मुंगेर में 99 लाख के बहुउद्देशीय भवन की पुरानी ईंटों से बनी दीवार, निर्माण की पारदर्शिता पर उठे सवाल
मुंगेर के धरहरा में 99 लाख के बहुउद्देशीय भवन निर्माण में पुरानी ईंटों के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं। अधिकारियों के परियोजना की पारदर्शिता पर संदेह।

बहुउद्देशीय भवन में पुरानी ईंटों का नया खेल. जागरण
HighLights
धरहरा में 99 लाख के भवन निर्माण पर विवाद।
पुरानी ईंटों के इस्तेमाल पर पारदर्शिता की कमी।
अधिकारियों के विरोधाभासी बयानों से संदेह गहराया।
संवाद सहयोगी, धरहरा (मुंगेर)। बिहार के मुंगेर जिले के धरहरा प्रखंड में पंचायती राज विभाग की ओर से 99 लाख रुपये की लागत से बनाए जा रहे बहुउद्देशीय भवन के निर्माण कार्य में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जिला परिषद मुंगेर के जिला अभियंता की देखरेख में कार्यकारी एजेंसी के जरिए संवेदक 'आशा कंस्ट्रक्शन' द्वारा इस प्रोजेक्ट को पूरा किया जा रहा है। गत 14 सितंबर 2025 को इस भवन का शिलान्यास किया गया था और कुछ माह पूर्व निर्माण कार्य शुरू हुआ था।
मुख्य भवन का निर्माण पूरा होने के बाद अब चहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का निर्माण चल रहा है, जो फिलहाल महज तीन से चार फीट ही बन पाई है। इस बीच, निर्माण कार्य में पुराने भवन को ध्वस्त करने से निकली पुरानी ईंटों के इस्तेमाल का मामला तूल पकड़ने लगा है। अधिकारियों के अलग-अलग बयानों के कारण पूरे निर्माण कार्य की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लग गया है।
प्राक्कलन में पुरानी ईंटों का दावा, पर संख्या पर चुप्पी
इस पूरे मामले पर जिला परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी सह डीडीसी अजीत कुमार सिंह का स्पष्ट कहना है कि निर्माण कार्य हर हाल में प्राक्कलन (Estimates) के अनुरूप ही होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, सहायक अभियंता जयकांत व कनीय अभियंता सैफुल हक का तर्क है कि निर्माण कार्य के प्राक्कलन में कुल 2.8 लाख ईंटों के इस्तेमाल का प्रावधान है, जिसमें 25 प्रतिशत यानी लगभग 52 हजार पुरानी ईंटों का इस्तेमाल किया जाना तय किया गया है।

लेकिन, इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या पुराने भवन के ध्वस्तीकरण से वास्तव में 52 हजार ईंटें प्राप्त हुई थीं? इसके अलावा, कुल ईंटों में से 1.56 लाख नई ईंटों और पुरानी ईंटों के वास्तविक आंकड़े का हिसाब देने से अधिकारी बचते नजर आ रहे हैं।
किस आधार पर हुआ सत्यापन, फाइलों में दबेगा मामला?
क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब पुरानी ईंटों की वास्तविक संख्या का कोई आधिकारिक और सार्वजनिक ब्योरा नहीं है, तो निर्माण स्थल पर इनका सत्यापन किस आधार पर किया गया है।
क्या प्रशासनिक स्तर पर इसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी, जिससे निर्माण कार्य की असलियत सामने आ सके? फिलहाल, अधिकारियों के विरोधाभासी बयानों ने इस 99 लाख की योजना को संदेह के घेरे में ला दिया है। स्थानीय ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि मामले की पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो पुरानी ईंटों के इस्तेमाल का यह पूरा मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।
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