आरक्षण पर चिराग-माझी की तकरार, याद आए कर्पूरी ठाकुर और नीतीश कुमार; बिहार में लागू कर चुके हैं कोटा के अंदर कोटा
Bihar Reservation Sub-Classification पर बिहार में NDA के भीतर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी आमने-सामने हैं। बिहार में आरक्षण ...और पढ़ें

बिहार आरक्षण पर बवाल। फोटो जागरण
HighLights
आरक्षण उप-वर्गीकरण पर चिराग-मांझी में राजनीतिक मतभेद।
कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में OBC आरक्षण का उप-वर्गीकरण किया।
बिहार में 75% आरक्षण पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक।
डिजिटल डेस्क, पटना। दिल्ली की सड़कों पर 'आरक्षण की समीक्षा' पर आंदोलन का सबसे ज्यादा असर मंडल की धरती बिहार में देखा जा रहा है। यहां सत्ताधीश NDA में ही दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं और दलित समुदाय के 2 केंद्रीय मंत्री आमने-सामने हैं।
एक ओर जहां हम प्रमुख जीतनराम माझी (Jitan Ram Manjhi) आरक्षण में उप-वर्गीकरण की मांग कर रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर लोजपा मुखिया चिराग पासवान इसके खिलाफ हैं।

आज भले ही इस मुद्दे पर बहस हो रही हो, लेकिन बिहार पहले ही आरक्षण का उप-वर्गीकरण हो चुका है। बिहार में आरक्षण के वर्गीकरण की शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने की थी।

इसके बाद लालू राज में यह खत्म कर दिया गया, लेकिन नीतीश कुमार ने फिर कर्पूरी ठाकुर के विचार को अपनाने की पहल की। हालांकि मौजूदा स्थिति में यह प्रभावी रूप से लागू नहीं है।
कर्पूरी ठाकुर का उप-वर्गीकरण प्लान
उत्तर भारत में OBC के लिए आरक्षण सबसे पहले साल 1978 में कर्पूरी ठाकुर ने किया था। उन्होंने मुंगेरीलाल कमीशन की रिपोर्ट लागू की, जिसमें 26 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। इसमें 20 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग और 3 प्रतिशत महिलाओं के अलावा 3 प्रतिशत आरक्षण गरीब सवर्णों के लिए था।
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OBC के आरक्षण को कर्पूरी सरकार ने 2 भागों में उप-वर्गीकृत किया था, जिसमें अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को 12 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग (OBC) को 8% प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। वहीं, SC/ST का 22.5% (15+7.5) आरक्षण पहले से लागू था।
लालू यादव ने अपनाया मंडल कमीशन
कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण लागू करने के बाद देशभर में OBC आरक्षण की मांग तेज हो गई, जिसके बाद बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में 1 जनवरी 1979 को केंद्र सरकार ने मंडल आयोग बनाया, जिसकी शिफारशें 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने लागू कर दी, जिनमें OBC के 27% आरक्षण देने की सिफारिश थी।
मंडल कमीशन आने के बाद बिहार में कर्पूरी मॉडल समाप्त हुआ और लालू यादव ने मंडल कमीशन की शिफारशें लागू कीं। इस तरह बिहार में OBC के लिए आरक्षण बिना बंटवारे के 27% लागू हुआ। SC/ST का 22.5% भी यथावत रहा।
नीतीश ने कर्पूरी मॉडल को फिर किया जिंदा
साल 2007 में बिहार के तात्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फिर से कर्पूरी मॉडल को लागू करने का प्रयास किया। इसके तहत OBC वर्ग को EBC और OBC में बांटा। वहीं, दलित समुदाय को दलित और महादलित (Mahadalit Reservation) में बांटा गया। इसके पीछे सरकार का विचार था कि जिन समुदायो तक आरक्षण नहीं पहुंचा, उन्हें मिल सके।
इसी के आधार पर SC की कुल 22 जातियों में सबसे ज्यादा पिछड़ी 18 जातियों को महादलित का दर्जा दिया गया। इसी वर्गीकरण के आधार पर योजनाओं का लाभ भी दिया गया, लेकिन 2020 में बाकी की 4 जातियों (पासवान/ दुसाध, चमार, धोबी, पासी) को भी महादलित में शामिल कर दिया गया। इस तरह बिहार म़ें अब सभी SC जातियां महादलित हैं।
नीतीश ने 75 प्रतिशत तक पहुंचाया आरक्षण
साल 2023 में बिहार की नीतीश सरकार ने जाति जनगणना कराई और इसके आंकड़ों के आधार पर कुल 75 प्रतिशत का आरक्षण लागू किया। इसमें अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को 25%, अनुसूचित जाति (SC) को 20%, पिछड़ा वर्ग (BC/OBC) को 18%, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% और अनुसूचित जनजाति (ST) को 2% को आरक्षण का प्रावधान किया गया।
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(आरक्षण की सभी कटेगरी में 35 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित है। इसके अलावा दिव्यांग और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी 2 प्रतिशत क्षैतिज कोटा है।)
कोर्ट की रोक बाद मौजूदा स्थिति
बिहार सरकार के आरक्षण बढ़ाने के फैसले पर पटना हाई कोर्ट ने असंवैधानिक बताते हुए रोक लगा दी। कोर्ट का कहना था कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50% की सीमा का उल्लंघन करता है।
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है, जहां मामला लंबित है। ऐसे में राज्य में पुराना आरक्षण ही लागू है, जो कि उप-वर्गीकृत है।
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पिछड़ा वर्ग को 30 प्रतिशत (अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) 18% और पिछड़ा वर्ग (BC) 12%), अनुसूचित जाति (SC) को 16%, अनुसूचित जनजाति (ST) को 1%, पिछड़े वर्ग की महिलाएं (WBC) को 3% और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण लागू है।
बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) और बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) जैसी संस्थाएं वर्तमान परीक्षाओं और नई भर्तियों के परिणाम पुरानी व्यवस्था (60% कुल आरक्षण) के नियमों के तहत ही निकाल रही हैं। राज्य सरकार कोर्ट में जल्द सुनवाई की कोशिश कर रही है, ताकि नई नियुक्तियों में बढ़े हुए कोटे का लाभ दिया जा सके।
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