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150 साल से कायम आस्था का अनोखा दरबार, संतान की मन्नत लेकर नेपाल व बिहार के कोने-कोने से पहुंचती हैं महिलाएं

Published: Mon, 19 Oct 2026 06:54 PM (IST)

मधुबनी के सतघरा विषहरा स्थान पर 150 वर्षों से चली आ रही 'गुहार' परंपरा नवरात्र में विशेष आकर्षण का केंद्र ...और पढ़ें

सिर पर धधकते धुपदानी रख आवाहन करते भगत । जागरण

 सिर पर धधकते धुपदानी रख आवाहन करते भगत । जागरण

संवाद सहयोगी, बाबूबरही (मधुबनी)। धधकती धूपदानी, गूंजते भजन और मन्नतों के साथ जुड़ी अटूट आस्था। मधुबनी के सतघरा विषहरा स्थान पर नवरात्र के दौरान कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिलता है। यहां 150 वर्षों से चली आ रही गुहार की परंपरा आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

संतान प्राप्ति की कामना हो या जीवन के कष्टों से मुक्ति की आस, श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं। बिहार के विभिन्न जिलों के साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी महिलाएं यहां आती हैं। इस स्थान की एक और खासियत है कि यहां धार्मिक आस्था के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा भी दिखाई देती है।

150 साल पुरानी है गुहार की परंपरा

बाबूबरही प्रखंड के सतघरा विषहरा स्थान में वर्षों से भगतों द्वारा गुहार लगाने की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यहां देवी-देवताओं के आह्वान से प्राप्त शक्ति के प्रतीक स्वरूप फूल, अक्षत और विभूति देकर श्रद्धालुओं की गुहार लगाई जाती है। नवरात्र के दौरान इस परंपरा को देखने और अपनी मन्नत लेकर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

भजन के बीच धधकती धूपदानी लेकर नाचते हैं भगत

नवरात्र में प्रतिदिन संध्या के समय मंदिर परिसर में स्थापित देवी-देवताओं की गाथा पर आधारित भजन गाए जाते हैं। भजनिया मंडली की प्रस्तुति के बीच भगत पारंपरिक अनुष्ठान करते हैं। मान्यता है कि भजनों के दौरान भगत के शरीर में देवी-देवताओं का आगमन होता है। इसके बाद वे बड़ी धूपदानी में धधकता सुगंधित धूप सिर पर लेकर नाचते-झूमते हैं और श्रद्धालुओं की मन्नतों व कष्टों की गुहार लगाते हैं।

संतान प्राप्ति की मन्नत लेकर पहुंचती हैं महिलाएं

इस स्थान पर संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाली महिलाओं की भीड़ विशेष रूप से देखी जाती है। मधुबनी के अलावा बिहार के दूसरे जिलों और नेपाल से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के बीच मान्यता है कि यहां मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। पहले जहरीले जंगली जानवरों के काटने के बाद भी लोग यहां आते थे और स्वस्थ होकर लौटने की बात कही जाती रही है। हालांकि, ये स्थानीय मान्यताएं हैं।

85 वर्षीय राजेंद्र झा संभाल रहे परंपरा

इस परंपरा को आगे बढ़ाने में 85 वर्षीय राजेंद्र झा की अहम भूमिका है। वे पिछले करीब 40 वर्षों से भगत की भूमिका निभा रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता स्वर्गीय बहादुर झा इस परंपरा का निर्वहन करते थे। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है।

एक ही परिसर में दिखती है हिंदू-मुस्लिम एकता

सतघरा विषहरा स्थान की विशेषता केवल इसकी पुरानी परंपरा तक सीमित नहीं है। मंदिर परिसर में ज्वालामुखी, भैरव, लखराज, विषहरा और ब्रह्म समेत विभिन्न देवी-देवताओं की स्थापना है। वहीं, मुस्लिम समुदाय के आराध्य बाला जी की पीड़ी भी यहां स्थित है। मन्नत पूरी होने पर दोनों समुदायों के लोग अपनी आस्था के अनुसार चादर और चढ़ावा चढ़ाते हैं।

सद्भाव का अनूठा उदाहरण है सतघरा विषहरा स्थान

पुरातत्वविद एवं ग्रामीण डा. शिव कुमार मिश्र के अनुसार, यह स्थल हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का अद्भुत उदाहरण है। यहां लंबे समय से चली आ रही परंपरा और दोनों समुदायों की भागीदारी सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है। नवरात्र के दौरान जुटने वाले श्रद्धालुओं के बीच यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ आपसी सद्भाव की पहचान भी बना हुआ है।

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