‘घरों में पानी, सड़क पर गृहस्थी’, मुंगेर में बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द; थर्माकोल की नाव बनी सहारा
मुंगेर में बाढ़ के कारण घरों में पानी भरने से लोग सड़क किनारे जीवन बिताने को मजबूर हैं, जहां थर्माकोल की नावें उनका सहारा बनी हैं।

मुंगेर में बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द
HighLights
घरों में पानी भरने से लोग सड़क किनारे रहने को मजबूर।
थर्माकोल के डिब्बों से बनी नावें लोगों का सहारा बनीं।
भोजन, शौचालय की कमी; स्थायी समाधान की मांग।
कामेश, मुंगेर। सुबह के 11 बजे हैं। मुंगेर-पटना रोड पर गाड़ियां फर्राटा भर रही हैं। इसी सड़क के किनारे कुछ परिवार अपनी पूरी गृहस्थी समेटकर बैठे हैं। किसी के पास बक्सा है, किसी के पास अनाज की बोरी तो किसी ने बच्चों को प्लास्टिक की चादर के नीचे बैठा रखा है।
सड़क के दूसरी ओर नजर जाती है तो घर दिखाई देते हैं, लेकिन घरों के भीतर जिंदगी नहीं, पानी है। यह मुंगेर नगर निगम की सीमा से सटे वार्ड संख्या 40 और 41 के भूदान टोला और बलवा घाट-मुसहरी टोला की तस्वीर है। छह-सात दिनों से घरों में पानी है। पक्के मकानों के लोग छतों पर हैं और फूस-खपरैल के घरों वाले सड़क को ही अपना आशियाना बना चुके हैं।
किसी को भोजन की चिंता है तो किसी को रात गुजारने की। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं की है, जिनके लिए खुले में शौच की मजबूरी शर्म और संकट दोनों बन गई है। बुधवार को सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक जागरण की टीम ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में लाइव पड़ताल की। तीन घंटे में सामने आई तस्वीर सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि पानी के बीच जिंदगी बचाने की जद्दोजहद की है।
सड़क किनारे बिखरी गृहस्थी
11 बजे भूदान टोला में पहुंचते ही चारों तरफ पानी नजर आया। घरों में पानी प्रवेश कर चुका था। जिन घरों में कभी चूल्हा जलता था, वहां अब पानी भरा है। लोग अपना सामान निकालकर पटना रोड के किनारे आ गए हैं। सड़क किनारे बैठे देवेंद्र सिंह, जमुना महतो, मुनीलाल महतो, ललन सिंह और विनोद महतो ने बताया कि सात दिनों से सड़क पर रात-दिन कट रहा है।
बात करते-करते उनकी नजर सड़क से गुजरते वाहनों पर चली जाती है। हर वाहन के साथ सड़क किनारे बैठे परिवार कुछ कदम पीछे हटते हैं। बाढ़ ने घर छीना तो सड़क ने भी सुरक्षा नहीं दी। लोगों ने बताया कि कल से भोजन मिलना शुरू हुआ है। मगर खाना लेने के लिए दूर स्कूल तक जाना पड़ता है। बच्चों और बुजुर्गों के साथ पानी और कीचड़ पार कर भोजन लाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
12:10 बजे : पानी और थर्माकोल नाव
भूदान टोला से करीब एक घंटे बाद टीम वार्ड संख्या 41 के बलवा घाट-मुसहरी टोला पहुंची। यहां बाढ़ का पानी और गहरा नजर आया। घर पानी से घिरे हैं। रास्ते डूब चुके हैं। लोगों ने आने-जाने का अपना इंतजाम खुद कर लिया है। थर्माकोल के डिब्बों को जोड़कर बनाई गई नाव अब उनका सहारा है।

जिस थर्माकोल को कभी पैकिंग का सामान समझकर फेंक दिया जाता था, वही यहां जिंदगी और घर के बीच पुल बन गया है। लोग इसी के सहारे जरूरी सामान लेकर घर से बाहर निकल रहे हैं। कई परिवार अभी भी घर की छतों पर टिके हुए हैं। छत के नीचे पानी और ऊपर आसमान बाढ़ ने इनके घर को इसी दो हिस्सों में बांट दिया है।
एक बजे : शिविर में खाना नहीं, इंतजार
दोपहर करीब 12:30 बजे टीम चूहाबाग मोड़ पहुंची। एक विद्यालय के बाहर बाढ़ सहायता शिविर का बोर्ड लगा था। अंदर कुछ महिलाएं बैठी थीं। सुलचना देवी, सूत्री देवी और रानी देवी की नजर बार-बार सड़क की तरफ जा रही थी। उन्हें भोजन का इंतजार था। महिलाओं ने बताया कि पिछले दिन से यहां खाना मिल रहा है।
भोजन दूसरे स्कूल में बनता है और फिर यहां पहुंचाया जाता है। लेकिन दोपहर का एक बजने को था और खाना अब तक नहीं पहुंचा था।भूख का इंतजार करते चेहरों पर चिंता साफ थी। रहने का भी कोई ठिकाना नहीं है। कोई मंदिर में शरण लिए है तो कोई बगीचे में पन्नी डालकर रह रहा है। शौचालय की समस्या यहां भी थी। राहत शिविर में तैनात कर्मियों के बारे में पूछा गया तो मौके पर कोई कर्मी मौजूद नहीं मिला।
1:15 बजे : लाल दरवाजा में भी पानी का पहरा
इसके बाद टीम वार्ड संख्या दो और तीन के लाल दरवाजा पहुंची। यहां भी जलभराव ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा रखी थीं। कुछ लोग जिला स्कूल से भोजन लाकर खा रहे थे। ऋषि यादव, छोटन यादव और दिनेश यादव ने कहा कि हर साल बाढ़ आती है और हर साल यही कहानी दोहराई जाती है।
लोगों की मांग है कि ऐसी स्थायी व्यवस्था हो, जिससे हर साल घरों में पानी घुसने पर परिवारों को अपना घर छोड़कर भटकना न पड़े। कई लोगों ने पत्नी और बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए मायके भेज दिया है।
पानी उतरने का इंतजार, जिंदगी ठहरी
दोपहर दो बजे जब जागरण की टीम वापस लौट रही थी, तब भी हालात जस के तस थे। सड़क किनारे सामान के बीच परिवार बैठे थे। बच्चे वहीं खेल रहे थे। महिलाएं पानी और शौचालय की चिंता में थीं। बुजुर्ग घर की तरफ देख रहे थे। पक्के मकान वालों के सिर पर छत है, लेकिन घर में पानी है।
फूस-खपरैल वालों के पास न घर बचा, न सुरक्षित ठिकाना। बाढ़ ने इन परिवारों से सिर्फ घर नहीं छीना है। उसने बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोटी, महिलाओं की निजता और सामान्य जिंदगी भी छीन ली है।
निगम की सुने
उप नगर आयुक्त मु. नसीमुद्दीन ने बताया कि नगर निगम क्षेत्र में बाढ़ पीड़ितों की सुविधा के लिए दो चलंत शौचालय लगाए गए हैं। अन्य प्रभावित स्थानों पर शौचालय की व्यवस्था के लिए पीएचईडी विभाग को पत्र भेजा गया है। बुधवार को फिर स्मरण पत्र भेजकर जल्द शौचालय उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है। बाढ़ की इस विभीषिका में नगर निगम प्रशासन पूरी तरह बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़ा है। राहत और सुविधाओं को लेकर हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं।
