'घर में होते तो समय पर जलता चूल्हा', मुंगेर में बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द; भूख और बीमारी के बीच कट रही जिंदगी
मुंगेर में बाढ़ की भयावह स्थिति और पीड़ितों के दर्द को दर्शाया गया है, जहां सामुदायिक रसोई में भोजन की देरी और बच्चों की मुश्किलें सामने आईं।

मुंगेर में बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द
शशिकांत, धरहरा (मुंगेर)। सुबह के 11 बज रहे हैं। धरहरा से मानगढ़-सिंघिया की ओर बढ़ते ही बाढ़ की भयावह तस्वीर सामने आने लगती है। सड़क के दोनों ओर खेत नजर नहीं आते, दूर-दूर तक सिर्फ पानी का फैलाव दिखाई देता है। निचले इलाके पूरी तरह जलमग्न हैं। कहीं खेत की मेड़ पानी में समा गई है तो कहीं सड़क के किनारे तक बाढ़ का पानी पहुंच गया है।
सड़क पर आवाजाही जारी है, लेकिन सड़क से कुछ कदम आगे बढ़ते ही पानी की गहराई और बाढ़ की मार साफ महसूस होती है। ऐसा लगता है मानो पानी ने खेत-खलिहान ही नहीं, ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी को भी अपने आगोश में ले लिया है। बाढ़ के बीच सड़क ही लोगों के लिए बचा हुआ सहारा है। हर तरफ पानी और पानी के बीच जिंदगी बचाने की जद्दोजहद नजर आती है।
11:30 बजे शिवकुंड में भोजना का इंतजार
मध्य विद्यालय शिवकुंड में सामुदायिक किचन चल रहा है। कुछ महिलाएं भोजन के इंतजार में बैठी हैं। चेहरों पर थकान है। तेतरी देवी, सुधा देवी, अंबिका कुमारी, कोमल देवी और सरोजिनी देवी से बात होती है। कैमरा देखते ही चुप हो जाती हैं। शायद सरकारी व्यवस्था के सामने अपनी बात कहने में संकोच है। लेकिन कैमरा हटते ही मन की बात निकल आती है।

कहती है सुबह नौ-दस बजे तक खाना मिल जाना चाहिए था, आज करीब ढाई बजे मिला। एक रात का फासला नहीं, बस एक भोजन का इंतजार। रात करीब नौ बजे खाना खाने के बाद अगला भोजन दोपहर में। घर में होतीं तो सुबह चूल्हा जलता। बच्चों के लिए खाना बनता। लेकिन घर में पानी है। चूल्हा कहां जले।
बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं डुबोया, घर का चूल्हा भी बुझा दिया
महिलाओं की बातों में गुस्सा कम है। बेबसी ज्यादा है। जैसे पूछ रही हों शिकायत करें भी तो किससे। कम से कम खाना मिल रहा है। भोजन की गुणवत्ता के बारे में लोग कहते हैं ठीक-ठाक है। लगभग 12 बजे शिवकुंड से आगे बढ़ते हैं। बड़ी लगमा गांव के पास दो बच्चियां मिलती हैं।

उच्च विद्यालय सुंदरपुर की छात्राएं सोनम कुमारी और मौसम कुमारी। स्कूल बैग कंधे पर है। घर लौटने की जल्दी है। सड़क के आसपास बाढ़ का पानी फैला है। एक तरफ बाढ़ का खतरा है, दूसरी तरफ पढ़ाई छूटने का डर। बच्चियां पानी के बीच से घर की ओर बढ़ जाती हैं। बाढ़ आई, लेकिन बच्चों के कदम स्कूल तक पहुंचने से नहीं रुके।
12:30 बजे लगमा में उम्मीद की किरण
यहां 11वीं कक्षा का छात्र दिलखुश कुमार दिखाई देता है। उसने 12 फीट लंबी टीन की चादर, लकड़ी के दो टुकड़े और पुराने टायर जोड़कर एक जुगाड़ की नाव बनाई है। करीब 2500 रुपये खर्च किए। तरीका यूट्यूब से सीखा। अब यही नाव बाढ़ में फंसे लोगों को गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचा रही है।
दिलखुश कहता है सरकारी नाव समय पर नहीं आती थी। लोग परेशान थे, इसलिए सोचा कि खुद ही कुछ किया जाए। उम्र पढ़ने की है। हाथ में किताब होनी चाहिए। लेकिन बाढ़ ने हाथ में नाव का सहारा थमा दिया है।

इसी नाव पर फुलकुमारी देवी अपने बेटे विवेक कुमार के साथ मिलती हैं। उन्हें मायके खगड़िया जाना है। करीब एक घंटे सरकारी नाव का इंतजार किया। नाव नहीं आई। फिर दिलखुश को फोन किया। कुछ देर बाद दिलखुश अपनी नाव लेकर पहुंच गया।फुलकुमारी और उनके बेटे को गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
हेमजापुर में भूख और बीमारी दोनों से लड़ाई
लगभग दो बजे मध्य विद्यालय हेमजापुर पहुंचते हैं। यहां सामुदायिक किचन में बाढ़ प्रभावित लोग खाना खा रहे हैं। पास ही मेडिकल टीम बैठी है। लोगों की जांच हो रही है। जरूरत के अनुसार दवाएं दी जा रही हैं। लेकिन लोगों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। शौचालय की समस्या है। साफ-सफाई की परेशानी है।
चारों तरफ पानी के कारण महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें भी मुश्किल बन गई हैं। तीन घंटे में बाढ़ की तस्वीर बदलती रही, लेकिन दर्द एक ही रहा। कहीं खेत डूबे हैं। कहीं घरों के चूल्हे बुझ गए हैं। कहीं महिलाएं भोजन का इंतजार कर रही हैं। कहीं बच्चे पानी के बीच स्कूल से लौट रहे हैं।और कहीं एक 11वीं का छात्र अपनी जुगाड़ की नाव लेकर खड़ा है।
