बिहार में दलबदल कानून पर भारी सरकार की मर्जी? कहीं तुरंत गई कुर्सी तो कहीं ठंडे बस्ते में अर्जी; समझिए पूरा खेल
बिहार में दल बदल कानून का क्रियान्वयन सरकार की मर्जी पर निर्भर करता है, न कि कानून के प्रावधानों पर।

बिहार में दल बदल के मामले। (जागरण)
HighLights
बिहार में दल बदल कानून पर सरकार की मर्जी चलती है।
विधायकों-MLC पर कार्रवाई में राजनीतिक दबाव स्पष्ट दिखता है।
विधानसभा अध्यक्ष पर सत्ता पक्ष का दबाव रहता है।
अरुण अशेष, पटना। बिहार में दल बदल के मामले में कानून से अधिक सरकार की मर्जी चलती है। किसी सदस्य के विरुद्ध तुरंत कार्रवाई हो जाती है तो कभी शिकायती पत्र धरा रह जाता है।
बीते दो वर्षों के भीतर ही इसके कई उदाहरण हैं। इस अवधि में सात विधायकों और दो विधान परिषद सदस्यों के विरुद्ध दल बदल के अलावा अनुशासन तोड़ने के नाम पर क्रमश: विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति के पास कार्रवाई की मांग के साथ अर्जी लगाई गई। केवल विधान परिषद के दो सदस्यों पर कार्रवाई हुई।
राजद के विधान परिषद सदस्य प्रो. रामबली सिंह ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के विरुद्ध आपत्तिजनक और अमर्यादित टिप्प्णी की थी।
राजद के सचेतक डॉ. सुनील कुमार सिंह ने परिषद के तत्कालीन सभापति देवेश चंद्र ठाकुर को पत्र लिखा। फरवरी 2024 में प्रो. चंद्रवंशी की सदस्यता समाप्त कर दी गई। उस समय सरकार राजद की मदद से चल रही थी। राजद ने सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाया।
सरकार की संरचना बदली, रुख बदला
फरवरी के दूसरे सप्ताह में राज्य सरकार की संरचना बदली। नीतीश कुमार राजद से अलग हो गए। भाजपा और एनडीए के दूसरे घटक दलों के सहयोग से उनकी सरकार बनी। देखिए, क्या फर्क आया।
सुनील कुमार सिंह, जिनकी शिकायत पर प्रो. रामबली सिंह चंद्रवंशी की सदस्यता समाप्त की गई थी, पांच महीने बाद 26 जुलाई 2024 को उनकी भी परिषद की सदस्यता समाप्त कर दी गई।
आरोप लगा कि उन्होंने नीतीश कुमार की नकल उतारी। परिषद की आचार समिति ने इसे अमर्यादित आचरण माना। परिषद के निर्णय के विरुद्ध सुनील सिंह सुप्रीम कोर्ट गए।
पांच मार्च 2025 को उनकी सदस्यता बहाल कर दी गई। आश्चर्य यह है कि यही आरोप राजद के एक अन्य सदस्य कारी शोएब पर भी लगा था। आचार समिति ने उनकी सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा नहीं की।
इन विधायकों ने कार्यकाल पूरा किया
2024 में कई चरणों में राजद के पांच (चेतन आनंद, भरत बिंद, संगीता कुमारी, नीलम देवी एवं प्रह्लाद यादव)और कांग्रेस के दो (सिद्धार्थ सौरभ और मुरारी गौतम ) पाला बदल कर सत्तारूढ़ भाजपा और जदयू में शामिल हो गए।
दोनों दलों ने इन विधायकों की सदस्यता रद करने के लिए तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष नन्द किशोर यादव को पत्र लिखा। साल गुजरा। डेढ़ साल गुजरा। उस विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया। कार्रवाई नहीं हुई। प्रह्लाद यादव को भाजपा टिकट नहीं दे सकी। नीलम देवी के पति अनंत कुमार सिंह उनकी जगह विधायक बने।
अभी जदयू ने अनंत सिंह के विरुद्ध दल बदल कानून के तहत कार्रवाई की अनुशंसा की है। अनंत सिंह कह रहे हैं कि उन्होंने कभी पार्टी का विरोध नहीं किया। विधानसभा ने उनसे जवाब मांगा है।
सरकार का रहता है दबाव
बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने बताया कि इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपने देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी भी सदन के अध्यक्ष पर सदन नेता और सत्तारूढ़ दल के प्रति नरम कोना रखने की एक तरह की बाध्यता होती है।
इसलिए उनके निर्णय अगर दबाव से प्रभावित होते हैं तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिए।
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