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झींगा पालन यानी गांव में ही लाखों कमाने का मौका, मुजफ्फरपुर की हैचरी में उत्पादन शुरू

Published: Sun, 04 Oct 2026 02:22 PM (IST)

Low Investment Prawn Scampi Business: मुजफ्फरपुर के बंदरा में 'एस्केम्पी' प्रजाति के झींगा पालन से ग्रामीण युवा लाखों कमा सकते ...और पढ़ें

मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत बंदरा की एक हैचरी ने 'एस्केम्पी' प्रजाति की झींगा मछली का पालन शुरू किया है।

मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत बंदरा की एक हैचरी ने 'एस्केम्पी' प्रजाति की झींगा मछली का पालन शुरू किया है।

संवाद सहयोगी, बंदरा (मुजफ्फरपुर)।Prawn Farming High Profit Career: ग्रामीण इलाकों में खेती अब घाटे का सौदा नहीं रही। वैज्ञानिक शोध और तकनीक के साथ ने किसानों की स्थिति बदल दीहै। मछली पालन में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। खासकर झींगा पालन में। 

बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत बंदरा की एक हैचरी ने 'एस्केम्पी' प्रजाति की झींगा मछली का पालन शुरू किया है। इसके बारे में कहा जा रहा है चार माह में लाखों की कमाई।

एक अनुमानित आंकड़े की बात करें तो पहले वर्ष में फिक्सड कॉस्ट समेत सभी लागत निकलने के साथ ही यह बिजनेस पूरी तरह प्रॉफिटेबल हो जाता है। 

दो बार मालामाल

उसके अगले वर्ष से केवल वैरिएबल खर्च यानी जीरा, दाना व दवा आदि पर होने वाले खर्चे ही होंगे और 120 दिन या चार माह में लाखों की आमदनी। वर्ष में दो बार मालामाल होने का मौका। यह अनुमान एक एकड़ को आधार मानकर लगाया गया है। 

मतलुपुर में झींगा उत्पादन की शुरुआत ने इस इलाके के युवाओं के लिए भविष्य का एक नया द्वार खोल दिया है।कोरलाहाचौर की इस हेचरी में भुवनेश्वर से एस्केम्पी प्रजाति का जीरा मंगवाकर मीठे पानी में पालन किया जा रहा है। 

लाखों में आय 

यदि किसी कारणवश आपको गांव में ही रहना पड़ रहा है तो दिल छोटा करने की कतई जरूरत नहीं है।एग्री बिजनेस का एक ऐसा मॉडल आपके लिए है जिससे लाखों में आय प्राप्त कर सकते हैं। वह भी वर्ष में दो बार। 

जी हां, यहां हम झींगा पालन की बात कर रहे हैं। बिहार के घरों व होटलों में जिस अनुपात में झींगा की मांग है उसके अनुपात में उत्पादन बहुत कम है। अभी इसके लिए दूसरे राज्यों पर हमलोगों को निर्भर रहना पड़ रहा है। इसकी मांग इतनी अधिक है कि आसानी से 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम बिक जा रही है। 

सरकार का भी साथ 

सोने पर सुहागा वाली बात बताता हूं। ऐसा नहीं है कि आप एग्री बिजनेस में उतर गए और आपको कोई सपोर्ट ही नहीं मिल रहा है। पहले तो बिहार सरकार के मत्स्य विभाग से हर तरह की तकनीकी जानकारी व प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। 

इसके साथ ही साथ शुरू में जब फिक्सड कॉस्ट यानी तालाब खोदने आदि के लिए जो खर्च आते हैं उस पर बिहार व केंद्र की सरकार सब्सिडी भी दे रही है।

इस पर यदि गौर करें तो सामान्य वर्ग को 40 प्रतिशत और महिला या एससी एसटी को 60 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। 

मतलब यह कि यदि आप अपनी पत्नी के नाम से कारोबार शुरू करते हैं तो सरलता से 60 प्रतिशत तक अनुदान हासिल किया जा सकता है।

बिहार सरकार के मत्स्य विभाग और 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' (PMMSY) की ओर से दिए जा रहे इन अनुदान को शामिल कर लें तो आप पहले वर्ष से ही 2.5 से 3 लाख प्रति वर्ष उपार्जित करने में सफल हो जाएंगे। 

एग्रीबिजने का लागत 

यदि पूर्व में आपने कभी इस तरह का काम नहीं भी किया और जीरो यानी शून्य से शुरू कर रहे हैं तो एक एकड़ में काम शुरू करना एक बेहतर आइडिया हो सकता है। इसमें तालाब निर्माण और उपकरणों पर शुरू में 1.5 से 2.5 लाख तक का खर्च आएगा। यह फिक्सड कॉस्ट है। 

इसके बाद बीज, दवा, दाना और लेबर पर प्रति चक्र दो से 3 लाख रुपये की लागत आएगी। यह महज 120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है। एक सीजन में १५०० से २००० किग्रा उत्पादन होता है। बाजार भाव पर इसको बेचकर 5 से 6 लाख रुपये प्राप्त हो सकते हैं। 

मुनाफा ही मुनाफा 

पहले वर्ष में अपने पॉकेट से लगाना होता है। हालांकि जैसा ऊपर चर्चा कर चुका हूं कि सरकार की ओर से इसको लिए सब्सिडी दी जा रही है।

इस तरह से देखा जाए तो सब्सिडी का लाभ लेने के बाद से पहले वर्ष से ही यह बिजनेस लाभकारी हो जाता है। 2.5 से 3.5 लाख रुपये लाभ अपने नाम कर सकते हैं। 

झींगा पालन में सबसे बड़ी बात पानी का सही से प्रबंधन और ऑक्सीजन लेवल को मेनटेन करना है। विशेषज्ञों का दावा है कि यदि कोई इन बातों का ख्याल कर लेता है तो यह बिजनेस ऐसा है जो एक साल में आर्थिक स्थिति बदलने की क्षमता रखता है। 

शुरू करने से पहले प्रशिक्षण

किसी काम को शुरू करने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी होना जरूरी है।झींगा मछली पालन के लिए भी यही बात सही है। मत्स्य हैचरी के संचालक शिवराज सिंह का कहना है कि किसान और युवा इसका प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद बहुत कम लागत में इस व्यवसाय को शुरू कर सकते हैं।

बंदरा में इसका सफल उत्पादन होने के बाद यहां से पूरे राज्य में जीरा व मछली की आपूर्ति की जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि आप भी परंपरा से थोड़ा हटकर कुछ हासिल करना चाह रहे हैं तो इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता है। 

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मत्स्य पालकों को सरकार और विभाग दोनों स्तर से सहयोग किया जा रहा है। विभाग के स्तर से समय समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विशेष प्रशिक्षण के लिए बाहर भी भेजा जाता है।

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रणधीर कुमार, जिला मत्स्य पदाधिकारी, मुजफ्फरपुर