मधेपुरा में मां काली का चमत्कारी धाम, कोसी की धारा मोड़ने की है मान्यता, काली पूजा पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
मधेपुरा के बिहारीगंज स्थित मधुकरचक काली मंदिर की महिमा अलौकिक है, जहाँ सच्चे मन से मांगी हर मन्नत पूरी होती ...और पढ़ें
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मां कालिका की प्रतिमा.जागरण
HighLights
मधुकरचक काली मंदिर मधेपुरा में स्थित एक चमत्कारी धाम।
मान्यता है कि मंदिर ने कोसी नदी की धारा मोड़ी थी।
काली पूजा पर हजारों छागरों की बलि दी जाती है यहाँ।
शैलेंद्र कुमार, बिहारीगंज (मधेपुरा)। सनातन संस्कृति में मां काली को शक्ति, साहस और बुराई का विनाश करने वाली देवी माना गया है। मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड अंतर्गत मधुकरचक पंचायत में स्थित बड़ी मां काली मंदिर की महिमा अत्यंत अलौकिक और अपरंपार है।
ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दरबार में जो भी श्रद्धालु सच्चे और स्वच्छ मन से पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। यहाँ सालभर पूजा का दौर चलता है, लेकिन काली पूजा के अवसर पर पाठा (छागर) की बलि देने की विशेष परंपरा है, जिसके कारण हर साल यहां तीन दिवसीय भव्य मेला लगता है।
इतिहास और कोसी की धारा मुड़ने की पौराणिक मान्यता
बुजुर्गों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वर्षों पूर्व कोसी नदी की मुख्य धारा इसी इलाके से होकर गुजरती थी, जिसके कारण बाढ़ आने से मधुकरचक गांव बसने के बाद बार-बार उजड़ जाता था। उस दौर में स्व. राजीव लोचन झा के पूर्वजों को माता कालिका की प्रतिमा स्थापित करने का स्वप्न दिखाई दिया था।
जब इसकी चर्चा समाज में फैली, तब जनसहयोग से मां काली की प्रतिमा को एक कच्चे घर में स्थापित किया गया। वहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद चमत्कारिक रूप से कोसी की विकराल धारा दूसरी ओर मुड़ गई। इसके बाद से हर साल काली पूजा पर मां की आराधना शुरू हो गई। धीरे-धीरे लोग यहां बसते चले गए और इस तरह मधुकरचक गांव का स्वरूप सामने आया।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेज शासक के दारोगा भी लक्ष्मीपुर से लालचंद बनकर यहां पूजा करने आते थे। वर्ष 1955 में यहां पहला पक्का मंदिर बनवाया गया था, जो समय के साथ जर्जर हो गया। इसके बाद वर्ष 2012 में जनसहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और राजस्थान से काले संगमरमर पत्थर की मां काली की नई प्रतिमा मंगाकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्राण-प्रतिष्ठा की गई।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ते हैं हजारों छागर
मधुकरचक स्थित इस मां काली मंदिर की ख्याति अब दूर-दूर तक फैल चुकी है। आसपास के जिलों से भी श्रद्धालु यहां पूजा करने पहुंचते हैं। काली पूजा के दौरान गांववासियों के अलावा उनके दूर-दराज के रिश्तेदार भी माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं, वे श्रद्धा के साथ छागर (पाठा) अर्पित करते हैं।
यही वजह है कि काली पूजा के दिन इस मंदिर परिसर में एक हजार से अधिक छागर की बलि दी जाती है। मंदिर में मुख्य रूप से पंडित मोहन झा द्वारा पूजा-अर्चना कराई जाती है। इसके अलावा परिसर में भगवान शिव और हनुमान जी का मंदिर भी स्थापित है, जहां अन्य पुजारी विधि-विधान संभालते हैं।
जनप्रतिनिधियों और पुजारियों के विचार
क्षेत्र के पूर्व जिला पार्षद संजय कुमार सिंह ने बताया कि मां काली की महिमा अपरंपार है। काली पूजा के दिन गांव के अमीर-गरीब सभी परिवारों की ओर से एक छागर की बलि दी जाती है। इस दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है, और मेले में शांति व कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कमिटी के कार्यकर्ता पूरी मुस्तैदी से डटे रहते हैं।
वहीं, मंदिर के पुजारी पंडित मोहन झा ने कहा कि मधुकरचक काली मंदिर की अपनी एक खास पहचान है। जो भी भक्त पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ मां की आराधना करता है, उसकी मुराद पूरी होना तय माना जाता है। काली पूजा के अवसर पर यहां पांच सौ से अधिक पाठा की बलि चढ़ाई जाती है और भक्तों का तांता लगा रहता है।
