बिहार में BJP की जल्दबाजी से NDA में बेचैनी, क्या तेजस्वी की भविष्यवाणी सच होने जा रही है?
भाजपा की विधान परिषद सदस्यों को पार्टी में शामिल करने की जल्दबाजी ने एनडीए में अविश्वास पैदा कर दिया है, जिससे जदयू में बेचैनी बढ़ गई है।

बिहार भाजपा की बैठक में शामिल राहुल राज और वंशीधर ब्रजवासी। फोटो सोशल मीडिया
HighLights
भाजपा की जल्दबाजी ने एनडीए में अविश्वास बढ़ाया।
निर्दलीय एमएलसी के शामिल होने पर दल-बदल विवाद।
जदयू में बेचैनी, तेजस्वी की भविष्यवाणी को बल।
अरुण अशेष, पटना। विधानमंडल के दोनों सदनों में बिना चुनाव लड़े सदस्य संख्या बढ़ाने की जल्दबाजी में भाजपा मुख्य विपक्षी दल राजद के इस आरोप को मजबूत करती जा रही है कि वह सहयोगी दलों को कमजोर करना चाहती है।
ताजा मामला शनिवार का है। विधान परिषद की स्नातक एवं शिक्षक क्षेत्र से जीते दो निर्दलीय सदस्य- वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज को आनन-फानन में भाजपा की सदस्यता दिला दी गई, लेकिन जब कानूनी पेच और मुख्य सहयोगी जदयू की नाराजगी की चिंता हुई तो कहा गया कि ये दोनों पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं। केवल भाजपा का समर्थन किया है।
दल-बदल कानून के तहत सदन के लिए निर्वाचित निर्दलीय सदस्य किसी दल की सदस्यता ग्रहण नहीं कर सकते। वे समर्थन कर सकते हैं। दल की सदस्यता ग्रहण करने की छूट राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से मनोनीत सदस्यों को है।
क्या है मामला?
सारण शिक्षक क्षेत्र से निर्वाचित राहुत राज मूल रूप से भाजपा के हैं। वे भाजपा की प्रदेश कार्य समिति के सदस्य थे, लेकिन जदयू के अधिकृत उम्मीदवार आनंद पुष्कर के विरुद्ध नामांकन दाखिल करने के कारण उन्हें दल से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया गया। 27 अक्टूबर को परिणाम आया और उसके चौथे दिन उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया गया।
तिरहुत स्नातक क्षेत्र से निर्दलीय निर्वाचित वंशीधर ब्रजवासी का किस्सा अलग है। वे दूसरी बार निर्दलीय जीते और शिक्षकों-युवाओं के कल्याण के नाम पर भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने जदयू के अभिषेक झा को पराजित किया।
जदयू नेताओं ने लगाया आरोप
दिलचस्प यह है कि तीन दिन पहले अभिषेक ने अपने फेसबुक पर लिखा था कि एनडीए नेताओं के चक्रव्यूह के कारण उनकी हार हुई। उनके पक्ष में आए 4700 मतों को रद कर दिया गया।
ब्रजवासी के भाजपा में शामिल होते ही जदयू की कतारों में यह बात फैल गई कि क्या अभिषेक का आरोप सही है? तिरहुत स्नातक क्षेत्र से चार बार चुनाव जीत चुके जदयू के सांसद देवेशचंद्र ठाकुर ने भी एनडीए के कई नेताओं पर अभिषेक का समर्थन न करने का आरोप लगाया।
ठाकुर के 2024 में लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद ही वहां उसी साल उप चुनाव हुआ था, उसमें भी जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा की हार हुई थी। तब भी निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी ही जीते थे।
इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म से हटा दावा
भाजपा में शामिल होने के तुरंत बाद ब्रजवासी ने इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट किया कि वे अपने मतदाताओं के हित के लिए भाजपा में शामिल हो गए हैं। लेकिन, जैसे ही इस पर विवाद हुआ, उन्होंने पहले वाले पोस्ट को हटा लिया।
दूसरा पोस्ट डाल दिया कि भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं। बल्कि भाजपा का समर्थन करने की घोषणा की है। उनकी पलटी पर इंटरनेट मीडिया के यूजर मजे ले रहे हैं। राहुल राज ने भी शामिल होने के बदले समर्थन देने की बात कही।
रालोमो पर पहला प्रयाेग
पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए के घटक राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार विधायक निर्वाचित हुए थे। चार में से तीन माधव आनंद, आलोक कुमार सिंह और रामेश्वर महतो अपने नेतृत्व के विरुद्ध बगावत का झंडा बुलंद कर भाजपा नेतृत्व के करीब चले गए थे।
इन तीनों ने मोर्चा के संस्थापक एवं राज्यसभा सदस्य उपेंद्र कुशवाहा को नेता मानने से इंकार कर दिया। महीनों तक बातचीत नहीं की। अप्रैल 2026 में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद इन विधायकों का विरोध और तीव्र हो गया।
बताया गया कि इनकी नाराजगी कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने को लेकर है। दीपक उस समय किसी सदन के सदस्य नहीं थे। भाजपा ने तत्काल इन विधायकों को दल में शामिल कराने से इंकार कर दिया।
बड़ी योजना यह बनाई कि क्यों नहीं रालोमो का ही भाजपा में विलय करा दिया जाए। बाद तीनों विधायक मोर्चा में लौट आए। रालोमो ने विधायक आलोक कुमार सिंह को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। आनंद माधव विधायक दल के नेता बने।
उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा और उनके पुत्र दीपक प्रकाश को विधान परिषद की सदस्यता के समय भी रालोमो को भाजपा में विलय का प्रस्ताव दिया गया था। उपेंद्र कुशवाहा ने इंकार कर दिया। दोनों को सदन की सदस्यता तो दे गई, लेकिन पूर्ण कार्यकाल छह साल के लिए सदन में नहीं भेजा गया।
क्यों दबाव में है नेतृत्व?
असल में बांकीपुर विधानसभा के उप चुनाव में हार के समय से ही भाजपा नेतृत्व दबाव में है। यह सीट यहां के विधायक नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के कारण रिक्त हुई थी।
उप चुनाव में जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को पराजित किया। भाजपा इस हार की कुंठा से उबर भी नहीं पाई थी कि दरभंगा शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से एनडीए उम्मीदवारों की हार हो गई।
वहां से पराजित हुए भाजपा उम्मीदवार 2020 में निर्दलीय जीते थे। इस चुनाव में भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था। शिक्षक क्षेत्र में यह सीट जदयू के कोटे में गई थी।
जदयू के उम्मीदवार डा. घनश्याम राय दूसरे-तीसरे नहीं, चौथे नम्बर पर चले गए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी का घर दरभंगा है। वे इसी क्षेत्र के विधायक भी हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद प्रदेश अध्यक्ष के गृह क्षेत्र में हुई भाजपा की हार ने संगठन के केंद्रीय और राज्य नेतृत्व को दबाव में ला दिया है।
क्या थी तेजस्वी की भविष्यवाणी?
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने पिछले साल विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद भविष्यवाणी की थी कि सौ दिनों के भीतर भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटा देगी।
वह धीरे-धीरे जदयू को निगल जाएगी। इन घटनाओं के बाद तेजस्वी भविष्यवाणी के लिए अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। दूसरी तरफ जदयू के भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही है।
पांच को जदयू की समीक्षा बैठक
जदयू ने परिषद चुनाव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता एवं विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने रविवार को कहा कि चुनाव में हार जीत की समीक्षा के लिए पांच नवंबर को पार्टी की बैठक होने वाली है। उसके बाद ही पार्टी कोई आधिकारिक टिप्पणी देगी।
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