देवघर के 25 अप्रैल 1934 को रवाना हुए थे। छुआछूत निवारण, हरिजनों को मंदिरों में प्रवेश अभियान के क्रम में बापू देवघर पहुंचे थे। देवघर के पंडों ने उनका हिंसक विरोध किया था। जिस गाड़ी पर गांधी बैठ कर देवघर गए थे उसकी स्मृतियां संग्रहालय में मौजूद है। गाड़ी के अवशेष को 1963 में गांधी संग्रहालय में रखा गया था। 30 जनवरी, 2013 को त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद ने मंडप का उद्घाटन किया था।
म्यूजियम समेत नए भवन बनाने की योजना
गांधी संग्रहालय परिसर में आने वाले दिनों में बापू के विचारों से जोड़ म्यूजियम बनाने की योजना है। संग्रहालय के पीछे की जमीन पर म्यूजियम बनाई जाएगी। संग्रहालय परिसर में बड़ा सभागार व लाइब्रेरी को और समृद्ध बनाने पर विचार हो रहा है। सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। आर्ट गैलरी को और विकसित करने की योजना है।
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लाइब्रेरी में 10 हजार से अधिक पुस्तकें
गांधी संग्रहालय पुस्तकालय में महात्मा गांधी से संबंधित काफी पुस्तकें हैं। विभिन्न विषयों पर 10 हजार से अधिक पुस्तकें लाइब्रेरी में हैं। पुस्तकालय में 1970 से आज तक विभिन्न समाचार पत्रों के अलावे महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण, कार्ल माक्र्स, बद्री प्रसाद, भिखारी ठाकुर, पंडित राजकुमार शुक्ल, भारत के इतिहास, गांधी का बिहार आगमन के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ी पुस्तकें शोधार्थियों को आकर्षित करती हैं। गांधी संग्रहालय के संयुक्त सचिव आसीफ वसी कहते हैं कि आने वाले दिनों में गांधी संग्रहालय में कई बदलाव देखने को मिलेगा। म्यूजियम, लाइब्रेरी व सभागार को बेहतर बनाने की योजना है। सरकार के पास प्रस्ताव भेजा गया है। बापू के विचार यहां के कण-कण में हैं।
